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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 259 से 261 // संध्या चतुर्वेदी

प्रविष्टि क्रमांक - 259


संध्या चतुर्वेदी

अंधविश्वास

सीता प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी,तेज ज्वर चढ़ गया था,दर्द की वजह से उस की चीख निकल रही थी और सब तमाशा बने देख रहे थे। पूरे अस्पताल में भीड़ जुड़ गयी थी।

तभी अचानक डॉ आयी और कहा कि जल्दी एडमिट करो, सीता की हालात सीरियस है, ऑपेरशन करना होगा।

इस का पति कौन है, जल्दी जा कर फॉर्म भर दो।

अन्यथा देर हो जायेगी।

लेकिन सीता की सास और ससुर बोले, कि पंडित जी ने एक घण्टे बाद का समय दिया है, उस से पहले हम ना तो बहू को भर्ती करेंगे और न ही ऑपेरशन करवाना है। आप कोई दवा दे दो की बच्चा एक घण्टे रुक जायें पेट में।

डॉ ने समझाया कि सीता के पानी की थैली फट चूंकि है और खून भी बह रहा है, जल्दी बच्चा नहीं हुआ तो उस की जिम्मेदारी नहीं है।

सीता के ससुराल वाले पंडित के दिए समय का इंतजार कर रहे थे,कि सीता ने अंतिम सांस लेते हुए, अपने प्राण त्याग दिए।

डॉ, ने बताया कि पेट में बेटा था। सीता को पहले आठ बेटियां थी। बेटे की चाह में जान गवानी पड़ी।

पंडित के दिए मुहूर्त से पहले सब घटना खत्म हो चुकी थी।

सीता की जान का क़ौन जिम्मेदार था? क्या मुहूर्त जरूरी था और था तो फिर उस मुहूर्त से पहले सीता की जान क्यूं गयी??

अन्धविश्वास कब तक मासूम का ग्रास बनाएंगे??

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प्रविष्टि क्रमांक - 260

संध्या चतुर्वेदी

अनकहा सा कुछ

अमित और नेहा एक ही कॉलोनी में रहते थे। अकसर रास्ते में आते जाते दोनों की निगाहें एक दूसरे को देख लेती और एक अनजाना संवाद भी हो जाता था। लेकिन कभी बात नहीं हुयी दोनों के बीच।

एक दिन नेहा घर में अकेली थी,और उस की तबीयत इतनी खराब हो गयी कि डॉक्टर के जाने में भी खुद को असमर्थ महसूस कर रही थी। बहुत हिम्मत जुटा घर से निकली, रास्ते में कोई रिक्शा या सवारी नहीं मिल रही थी।

बीमारी की वजह से नेहा को चक्कर आने लगा। तब ही उस की नजर अमित पर गयी जो अपनी बाइक से कही जा रहा था।

बाइक नेहा के पास आ कर रुकी तो नेहा की नजर अमित से मिली और अमित ने कहा-आप की तबीयत ठीक नहीं, कहीं जाना है। क्या मैं छोड़ दू?

नेहा ने देखा और सोचा अनजान पर विश्वास करना चाहिए,लेकिन बीमारी की वजह से ना नहीं कह पायी।

अमित ने नेहा को डॉक्टर तक छोड़ के खुद चला गया और पीछे बहुत कुछ अनकहा अनजाना सा रह गया।

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प्रविष्टि क्रमांक - 261

संध्या चतुर्वेदी

तर्पण


आमतौर पर किसी मृतक को ,उस के श्राद्ध तिथि को दिया जाने वाला भोज्य पदार्थ को तर्पण कहते हैं।

कितनी अजीब बात है,आज मुन्नी की तीसरी पुत्री का जन्म हुआ था। जैसे ही नर्स ने के कन्या जन्म की बधाई दी। दादी ने फुट फुट कर रोना शुरू कर दिया।

धीरे से हिम्मत जुटा पुत्र रमेश माँ के पास आया,

बोला माँ क्यों रोती हो ?

आज कल बेटी भी बेटों से कम नहीं।

जो भगवान की मर्जी उसे स्वीकार कर लेना चाहिए।

माँ ने तुनक कर रमेश से कहा,"बेटी भले ही बेटों के सारे काम कर ले,लेकिन आज भी तर्पण का अधिकार सिर्फ और सिर्फ बेटों को हैं"।

मरने के उपरांत अगर बेटा तर्पण ना करे,तो पुरखों को नरक की यातना भुगतनी पड़ती है। जा-जा ये सब बातें हमें ना सिखा।

लगता हैं बिना पोते के तर्पण भी नहीं होगा?

क्या आज भी एक पुत्री को हक़ नहीं कि वो तर्पण कर सके??

ये भेदभाव की सोच कब बदलेगा समाज??

2 टिप्पणियाँ

  1. विशाल चौहान10:48 pm

    सम्माननीया संध्या जी को बहुत बहुत साधुबाद,हार्दिक बधाई व आशीर्वाद,आज ऐसे जागरूकता की बहुत आवश्यकता है,इन विषयों पर और कुठाराघात करना बहुत आवश्यक है।
    जयहिन्द

    जवाब देंहटाएं
  2. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है आपकी सलाह, सुझाव हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं

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