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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 220 // अफसोस // मुरली मनोहर श्रीवास्तव

प्रविष्टि क्रमांक - 220


मुरली मनोहर श्रीवास्तव

अफसोस

वह स्टेज पर खड़ा था, कंपनी के उच्च अधिकारी उस की सफलता पर उसे छब्बीस जनवरी को सम्मानित करने वाले थे। 

स्टेट गवर्नमेंट के कल्चरल सेक्रेटरी से वह अपनी पुस्तक पर अकादमी पुरस्कार प्राप्त कर लौटा था।

आज ही न्यूज पेपर में खबर आई थी, इतना ही नहीं उस की पुस्तक का जिक्र किसी बड़े मंत्री ने भी अपनी सभा में किया था।

आज वही अधिकारी जो निरंतर उसे हिकारत की नजर से देखते थे, वही साथ के लोग जो उस का साहित्यिक रुझान के लिए मजाक बनाते थे उसे सम्मान देने को उपस्थित थे।

मानव संसाधन विभाग के अधिकारी उस का बायोडाटा खंगाल रहे थे।

स्टेज पर उस के नाम के कसीदे पढ़े जा रहे थे।

उस की उपलब्धियों का बखान हो रहा था और कल तक उसे बुरा भला नकारा बताने वाले आज उसे महान बनाने पर तुले थे।

न जाने कब से वह इस दिन की प्रतीक्षा कर रहा था।

वह जानता था कि एक दिन सफलता उस के कदम चूमेगी और लोगों की निगाह बदल जाएगी।

यह सच भी है कि एक सफलता किसी के लिए देखने वालों का दृष्टिकोण बदल देती है।

वह जैसे आदर व सम्मान के समंदर में गोते लगा रहा था कि तभी उस के दोस्त ने कोहनी मारी ,

कहां खोये हो राघव , कब से तुम्हारा नाम अनाउंस हो रहा है स्टेज पर जाओ तुम्हें दो शब्द बोलना है।

वह जैसे नींद से जागा।

दो शब्द,न जाने कितने पन्ने उस ने स्टेज पर दो शब्द बोलने के लिए लिख रक्खे थे।

वह साधे हुए कदमों से स्टेज पर पहुंचा, तालियां बज रहीं थीं । महिमामंडन बहुत हो चुका था।

साहब उसे गले लगा कर पुरस्कार देने को आतुर थे।

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लेकिन नहीं उसे अभी दो पन्नों का दो शब्द बोलना था।

सभी को धन्यवाद देना था, अपनी सफलता का श्रेय दूसरों को देना था, और एक साधे हुए साहित्यकार की तरह विनम्रता का परिचय देंना था।

वह शायद यह सब करता भी की तभी उस की अंतरात्मा चीत्कार उठी।

उस का हाथ जेब में रक्खे कागज से मुक्त हो चुका था।

उसे लगा वह इतना झूठ नहीं बोल पायेगा।

उस ने माइक लिया सभी को धन्यवाद कहने के साथ ही बोला, सर यह सम्मान मेरा सम्मान नहीं है।

यदि मेरा या मेरे लेखन का सम्मान करना होता तो आपने मुझे दो साल पहले ही सम्मानित किया होता,जिस दिन इस पुस्तक की पहली प्रति मैंने आपको भेंट की थी।

मुझे भली प्रकार वह दिन याद है जब मैं यह पुस्तक आपको भेंट करने आपके कमरे में आया था।

आप उस दिन व्यस्त थे या व्यस्तता का आवरण ओढा हुआ था आपने कह नहीं सकता।

आपने बड़ी ही हिकारत से मुझे देखा था और पूछा था समय कैसे निकाल लेते हो इन सब कार्यों के लिए मुझे तो आफिस के बोझ से ही फुरसत नहीं मिलती।

और आपकी बात पर सामने बैठे सभी अधिकारी मंद मंद मुस्कुरा उठे थे।

मुझे शायद आप सामने बैठाना भी भूल गए थे। मेरा पद इतना छोटा है कि मेरे बैठने से कुर्सी गंदी हो जाती।

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उस दिन मुझे अफसोस हुआ था कि मैं आपके पास अपने पुस्तक की पहली प्रति ले कर क्यों आया।

दरअसल आपके पास आदमी का कद नापने के लिए इंसानियत का पैमाना नहीं है। आपकी आंख सिर्फ और सिर्फ पोस्ट और पैसे पर इंसान को तौलना जानती है।

हां आज जब हर तरफ मुझे सम्मान और स्वीकृति मिल गई है तो आप भी अपने दायित्व का निर्वहन करने मुझे यहां बुला रहे हैं।

आप मेरे कृतित्व का नहीं मेरी सफलता का सम्मान कर रहे हैं।

और हां जिस दिन लोगों में सफलता नहीं ,लोगों को पहचानने की दृष्टि पैदा हो जाएगी, यह देश और समाज बदलते देर नहीं लगेगी।

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