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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 193 से 195 // विरेंदर 'वीर' मेहता

प्रविष्टि क्रमांक - 193


विरेंदर 'वीर' मेहता

01 चैन की नींद

उसका आकर्षक व्यक्तित्व और मधुर व्यवहार निशा के परिवार में सभी को पसंद आया था। दोनों कॉलेज के समय से ही एक दूसरे के परिचित थे, और आज दोनों परिवारों का परिचय भी हो गया था। लगभग सब पक्का ही हो चला था कि सहसा निशा के पिता की बात ने माहौल गंभीर कर दिया।

"बेटा हालांकि अभी हमारा इतना हक़ तो नहीं है, लेकिन एक बात कहना चाहता हूं।"

"जी, कहिये न।"

"बेटा आजकल अंतरराष्ट्रीय कंपनियों में कैरियर की अपार संभावनाएं हैं। उन्हें छोड़कर तुम 'इंडियन आर्मी' ही क्यों 'जॉइन' कर रहे हो?"

"जी, दरअसल, देश सेवा का जज़्बा मुझमें बचपन से ही रहा है और जब मुझें ये अवसर मिला हैं तो मैं इसे कैसे छोड़ सकता हूँ?" वह मुस्करा दिया।

"बेटा, मैंने जीवन के कई वर्ष भारतीय सेना को सुरक्षा उपकरणों की सप्लाई में गुजारे हैं और मैं सेना की कार्य प्रणाली को भली भांति जानता हूँ। मैं नहीं चाहता कि 'इन फ्यूचर' मेरी बेटी को कोई ऐसा दुःख झेलना पड़े कि......।“

"मैं आपकी भावनाओं की कद्र करता हूँ लेकिन.....।" वह उनकी बात सहज ही काट चुका था। "मैं अपने कदम पीछे नहीं हटा सकता, मैंने भी 'कारगिल' में शहीद हुए जवानों के परिवारों को बहुत करीब से देखा है। समझ लीजिए, ये मेरा जुनून ही है।"

"बेटा! ये सीमाओं के मुद्दे और युद्ध एक राजनीति ही हैं, यूँ समझो कि हथियारों के सौदागरों की एक सोची-समझी साजिश के सिवा कुछ नहीं है ये। और इनके बीच मोहरा बनते हैं सीमाओं पर लड़ने वाले सिपाही।"

"साजिशें और राजनीति तो तब से हैं सर, जब से जमीन पर सीमाओं की लकीरें खींची गयी लेकिन एक सैनिक को इनसे कभी कोई मतलब कभी नहीं रहा। उसका तो हमेशा एक ही लक्ष्य रहा है अपनी जमीन की रक्षा करना।" वह अभी भी मुस्करा रहा था।

"क्या तुम निशा से प्रेम नहीं करते?"

"करता हूँ, अपने से भी अधिक।"

"तो ठीक हैं बेटा, मैं अधिक कुछ नहीं कहूँगा।" उनके भाव कुछ गंभीर हो गये। "मैं नहीं चाहता कि मेरी बेटी या हम, हर रात चिंताओं में गुजारें। तुम्हें निशा के लिये अपना निर्णय बदलना होगा। समझ लो, विवाह के लिये ये एक शर्त है मेरी।"

"हाँ! ठीक कहा आपने, हर रात सकूं की नींद ले सके आप सब। आखिर अपने प्रेम के लिये इतना तो किया ही जा सकता हैं लेकिन......." अनायास ही उसके चेहरे पर एक दृढ़ विश्वास झलकने लगा। "......निशा ही क्यूँ? उन करोड़ों देशवासियों का भी तो सोचना चाहिए जो हमारी सेना के विश्वास पर ही चैन की नींद सोया करते हैं, क्योंकि इतना तो आप भी जानते हैं कि जब देश का जवान सरहद पर जागता है, तभी देश चैन की नींद सोता हैं।"

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प्रविष्टि क्रमांक - 194


विरेंदर 'वीर' मेहता



2 - उपलब्धि - 'ए जर्नी ऑफ मॉडर्निटी'

