रचनाकार.ऑर्ग की विशाल लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 192 // सब कुछ दो // डॉ संदीप कुमार शर्मा

प्रविष्टि क्रमांक - 192


डॉ संदीप कुमार शर्मा


                        सब कुछ दो


“एक गीत है - ‘इस प्यारी-प्यारी दुनिया में क्यों अलग-अलग तकदीर’। लिखने वाले को शत्-शत् नमन।” विधि अपनी बात पूरी कर पाती इससे पहले ही उसकी सहेली अर्चना बोली - “इसमें नयी बात क्या है विधि, ये तो हम सब जानते हैं।”

           “बिल्कुल सही कहा तूने अर्चना, लेकिन मैं जो तुझे बताने जा रही हूं उसे सुनकर तुझे हैरानी होगी। और शायद तब तुझे समझ आयेगा कि तकदीर के खेल निराले क्यों होते हैं।”

              “ओह अच्छा, ऐसा है तो मुझे सारी कहानी बता।”

             “मैं तुम्हें जो बताने जा रही हूं वो हकीकत है। सच, भगवान के गणित को समझना बेहद मुश्किल है।”

             “यार पहेलियां मत बुझा। मेरी उत्तेजना बढ़ती जा रही है।”

             “मेरी सास से तो तू मिली है ?”

            “कई बार।” अर्चना ने संक्षिप्त उत्तर दिया।

              “जब उनकी शादी हुई तो उन्हें दो सास-ससुर मिले।”

              “मतलब “ अर्चना ने आश्चर्य से पूछा।

              “हां, तूने सही सुना। दरअसल हमारे दादा जी चार भाई थे। जिनमें से दो संतानहीन थे। जब उनके पिता ने बंटवारा किया तो संतानहीन भाईयों को भी संतानवान भाईयों के साथ बांट दिया।”

              “वाह, बहुत खूब। अभी तक संपत्ति का बंटवारा सुना था लेकिन ये तो अपने आप में एक अनोखा मामला है।”

             “हमारे दादा जी सबसे छोटे थे। उनके साथ तीसरे नंबर के दादा-दादी आये। इसलिए मेरी सासु मां को दो सास-ससुर मिले।”

             “वाह क्या तकदीर थी तेरी सांस की। आजकल तो एक सास-ससुर को लेकर ही जहमत होती है।”

              “सही कहा तूने। मेरी सासू मां के दो बेटे हुए। दो बहुएं आईं और पोते भी दो ही हुए। तीन बेटियों में से दो बेटियों के पुत्र हुए। वो भी एक-एक। यानि दो धेफते।”

              “अरे वाह ये बहुत ही इंटरैस्टिंग है। इसका मतलब ये हुआ कि और भी बहुत कुछ रूचिपूर्ण होगा।”

[post_ads]

             “बिल्कुल। जहां तक अंचल संम्पत्ति की बात है तो वो भी दो हैं।”

             “अच्छा।” अर्चना के मुंह से अचानक निकला।

              एक हवेली, जो दादालाई थी और दूसरी मेरे ससुर जी ने जो कोठी बनाई, इस समय तू जहां बैठी है। इतना ही नहीं इस कोठी का गृहप्रवेश दो दिसंबर को हुआ।”

               आश्चर्य से अर्चना ने कहा - “वाह क्या बात है।”

              “और सुन, सासु मां ससुर जी से उम्र में दो वर्ष छोटी थीं। उनका विवाह बीस तारीख को हुआ। ससुर जी के देहांत के दो वर्ष उपरांत सासु मां का देहांत हुआ। सासु मां का देहांत एक मार्च की शाम को पांच बजकर छह मिनट पर हुआ जिसका योग भी दो है। अगले दिन दो मार्च को उनका अंतिम संस्कार हुआ।” फिर कुछ देर शांत रहने के बाद विधि ने एक चौंकाने वाली बात कही। बोली - “जानती है अर्चना, एक दिन मैं इस विषय में सोच रही थी तो एक और गणित ध्यान में आया। मैंने अपने पति से सब भाई-बहनों के विवाह की तारीख पूछीं और जब उनको जोड़ा तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। जानती है उसके जोड़ का योग था दो।”

             आश्चर्य से अर्चना ने कहा - “क्या बात कर रही है तू ?”

             “मैं एकदम सही कह रही हूं। सुन, जेठ जी की शादी सात तारीख को हुई। बड़ी ननद की सत्रह को, बीच वाली ननद की चौबीस को और सबसे छोटी ननद की सात को। फिर हमारी शादी उन्नीस तारीख को हुई। इन अंकों का कुल योग बनता है दो।”

            अर्चना के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। उसने तपाक से कहा - “सब कुछ दो।”

2 टिप्पणियाँ


  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  2. बेनामी5:47 pm

    Bahut badiya kahani h....

    जवाब देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.