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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 207 // कलियुग के राम // मनीष शुक्ल

प्रविष्टि क्रमांक - 207


कलियुग के राम

मनीष शुक्ल


अंतिम संस्कार का इंतजार था। आखिरी वक्त में लक्ष्मण उनके सामने पड़ा तड़प रहा था। पर लक्ष्मण की रक्षा करने वाले राम नहीं थे। कौशल्या जी ने पूरे ब्रह्माण्ड की ताकत इकट्ठा कर व्हील चेयर के पहिये को घुमाया, सारे स्वरनाद बेटे की रक्षा के लिए पुकारने में लगा दिये। उस बच्चे की, जिसने अपने बच्चे की तरह माँ की बीमारी के बाद उनका पालन किया था। माँ की सेवा के लिए उसने अपना विवाह करने से इंकार कर दिया था। बालपन में ही पिता का साया उठने के बाद माँ ने राम और लक्ष्मण को अपने संस्कारों और शिक्षा से सींचा था। जिसके कारण बड़ा बेटा राम नासा में वैज्ञानिक हो गया था। लेकिन लक्ष्मण ने बड़े भाई की तरह घर और माँ को छोड़ने से इंकार कर दिया था इसलिए शिक्षक बनकर शहर में ही बच्चों को पढ़ाता था। राम ने यूएस में अपने साथ काम करने वाली लड़की से विवाह कर लिया था। अब अमेरिका ही उसका देश था और वहीं उसका परिवार था। वो माँ से मिलने भी आता तो कुछ ही दिनों के लिए। कई बार वो माँ और भाई को अमेरिका ले जाने की जिद कर चुका था लेकिन कौशल्या जी थीं जो अपने घर रामायण को छोड़ना नहीं चाहती थीं। उसमें उनके पति की यादें बसी थीं। आखिरकार हारकर राम ने उनको ले जाने का विचार त्याग दिया था।

कौशल्या जी की पुकार के बाद आस- पड़ोस के लोग इकट्ठा हो गए थे। डाक्टर प्रशांत ने चेकअप करने करने के बाद कहा.... ‘लक्ष्मण को तुरंत अस्पताल ले जाना होगा। हार्ट अटैक पड़ा है। लेकिन लक्ष्मण को संजीवनी देने वाला कोई नहीं था। राम तक उसके भाई की मौत का समाचार पहुँच चुका था। अंतिम संस्कार के लिए राम का विदेश से आने का इंतजार हो रहा था। पति का सहारा छिनने के बाद अब बुढ़ापे की लाठी भी भगवान ने छीन ली थी। कौशल्या बिलकुल अकेली और रामायण वीरान सा राम का इंतजार कर रहा था। राम का इंतजार करते- करते नाते रिश्तेदारों ने मिलकर लक्ष्मण का अंतिम संसार भी कर दिया।

राम अपने परिवार के साथ वर्षों बाद रामायण में लौटा लेकिन अब लक्ष्मण उसके साथ नहीं था। बची थीं तो बचपन से लेकर जवानी तक की यादें। जिसमें लक्ष्मण उसके साथ साये की तरह था। राम, कौशल्या और रामायण सब अकेले हो चुके थे। तेरहवीं के ब्रह्म भोज के बाद चला- चली की बेला आ चुकी थी। राम को लौटना था। उसने फिर माँ से जिद की, ‘माँ अब तुझे मैं बिलकुल भी अकेला नहीं छोड़ सकता हूँ। तू हर हाल में मेरे साथ चलेगी।‘ माँ ने बड़े प्यार से उसके सर पर हाथ फेरा... ‘बेटा अब तो तेरे पिता के साथ ही तेरे भाई की भी यादें इस रामायण में बस गईं हैं... इनको छोड़ कर मैं कैसे जा सकती हूँ... तू जा और खुश रह…. मैं अपनी ज़िंदगी किसी तरह से काट ही लूँगी।‘ यह सुनते ही राम की आँखों से आँसू झलक आए और माँ से चिपक कर फफक- फफक कर चीख उठा।

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ईमेल – manish.india.co@gmail.com

1 टिप्पणियाँ


  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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