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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 236 // बदलाव की नींव // भारती वशिष्ठ

प्रविष्टि क्रमांक - 236

भारती वशिष्ठ

बदलाव की नींव

" सुरेखा! ये सब क्या हो रहा है? क्यों बच्ची को परेशान कर रही हो? अभी अभी इस पर इतना बड़ा पहाड़ टूटा है और तुम इसका दुख समझना ही नहीं चाहती। इतनी मतलबी कैसे हो सकती हो तुम!" भंवरी बुआ ने आकर सुरेखा जी का हाथ पकड़ कर छिटक दिया। महज़ 23 साल की विधवा कंगना के हाथों से चूड़ियाँ उतारती सुरेखा जी ने उसका हाथ लहूलुहान कर डाला था।

सुरेखा ने आँसू बहाते हुए कहा-" मेरा भी तो बेटा गया है। ये समझती क्यों नहीं कि यह सब इसे शोभा नही देता। इसकी साज सजावट देखकर रह रह कर मुझे मेरा बेटा याद आता है। मैं विधवा भी तो सादगी से रहती हूँ! मैंने तो कभी उनके जाने के बाद यूँ सजने सँवरने की नही सोची। और जीजी तुम भी तो मेरे जैसा ही जीवन जी रही हो। यह तो रीति रिवाज हैं। जो जिसे शोभा दे, वैसे ही रहना उचित है।"

कंगना उम्मीद भरी नजरों से भँवरी बुआ की ओर देख रही थी। "सही कहा तुमने। पर बदलाव लाना भी तुम्हारे और हमारे ही हाथ में है सुरेखा। जाने वाला तो चला गया। इस बेचारी को जीते जी क्यों मारना चाहती हो! हमें तो कोई बड़ा बूढ़ा समझने वाला नहीं मिला। पर हम तो एक नए और अच्छे रिवाज की परंपरा बना सकते हैं। रंगहीन दुनिया का दर्द हमने सहा, पर किसी और की दुनिया में रंग भरकर हम उसे उस दर्द से मुक्ति दे सकते हैं। बदलाव का दीया तुम्हें जलाना है।" कहते हुए भँवरी बुआ की आँखें डबडबा गयीं।

सुरेखा जी ने भी सारी उतारी चूड़ियाँ अपनी बहू कँगना के हाथों में डाल कर उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा-" जा बिटिया। तू जी ले अपनी जिंदगी। आज इस कुरीति को खत्म कर मैं अपना नजरिया बदलती हूँ। तेरी इन्ही चूड़ियों की खनखन में अब मैं अपने बेटे का स्वर सुनूँगी।

यह बदलाव देख कँगना ने भँवरी बुआ और सुरेखा जी के पैर छूए और दोनों ने उसे गले से लगा लिया।

1 टिप्पणियाँ

  1. विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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