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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 211 // हिम्‍मत // डॉ.शिल्‍पी बक्‍शी शुक्‍ला

प्रविष्टि क्रमांक - 211


डॉ.शिल्‍पी बक्‍शी शुक्‍ला


हिम्‍मत

‘राधा.. बेटा.. क्‍या हुआ?’ पिता आवाज़ देते हैं, जवाब न मिलने पर वे परेशान होने लगते हैं।

राधा की मां दमयंती बताती है कि राधा कमरे में गिर कर चोट लगने से बेहोश है। वे बाहर से किसी को बुलाने जा रहीं हैं।

राधा के पिता बेबस महसूस करते हुए पत्‍नी के बाहर जाने पर स्‍वयं उठने की कोशिश करते हैं। हालांकि उन्‍हें बिस्‍तर से उठ कर चले हुए एक हफ्ता हो चुका था। पैरालिसिस होने से मौसम बदलने पर पैरों की अकड़न बढ़ जाती थी। उन्‍होंने किसी तरह से अपने आप को हिम्‍मत दिलाते हुए बेड से अपने पैर नीचे करने की कोशिश की। नाकाम रहने के बाद वे किसी तरह से अपने पैर नीचे कर बेड पर कोहनी टिकाकर उठने की लगातार कोशिश करने लगे। उन्‍हें लग रहा था कि वे किसी तरह उठ कर राधा तक पहुंच जाएं। वे लगातार प्रयासों से उठ कर बैठने में सफल हो गए। तभी राधा की मां पड़ोस से मयंक को बुला लातीं है।

उठने की काशिश करते हुए देख कर वह उनके हाथ पकड़ कहतीं हैं। ‘अरे आप क्‍यों उठ रहें हैं’।

पैरों के साथ न देने पर वे कोशिश करते हुए बिस्‍तर पर गिर गए।

दमयंती और मयंक कमरे में गिरी हुई राधा को सहारा देकर बिस्‍तर पर लेटा चुके थे।

पिता को राधा की आवाज सुनाई न पड़ने पर उनकी व्‍यग्रता बढ़ती ही जा रही थी। वे राधा को देखना चाहते थे। अत: वाकर के सहारे खड़े होने की कोशिश करने लगे।

‘आंटी दीदी के मुंह पर पानी के छीटें मारें, मैं किचन से पानी ला देता हूं’। मयंक बोला

‘हे भगवान क्‍या हो गया मेरी बच्‍ची को?’ दमयंती ने परेशान हो कर कहा।

सुन कर पिता की धड़कने बढ़ने लगी, उन्‍होंने सोचा ‘कुछ भी हो जाए, मुझे उठ कर खडे होना ही है’। पैरों पर ज़ोर डालते ही नसों में दर्द से वे कराह उठे, पर उन्‍हें इस समय अपने दर्द की चिंता न थी। अनेक बार कोशिश करने पर वे वाकर पकड़ कर खड़े हो गए। वे अपने शरीर को सम्‍हाल रहे थे। खड़े हो कर चलना एक चुनौती की तरह था उनके पैर लड़खड़ाने लगे। तभी मयंक ने उन्‍हें थाम लिया ‘बेटा मुझे उस कमरे में ले चलो।’ उन्‍होंने कहा।

‘दीदी ठीक हैं, उन्‍होंने आंखें खोल दी है। डाक्‍टर साहब भी आते होंगे’। मयंक बोला

‘नहीं, सहारा दे कर ले चलो बेटा’। मयंक के सहारे किसी तरह कदम दर कदम दर्द झेलते वे आगे बढ़ते हुए राधा के कमरे तक पहुंच गए।

राधा होश में थी। पिता को आते हुए देख मोच की परवाह न करते हुए खड़े होना चाहती थी, पर मयंक उसके पिता को कुर्सी पर बैठा चुका था। पिता ने सिर पर हाथ फेरा तो राधा ने उनका हाथ अपने हाथों में कसकर जकड़ लिया। आंखों से बिना रूके अश्रुधारा बहने लगी। उसने पिता की ओर देखा तो उनकी आंखें भी भीगी थीं। दोनों की आंखों में उम्‍मीद की चमक लौट आई थी। राधा को विश्‍वास होने लगा था कि उसके पिता अपने दृढ़ निश्‍चय से फिर अवश्‍य चलने लगेंगे ।

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ई-मेल – shilpibakshi100@gmail.com

1 टिप्पणियाँ


  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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