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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 196 व 197 // छत्र पाल वर्मा

प्रविष्टि क्रमांक - 196

छत्र पाल वर्मा

1-

और वे रो दीं

मैं बहुत दिनों से देख रही हूँ कि  आप मुझसे ऐसे कतराते हैं जैसे मैं कोई भूखी शेरनी होऊँ और आपको कच्चा ही चबा जाउंगी | अरे गौर से देखोगे तो पाओगे कि ये बंदी भी किसी से भी कम ख़ूबसूरत नहीं है | सारा स्टाफ मेरे नाम के कसीदे पढता है और आप हैं कि मेरी परछाई से भी घबरा उठते हैं | माना कि मैं आपकी सीनियर हूँ पर उम्र में तो शायद मैं ही छोटी होऊँगी आपसे | आपको क्या लगता है कि मैं जो ये अकड़ और अक्खडपन से स्टाफ के साथ पेश आती हूँ वो बेवजह ही है? जी नहीं| अगर मैं ऐसा न करूं तो स्टाफ का हर सदस्य मुझे कच्चा ही निगल जाये|

देखिये अब आपका कोई बहाना नहीं चलेगा | कल दस बजे आप मेरे घर पधार रहे हैं और लंच भी हम दोनों साथ-साथ मेरे घर पर ही ले रहे हैं | विश्वास कीजिए मैं जितनी खूबसूरत हूँ, खाना भी उतना ही लज़ीज़ बनाती हूँ | मैंने कल ऑफ़ ले रखा है|

अक्खा! तो आप आ ही गए| वैसे आप जैसे नीरस से मुझे आशा नहीं थी कि आप आयेंगे| अहो भाग्य, कभी हम उनको कभी अपने घर को देखते हैं|

आईये आईये बहुत  अच्छा किया जो आप आ गए मैं बहुत बोर हो रही थी| बच्चों के स्कूल चले जाने के बाद समय कटता ही नहीं है|

अरे आप उधर क्यों बैठ गए? इधर आईये न, हाँ यहाँ, मेरे पास, सोफे पर| अरे मैं निगल थोड़े ही जाऊँगी| ह हा हा|

अच्छा यह बताईये आप लंच कितने बजे लेते हैं, और लंच में क्या लेना पसंद करते हैं?

तो ठीक है, अभी थोडा़ सा लाईट कुछ ले लेते हैं| अरे मैं यह पूंछना तो भूल ही गई आप ड्रिंक्स मैं क्या लेना पसंद करते हैं? नहीं नहीं, तकल्लुफ न करें| जी हाँ व्हिस्की का भी बंदोबस्त है| अब क्या है आपको तो पता ही है श्याम को इन सब चीजों के साथ पार्टियां देते रहने का बड़ा शौक है, इस लिए थोडा़ बहुत घर में यह सब रखना ही पड़ता है|

अजी क्या बात करते हैं? मिसेज श्याम हूँ, मेहमानों की खातिरदारी मुझसे अच्छी तरह और कौन कर सकता है? वैसे तो मैं लिकर यूज नहीं करती पर श्याम के साथ मूड बदलने के लिए कभी कभी ले लेती हूँ, पर हाँ दो पेग से ज्यादा कभी नहीं| अब आपका साथ तो देना ही पड़ेगा| चलिए सोफे से उठिए, उस कमरे में श्याम ने छोटा सा बार रूम बना रखा है  वहीं चल कर कुछ ले लेते हैं वहां भी ऐसा ही सोफा पड़ा हुआ है|...

आप मर्द हैं न इसलिए इतनी आसानी से कह दिया कि मैं न रोऊँ| हम दोनों के बीच आज जो कुछ भी हुआ वो बिलकुल भी अच्छा नहीं हुआ| अब आप ही बताईये यही सब कुछ यदि श्याम किसी महिला के साथ करें, तो क्या मैं बर्दास्त कर लूंगी? मैंने श्याम को धोखा  दिया है| मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था| माना कि आपको ज्यादा हो गयी थी पर मैं तो आपको रोक ही सकती थी| आप कितना ही समझाएं मेरे लिए इस गलती का कोई प्रतिकार नहीं है, कैसे मैं श्याम के लौटने पर उनसे नज़रें मिला पाऊँगी?

आईये डाइनिंग टेबल पर आ जाइये, मैं लंच लगा देती हूँ, आप लंच ले लें|

क्या? मैं ? मैं  नहीं खा पाऊँगी प्लीज|

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2

प्रविष्टि क्रमांक - 197

छत्र पाल वर्मा

रकीब

भूतों की जमात में आज एक खूबसूरत और जवान भूत शामिल हो गया|

कुछ दिन साथ रहने के बाद भूतों ने महसूस किया यह भूत पता नहीं अलग थलग और खामोश सा क्यों रहता है| न ज्यादा बोलता है न हँसता है| सारे भूतों ने निर्णय लिया कि इस नए रंगरूट से पूंछना चाहिए कि वह इतनी भरी उम्र में भूत बनने पर मजबूर क्यों हुआ और इतना दुखी और चुप-चुप क्यों रहता है|

जवान भूत ने बताया कि वह किसी की जान बचाने के चक्कर में खुद अपनी जान खो बैठा|

एक सीनियर भूत ने प्रति प्रश्न किया “तो क्या जिसकी जान बचाने के चक्कर में मौत को गले लगा बैठे, उससे अत्यधिक प्रेम करते थे?”

जी नहीं वह  मेरा रकी़ब था |

अच्छा तो बेटा मजनूं की औलाद थे|

थे का मतलब? मैं तो अब भी अपनी प्रेमिका से बहुत प्यार करता हूँ|

तो फिर ये रोनी सूरत लेकर क्यों बैठे रहते हो उसके गम में, जाओ और अपने रकी़ब के पीछे पड़ जाओ| सा... दो दिन में तुम्हारे लिए रास्ता साफ़ कर देगा| एक दादा टाईप के भूत ने सुझाव दिया|

मैं ऐसा नहीं कर सकता, शादी के बाद मेरी माशूका उसे अपना भगवान मानने लगी है, माशूक भूत ने कहा|

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C P VERMA

35- Sivam tenements,

near I P School, Vllabh Park, Sabarmati, Ahmedabad

382424,

1 टिप्पणियाँ


  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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