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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 240 // छतरी // दर्शना बांठिया

प्रविष्टि क्रमांक - 240

दर्शना बांठिया

छतरी....

"इतने महीनों बाद फोन किया है तूने...अब तो विदेश से लौट आया होगा तू, दीवाली भी नहीं मना पाई तेरे और बच्चों के  साथ इस बार ,अब तू मुझे लेकर क्यों नहीं जाता यहां से..."मां ने अपने बेटे मनन को झूठमूठ डांट लगाकर कहा।

मन ही मन सोच रही थी कि मनु को विदेश जाना पड़ा इसलिए उसने मुझे वृद्धाश्रम छोड़ा,वरना मुझे अपने से दूर न करता।

"बोल न मनु ,आ गया तू शहर..."

मनु  सोच रहा था कि मैं तो कभी विदेश गया ही नहीं,विदेश तो केवल बहाना था,मां से पीछा छुडाने का।

"हां ..मां मैं आ तो गया पर अभी कुछ दिन काम बहुत है,तो समय नहीं है मुझे तुमसे मिलने का ,अगले महीने  देखता  हूं"कहकर मनन ने फोन झट से रख दिया।

"मनु...मनु..."मां चिल्लाने लगी ,और आंसुओं की धारा बह गई।

सेवक दीनू आता है ,और कहता है"अम्मा जी आज तो बाजार में इतनी भीड़ थी कि पूछो मत...ऊपर से ई छतरी....बार-बार अड़ रही थी सामान में ,पूरे रास्ते इसको संभालना मुश्किल हो गया, मौसम भी अजीब है ,कभी बारिश ,कभी धूप"कपड़े झटकता हुआ दीनू अंदर चला गया।

मां ने मन में सोचा कि हम बूढ़े मां-बाप भी छतरी ही है,जब बारिश(जरूरत)होती है,तब इस्तेमाल करते है,वहीं बारिश खत्म होने पर हम अखरने लगते है।

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