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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 234 व 235 // कविता नागर

प्रविष्टि क्रमांक - 234


कविता नागर

1-दो किताबें।

दो किताबें एक मेज पर रखी हुई थी। एक बड़ी ही आकर्षक मुखपृष्ठ वाली और गर्वयुक्त दिखाई दे रही थी,स्वयं ही अपना बखान किए जा रही थी। देखो मैंने इतना खर्च किया तब जाकर यहाँ पहुंची,आगे भी अपने साजसिंगार पर पूरा ध्यान दूंगी। पाठक तो चुटकी बजाते मिलेंगे बस ढोल पीटना है,कि मैं आ रही हूं। सोशल होना जरूरी है यू नो, और मेरी मालकिन तो बहुत चतुर है इन सबमें। आज मैं हूं, अगले महीने फिर मेरी बहन आएगी।

दूसरी साधारण आवरण और सादा मगर यथार्थ पूर्ण मुखपृष्ठ लिए अदब से एक कोने पर रखी थी,वो इंतजार में थी कि शायद कोई अच्छा पाठक मिले और उसकी सार्थकता सिद्ध हो। वो मुस्काई और बोली,ना बहन मेरी सामर्थ्य इतनी नहीं है,बस अपने स्वामी पर भरोसा है,कि उनके उच्च विचार और कलम की कारीगरी से शायद साहित्य के दामन में मैं भी एक फूल बनकर खुद को उकेर पाऊं। बाकी अपने सहोदर भाई-बहनों के लिए तो मुझे बहुत इंतजार करना पड़ता है,तभी हम मिल पाते है।

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प्रविष्टि क्रमांक - 235

कविता नागर


2-ओजोनपरत।

विदूषी मैडम स्वतंत्रता सेनानी रामसहाय की पोती थी। वर्तमान में वे एक शिक्षिका बनकर अपना कर्तव्य पूरा कर रही थी।

बीते कुछ दिनों से देश में चुनाव का माहौल था,राजनीतिक दल साम-दाम और दंड-भेद सब अपना रहे थे। मुद्दे भी  जाति,धर्म इत्यादि अलगाव के बीज बोते देखे गये।। कोई एक लाभान्वित होता और कोई उपेक्षित। इस तरह के क्रियाकलाप उनके भावुक हृदय को व्याकुल कर देते,क्यों गौण मुद्दे प्रमुख और मुख्य मुद्दे गौण है।

वे सोच रही थी ये लोग राष्ट्र हित के मुद्दे क्यों नहीं उठाते। सब स्वार्थ में गड़े हुए है, एक दूसरे को नीचा दिखाने खुद भी कीच में छलांग लगाए पड़े हैं। कीच से एक दूसरे पर किचकिच की कैंची चल रही है। इस तरह वे विचारमग्न थी,और बड़ी व्यग्र भी हो रही थी।

अपनी विज्ञान की कक्षा में आज उन्हें ओजोन परत में छेद का कारण और विकिरण को समझाना था।

मन में देश की ओजोनपरत में ही उन्हें छेद होते दिखाई दे रहे थे,जो कि देश की प्रगति, स्त्री सशक्तिकरण, धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रवाद आदि महत्वपूर्ण भागों से मिलकर बनी हुई थी। दिल विचारमग्न और हाथ चाक से चलायमान थे।

थोडा सा व्याख्या करने के बाद

श्यामपट्ट पर वे समझा रही थी,जब चित्र पूरा हुआ तो सबने देखा कि ओजोनपरत की जगह राष्ट्र हित लिखा हुआ है ,विकिरणों की जगह अलगाव, जातीयता,स्वार्थ और इससे राष्ट्रहित का क्षय होता बताया गया था।

एक बच्चे ने चौंककर कहा मैडम ये आपने तो कुछ अलग ही लिख दिया।

तभी मैडम चौंकी वे बोली मुझे क्षमा करो बच्चों। आज तबीयत ठीक नहीं कल पढा़ती हूं। अब बाकी का पाठ कल समझेंगे।

थोडी़ देर बाद सब बच्चे एक स्वर में बोले जी मैडम पर आज का पाठ हम समझ गये। और कभी नहीं भूलेंगे।

2 टिप्पणियाँ

  1. विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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