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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 248 // बेटी या बेटा // सीमा गर्ग मंजरी

प्रविष्टि क्रमांक - 248

सीमा गर्ग मंजरी


बेटी या बेटा ~


हमारे पड़ोस में दो घर छोड़कर तीसरा घर बीना जी का है। मृदुल स्वभाव से परिपूर्ण सबकी मदद के लिए तत्पर रहने वाली बीना जी आज स्वयं अशक्त थीं। हालात हाथों मजबूर हो अपनी जिंदगी के दिन गिन रही थी।

बीना अपने संयुक्त परिवार में रहती थी। तीन बेटे, तीन बहुओं का नाती पोते सहित भरा पूरा परिवार था। एक बेटी थी। वह भी बाल बच्चों वाली थी और अपनी ससुराल में संतुष्ट थी।

बीना के पति का दो साल पहले स्वर्गवास हो गया था। जब तक पति जिन्दा थे। तब तक परिवार में सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था। किंतु पति की आँखें बंद होते ही बीना की तीनों बहुओं ने नजरें फेर ली। बेटे तो कामकाजी थे। सुबह के निकले रात तक घर पहुँचते। बीना को तो घर में रहकर बहुओं से निभाकर ही चलना था। अगर कभी बेटे कुछ पूछते या बीना से दो चार बातें होती तो अगले दिन घर कलहखाना बन जाता। बहुयें अपने खिलाफ कुछ न सुनना चाहती थी। अपने पतियों के सामने बढ़ चढ़कर बोलती एक बात के चार जवाब देतीं। आजकल के जमाने की लड़कियाँ किसी से नहीं दबतीं। जैसे हमारा मन करेगा वैसे रहेगी। हम दबकर क्यों रहें। अपने पतियों की कमाई पर ऐश करने का हमारा हक है। बहुओं के बदले व्यवहार से और पति की मौत के गम से बीना को गहरा आघात लगा था। इस सदमे को बीना ज्यादा दिन सहन नहीं कर पाई और वह अधरंग की शिकार हो गयी।

कहने को नौकर चाकर वाला घर था पर बीना की देखभाल के लिए किसी के पास समय नहीं था। तीन ~तीन बहुयें होने के बाद भी कोई सी बहू बीना के पास आकर न फटकती। खाने ~पीने एवं अपने अन्य कामों के लिए बीना नौकरों पर निर्भर थी। बहुयें रसोई में अपने खाने पीने के काम निपटाकर अपने कमरों में पहुँच जाती। घंटों अपनी सहेलियों से गप्पे लडाती। अपने घर की दास्तान सुनने, सुनाने में अपने मायके फोन पर बतियाती रहतीं। जब मन करता बाजार को निकल जाती। जो दिल करता आर्डर करके बाहर से मँगवा लेतीं। कभी सहेलियों के साथ फिल्म देखने निकल जातीं। कभी सज धजकर किट्टी पार्टी में मौज मनाती। पूरे दिन अपनी मनमानी करती। बीना ने खाना खाया है या नहीं खाया है उन तीनों में से किसी को कोई सुध या परवाह नहीं थी।

बीना अकेली पडी ~ पडी अपने भाग्य को कोसा करती। रोती रहती। अपने पति की यादों में डूबी रहती।

ले देकर एक बेटी ही थी जिसका फोन सुबह शाम आता था। जब कभी बच्चों की छुट्टी होती या उसे समय मिलता वह अपनी माँ के पास दो तीन दिन रहने के लिए आ जाती। बीना उससे अपने मन की पीडा कहती। सुख, दुख बाँट लेती। कुछ दिल हल्का होने का अहसास होता। मन का लावा आसुँओं के समुन्दर में बह निकलता। अन्तर्मन की पीडा कुछ कम हो जाती। वो दो तीन दिन कैसे कट जाते बीना को पता ही नहीं चलता था।

बहुयें माँ, बेटी के प्रेम को लेकर ताने मारती। उन्हें माँ बेटी का प्यार तो दिखता किंतु अपनी कमियों की ओर कोई ध्यान नहीं देती। अपने स्वभाव की कमी को वो देखना नहीं चाहती। एक घर में रहते हुये भी सास माँ से बोलने से कतराती। और मन ही मन प्रार्थना करती ~ हे भगवान! इस बुढिया से हमें कब छुटकारा मिलेगा। कब यह मरेगी और हमें इसकी सूरत देखने से छुट्टी मिलेगी।