"मैं आपके पास इसलिये आयी थी दीदी कि आप मेरी मदद अवश्य करेंगी।" वह कुछ निराश हो गयी।

"हां शोभा क्यों नहीं, मगर मैं इस समय 'अबो्र्ट' नहीं कर सकती। देर हो चुकी है, इसमें मिन्नी के लिये भी रिस्क है।"

सामने बैठी शोभा को मैं तब से जानती थी जब उसने मिन्नी को जन्म दिया था। और ये एक विडंबना ही थी कि वही मिन्नी बालिग अवस्था के पहले चरण में ही गर्भपात के लिये मेरे सामने बैठी थी।

"तो क्या करूँ दीदी? पहले ही बहुत मुश्किल से तैयार किया हैं इसे। इस ने तो हमारा सारा मान-सम्मान ही दाव पर लगा दिया।"

"देखो शोभा, मेरी एक परिचित हैं जो निःसन्तान हैं और किसी 'न्यू बॉर्न बेबी' की तलाश में हैं। अगर मिन्नी भी सहमत हो तो, मैं उनसे बात कर सकती हूँ। 'आई थिंक' वे लोग इसकी 'डिलीवरी' तक के सारे इंतज़ामात भी करवा देंगे।" मैंने उनकी और नजरें टिकाये सुझाव दिया।

"वो तो ठीक हैं, लेकिन मैं नहीं चाहती कि 'इन फ्यूचर' मिन्नी का अतीत ही उसके पाँव की बेड़ियां बन जाए। अच्छा होता कि.....!"

"नहीं शोभा, ऐसा कुछ नहीं होगा?" मैं उसकी बात काट चुकी थी। "इस बारें में तुम मुझ पर भरोसा कर सकती हो, वैसे ऐसे मामलों में गोपनीयता की शर्तों का पूरा पालन किया जाता हैं।"

"आंटी मैं अपना बच्चा किसी और को नहीं दूंगी।" काफी देर से खामोश बैठी मिन्नी पहली बार बोली थी।

"मिन्नी, मैं तुम्हारे मन को समझ रही हूं लेकिन इस समय तुम ऐसी स्थिति में हो जहां और कोई रास्ता नहीं हैं।” मेरा स्वर पूरी तरह से प्रेम और संवेदना से भरा हुआ था। “मैं जानती हूँ कि तुम्हें बच्चे और 'उससे' बहुत मोह होगा और शायद तुम्हारा दिल कह रहा होगा कि एक दिन 'वह' भी लौट आएगा, लेकिन....!

"नहीं आएगा वह! जानती हूं मैं।" मिन्नी के शब्दों से मेरी बात अधूरी रह गयी थी। "गलती मेरी ही थी, उसकी कोरी वासना को अपने प्रेम का जवाब समझती रही। संभल नहीं सकी और भावनाओं में बह गई।"

"बेटी, अपनी गलती को मान लेना ही प्रायश्चित की पहली सीढ़ी होती है लेकिन...." मुझें लगा यही वह समय है, जब मैं उसकी मानसिक स्थिति पर मरहम लगा सकती हूं। "...बीच राह में कोई दुर्घटना होने के बाद यदि दूसरा पक्ष 'न्यूटल' होकर अपनी राह पर चला जाये तो ये हमारी समझदारी नहीं हैं कि हम खुद ही समाज के सामने अपने किये का शौर मचाने लगे। हमें उचित इलाज के साथ, अतीत को भुलाकर जीवन की फिर से नई शुरुआत करनी चाहिए।"

"मैं समझ रही हूं आपकी बात और जैसा आप कहेंगी मैं करूंगी भी, लेकिन...!" कहते हुये एक क्षण के लिये उसके चेहरे पर झिझक उभरी मगर साथ ही वह अपनी बात बड़े विश्वास से कहते हुये उठ खड़ी हुयी। "...शायद 'मॉडर्निटी' जिसे हम बड़े गर्व से नारी की उपलब्धि कहते हैं, क्या वह फैशन और डिग्रियों से आगे बढ़ पाएगी कभी? या कुंती हर युग में कर्ण को त्यागने पर ही विवश होती रहेगी।

