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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 206 // बूचड़खाना // वीणा विज उदित

प्रविष्टि क्रमांक - 206

बूचड़खाना 

वीणा विज उदित

नाम नहीं लूँगी उस अस्पताल का। फर्क नहीं पड़ता वो कोई भी अस्पताल हो, क्योंकि सब के सब आज की तारीख में बूचड़खाने बन चुके हैं। हमारे पड़ोसी शुगर के मरीज थे। उनके डाक्टर ने किसी नई दवाई की उन पर अजमाईश की , जो उन्हें सूट नहीं करी। तबीयत इतनी बिगड़ी कि आधी रात को ही एमरजैंसी मे ले जाना पड़ गया। वहाँ पहुँचते ही ग्लूकोज़ और औक्सीजन लगा दिए गये। डाक्टर वहाँ नहीं थे अलबत्ता स्टाफ नर्स ने रूटीन इलाज किया। किसी को सिफारिशी फोन करने पर, किसी तरह डाक्टर को सुबह होने से पहले बुलाया गया। ICU में मरीज के पास किसी को भी जाने की मनाही थी। बाहर सारा परिवार रो रहा था और मरीज के लिए प्रार्थना कर रहा था।

नर्स आती थी और एक पर्ची पर दवाओं की लिस्ट पकड़ा जाती थी। उनका बेटा लिस्ट लेकर भागता था अस्पताल के भीतर वाले मैडिकल स्टोर पर। सारा दिन यही कुछ चलता रहा। ईश्वर का जाप और मन्नतें माँगी जा रही थीं। रात दोबारा दस्तक दे रही थी कि तभी हमारे एक कॉमन फ्रेंड वहीँ की एक डाक्टर के साथ ICU में भीतर गए। मैं भी वहाँ से उठकर उनके साथ चल दी। उस डॉ. ने भीतर जा हमारे मरीज की नब्ज़ देखते ही कहा,” अरे, यह बौडी पड़ी-पड़ी ठंडी हो चुकी है। सारी औपचारिकता कर के बाहर दो इनके रिश्तेदारों को।” इतना कह वह आगे बढ़ गई।

यह सुन, मैं दुखी हृदय से खबर देने बाहर भागी तो देखा कि एक नर्स के हाथों से पर्ची लेकर उनका बेटा इंजैक्शंस और दवाइयां लेने भीतर मैडिकल स्टोर की ओर जा रहा है। मैंने आगे बढ़कर उसके हाथ से पर्ची ले ली, और कहा,” यह दवाइयां भीतर नहीं जाएंगी। बेटा, आपके पापा तो बहुत देर से हैं ही नहीं। ये दवाइयां किस के लिए लेने जा रहे हो ?” वह हैरत से मुझे देख रहा था ,फिर मेरे कंधे पर सिर रख कर फफक पड़ा। एक ओर बच्चों के सिर से बाप का साया उठ रहा था और दूसरी ओर अस्पताल लूट रहा था। एक आधे सच का और पर्दाफाश हुआ कि यही दवाइयां फिर से उसी मैडिकल स्टोर पर बेच दी जाती थीं।


अहसास, जज़्बात और इंसानियत का कहीं कोई नामों -निशां नहीं था। मरीज आया है तो उसके घर वालों को जितना लूट सकते हो लूट लो। बहुत विरक्ति हुई कि किस बूचड़खाने में फँस गए हैं हम। और हैरत तो तब हुई जब उनके बेटे ने दवाइयों की लिस्ट डॉ. को दिखा कर पूछा ,”डा. साब, आप ने यह दवाइयां मुर्दे को देनी थीं क्या?” डाक्टर की अंतरात्मा पर यह करारा प्रहार था लेकिन वह ढीट खड़ा सुन रहा था। क्या मालूम इस प्रहार का असर अगले मरीज तक भी रहा होगा कि नहीं……

2 टिप्पणियाँ


  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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  2. bahut sahi hai .isi prkar ki n jane kitni ghtnaen aajkl ho rahi hain .
    is vastvikta ko ujagr krne ke lie shukriya .

    Pranava Bharti

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