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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 208 // तस्वीर का दूसरा रूख... // दया शंकर शरण

प्रविष्टि क्रमांक - 208

दया शंकर शरण

तस्वीर का दूसरा रूख...

हर तस्वीर का एक दूसरा रूख भी होता है। एक बार अपने  मोहल्ले की एक शादी में गया था। वह जून की एक उमस भरी रात थी । रात्रि भोज का आयोजन बृहद पैमाने पर घर के बाहर के आलीशान अहाते में था । अहाते को ऊपर से और चारों तरफ से खूबसूरत टेंट और कनात से ढँक दिया गया था। रात्रि भोज शुरू हो चुका था । बारात दरवाज़े पर लग चुकी थी। रात के करीब ग्यारह बजे थे । चारों ओर गहमा-गहमी थी । लज़ीज़ व्यंजनों की खुशबू हवा में घुली थी । यह एक रसूखदार घर की दावत थी जो ऊपर से काफी  शालीन दिख रही थी।

खाना खा कर मैं सिगरेट पीने जब कनात से बाहर के अंधेरे में गया, तो एक अजीब सा दृश्य दिखाई पड़ा । एकबारगी मुझे यकीन नहीं हुआ कि ऐसा भी नजारा देखने को मिल सकता है। मैंने देखा कि वहाँ एक पूरा कुनबा जिसमें मर्द-औरत,बच्चे-बूढ़े सभी थे -जमीन पर बैठे प्रतीक्षारत हैं। उनसे कुछ ही दूरी पर जूठे बर्तनों को धोने में कई लोग लगे हुए थे। बर्तनों के झूठन एक बड़े से टब में उड़ेले जा रहे थे । और इसी टब से ये लोग अपने बर्तनों में भर रहे थे।...यह था तस्वीर का दूसरा रूख ! ..

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1 टिप्पणियाँ


  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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