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प्रविष्टि क्रमांक - 195


विरेंदर 'वीर' मेहता

​3 - अस्वीकृति का दंश

"क्या आपको नहीं लगता कि भूकंप के एक हल्के से झटके में पूरी इमारत के धवस्त हो जाने के पीछे इसके निर्माण में अभियंता और ठेकेदार की मिलिभक्त भी हादसे की एक वजह हो सकती हैं।" घाघ पत्रकार ने बड़ी चालाकी से अपना प्रश्न किया।

हाल ही में बनी उस शानदार इमारत का सौंदर्य देखते ही बनता था। जिसने भी देखा था, उसके निर्माता और शिल्पकार की सराहना किए बिना नहीं रहा था। लेकिन प्रकृति के एक हल्के से झटके ने ही उसे मिट्टी में मिला दिया था। उसी के संदर्भ में पत्रकार की भवन- निर्माता से बात हो रही थी।

"हां संभावना व्यक्त की जा सकती है, लेकिन मुझे नहीं लगता कि ऐसा कुछ है?" भवन निर्माता ने प्रश्न को सहज ही टालना चाहा।

"लेकिन इस प्रोजेक्ट के शुरू में ही कंस्ट्रक्शन-विवाद पर छोड़कर जाने वाले अभियंता मिस्टर कुमार का तो यह कहना है कि वे जानते थे कि देर-सवेर ऐसा होने वाला है।"

"................?"

पत्रकार द्वारा 'कुमार' का जिक्र करने पर अनायास ही वे अतीत के उन क्षणों में पहुँच गए जब 'कुमार' ने उनसे अपनी आपत्ति दर्ज करवाई थी।. . . . . . .

"सर, नींव की गहराई और उसमें लगे सरिया-पत्थर की क्वालिटी इमारत की प्रस्तावित ऊंचाई और नक्शे के लिहाज से हल्की है। मुझे लगता है आपको इसके तय बजट को बढाना चाहिए।"

"लिसन मिस्टर कुमार, डोंट सजेस्ट मी। तुम्हारा काम सिर्फ 'कंस्ट्रक्शन' करना है। और फिर कौन देखता हैं, नींव के पत्थरों को? बिल्डिंग की पहचान उसके डिजाईन और 'स्ट्रक्चर' से होती हैं। जैसे हम कहते हैं, वैसा करों। वरना इस प्रोजेक्ट के लिए और लोग भी तैयार हैं।". . . . . . . . . . .

".......आप ने जवाब नहीं दिया सर!"

पत्रकार के टोकने पर सहज ही वे अपने विचारों से उभर आयें। "जी ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि उन्होनें ऐसा कहा, लेकिन मेरे विचार से ये सिर्फ एक हादसा है जिसके लिये हम केवल प्रकृति को ही दोषी ठहरा सकते हैं।" उन्होंने बात को फिर संभालना चाहा।

"लेकिन सुनने में तो यह भी आया हैं कि घटिया निर्माण सामग्री के कारण.....।"

"नो कमेंट्स, एंड नो मोर क्वेश्चनस प्लीज!" पत्रकार की बात बीच में ही काटकर, जवाब देते हुए वह उठ खड़े हुए। जिस ग़लती को वह स्वीकार नहीं कर पा रहे थे, उसी घटना का दंश एक बार फिर उन्हें लगा था। प्रोजेक्ट छोडकर जाते हुए 'कुमार' के शब्द टुकडा-टुकडा उनके सामने लहरा रहे थे। "....ओ के सर, जा रहा हूँ... लेकिन जाते-जाते इतना अवश्य कहना चाहूंगा कि नींव के पत्थर नजर भले ही नहीं आते। लेकिन जब समय आता है तो ये अपनी पहचान और परिणाम दोनों ही पीछे छोड़ जाते हैं।

2 टिप्पणियाँ


  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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  2. हार्दिक आभार मित्र।
    सहमत आपकी बातों से। अवश्य।

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रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

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