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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 222 से 224 // रितु गोयल

प्रविष्टि क्रमांक - 222


रितु गोयल

1- दायित्व

"हद हो गई यार, स्कूल- कॉलेजों में भी भ्रष्टाचार! आज रोनू के लिए उस मेडिकल कॉलेज में तगड़ा डोनेशन देना पड़ा तब जाकर बात बनी...साफ कह दिया वहाँ कि सीट के लिए मारामारी है जो लपक सके वो लपक ले। कोई भी अपना दायित्व निभाने को तैयार नहीं। पता नहीं क्या होगा हमारे देश का? बुरा हाल है।"

अनीश दफ्तर में अपने सहयोगी के सामने बुरी तरह झल्ला रहा था।

"साब! वो आदमी बाहर बैठा है, जिसको कल आपने आने को कहा था। भेज दूँ क्या उसे अंदर?" चपरासी ने केबिन में झाँका।

"हाँ, हाँ भेज दो।" अनीश की जगह जवाब उनके सहयोगी ने दिया।

अरे वाह ऐसे कैसे! अंदर भेजने से पहले देख तो लें कि जेब में वजन कितना है तभी तो फाइल आगे बढ़ेगी। जिसे देखो खाली हाथ चला आता है। हम क्या लंगर डाल ले यहाँ?"

अनीश ने बॉस होने का दायित्व निभाया था।

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प्रविष्टि क्रमांक - 223

रितु गोयल


2- सम्मान....

टैक्सी से उतर कर तेजी से चलते हुए जैसे ही उसने घर में कदम रखा। 'सासू माँ की जोर जोर से बोलने की आवाज सुनाई दी'...

"उफ्फ! ये घुटनों का दर्द तो जान लेकर जायेगा। आज तो खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा।" एक निगाह उस पर डालकर वह घुटने को जोर- जोर से दबाने लगीं।

ससुर ने अखबार को मुंह के और नजदीक कर लिया।

स्वाति ने कमरे में जाकर सब पलंग पर डाल दिया...इतनी बड़ी ट्रॉफी, शॉल, फूलमाला सब कुछ। कुछ देर पहले का माहौल कितना खुशनुमा था। स्टेज पर खड़ी वह लोगों की तालियों की गड़गड़ाहट से आकाश पर थी। आज उसके उत्कृष्ट लेखन के लिए उसे सम्मान से नवाजा गया था। उसके चेहरे पर मुस्कराहट फैल गई।

"मुस्कराती रहोगी या खाना भी बनाओगी! पता है ना माँ को जल्दी खाना चाहिए होता है, पर तुम्हें इन फालतू कामों से फुर्सत मिले तो सोचोगी ना।" व्यंग्य-बाण की बौछार कर शिशिर बाहर निकल गए।

गैस पर बनती सब्जी में उसके आँसू कब मिलकर जज्ब हो गए उसे पता ही नहीं चला। वह अब भी मुस्कराते हुए तेजी से सब्जी चला रही थी।

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प्रविष्टि क्रमांक - 224

रितु गोयल

3- नस्ल

"धन्नो की शादी तय हो गई है मालकिन। लड़का कमाऊ तो है पर एक दो लोगों से पता चला है कि आदतें बिगड़ी हुई हैं। कह रही हूँ धन्नो के पापा से कि ढंग से पता कर लें पर उनको तो लड़के की नौकरी भा गई है। आप ही कहो उनसे शायद आपकी बात मान लें।" पैरों के पास बैठी वह मालकिन की मिन्नतें कर रही थी।

     "अरे, पागल है तू! लड़़के की कमाई ही देखी जाती है। शक्ल- सूरत आदतें सब पैसे के आगे दब जाती हैं। तू ज्यादा खोजबीन मत निकाल। कर डाल धन्नो की शादी।"

कहकर मालकिन ने पान मुंह में दबाया और अपने थुलथुल शरीर को हिलाते हुए बाहर जाते नौकर को आवाज लगाई ।

     "सुन हरिया बाबूजी के साथ पिल्ला लेने जाए तो देखभाल कर अच्छी नस्ल का ही लाना। मुझे समझ नहीं आया तो पहले वाले की तरह वापिस कर दूंगी। बोल देना उस दुकान वाले से कि ऐसा-वैसा ना पकड़ा दे।


रितु गोयल


कोठी नं 3, शक्ति नगर,

बल्केश्वर क्रांसिग, आगरा यू.पी.

1 टिप्पणियाँ

  1. विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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