बीना सरल स्वभाव की स्त्री थी। कभी किसी से कुछ न कहती। बीना घर को कलह का अखाडा बनने से डरती थी इसलिए अधिकतर चुप ही रहती थी। जब पति जिन्दा थे और बेटों की शादी नहीं हुई थी तब यही बीना पूरे दिन चक्करघिन्नी के जैसे सारे काम निपटाती। बच्चों के मुँह से निकली हर फरमाइश पूरी करने के लिए रसोई में जुटी रहती। सुबह सवेरे सबसे पहले उठकर नहा धोकर मंदिर जाती। अपने परिवार के सुख की खातिर अनेकानेक प्रार्थना करती। बच्चों की परवरिश करने के लिए अनेक संकटों का सामना बीना ने अपने पति के साथ मिलकर किया था।

परिवार की खुशियों और प्रसन्नता की धुरी रहने वाली बीना आज बहुओं के सामने अशक्त परकटे पंछी जैसी बन कर रह गयी थी। बीना की ऐसी हालत देखकर मुझे लगता कि क्या ऐसी हालत होने के लिए ही माँ बाप अपनी मुरादों में चाँद सा बेटा माँगा करते हैं। अपने मन से बेटे के होने का मोह कम नहीं कर पाते हैं। बेटा अन्तिम समय में क्रियाकर्म करके उन्हें मुक्ति देगा। जिस बेटे की बहू जीते जी दो रोटी के लिए तरसा दें। या प्यार भरे दो मीठे बोल बोलने के लिये तरसा दे। दवाई गोली, हारी बीमारी जैसे जिम्मेदारी न निभाये। सास, ससुर या ससुराल के नाते रिश्तों को बोझ समझें। उन ऐसी मानसिकता वाली बहुओं से तो आज की बेटियाँ ज्यादा सुखी और सार्थक सोच रखने वाली हैं। अगर बेटे होने के बाद भी माँ की हालत बीना जैसी हो तब ऐसे बेटे के होने या न होने से क्या फर्क पड़ता है। जायदाद के सारे हक बेटे बहू के नाम फिर क्यों हों। और अपनी जिम्मेदारी को ना समझने वाले बच्चों से ज्यादा अच्छा है कि भले ही ईश्वर बेटी दे जिसे माँ बाप सार्थक सोच और सकारात्मक चिंतन, संस्कारों वाली शिक्षा देकर भविष्य की जिम्मेदारी उठाने के काबिल बनाये। और साथ ही ससुराल में सम्बन्धों को निभाने की समझ, सलीका देकर दोनों परिवारों की इज्जत और मान मर्यादा को निभाने की सीख देकर पालन करें।

बेटे या बेटी होने से कोई फर्क नहीं होता। फर्क हमारी सोच में होता है। इस फर्क को मिटाने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि माँ की गोद में जो भी खेले, माँ का आँचल जो ममता से भर दे वही अनमोल रतन है। बेटा हो या बेटी पढ़ लिख कर काबिल बने और परिवार को संबल देने के लायक बने।

✍ सीमा गर्ग मंजरी

मेरठ

5 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है, आपकी सलाह, सुझाव हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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  2. ह्रादिक धन्यवाद सर..
    मेरी रचना को पत्रिका में स्थान देने के लिए..

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  3. सीमाजी, आपकी यह कहानी "घर-घर की कहानी है" इस कहानी में आपको ज़्यादा महत्व "संस्कार" को देना चाहिए । आज़कल यह देखा गया है, बहू की मां अपनी बेटी के दिल में सास-ससुर और देवर-जेठ के ख़िलाफ़ ज़हर भरती आई है । यही झगड़े का कारण है । ऐसी संस्कारहीन बेटियां क्या काम की ? अच्छा है, ऐसी बेटियों की शादी नहीं की जाए । जो औरत नाम पर धब्बा साबित होती है ।
    दिनेश चंद्र पुरोहित

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