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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 262 व 263 // रोली अभिलाषा

प्रविष्टि क्रमांक - 262


रोली अभिलाषा

1.समय के बहाने

"सुनो दिया आज भी स्कूल जाने से मना कर रही है." मेरे कहते ही ये झल्ला उठे.

"तुम लोगों का तो रोज का यही हो चला है. मैं ऑफिस देखूं या घर तुम्हीं बताओ. तुम्हारे पास बस एक काम है बच्चे को सम्हालना ये भी ढंग से नहीं हो पाता." कहते हुए नहाने चले गए. मैंने गुस्से में आकर दिया को मारा और धमकाकर स्कूल वैन तक घसीटते हुए ले गई. वैन में बैठते हुए भी वो सिसककर मुझे ही देखे जा रही थी.

घर आने पर कुछ अनमनी सी थी मैं पर काम करते हुए भूल गई.

यही कोई ११ बजे स्कूल से उसकी अनुपस्थिति का संदेश आया. स्कूल, पुलिस, मीडिया शाम ४ बजे तक यही चला और फिर हमारी ज़िंदगियों पर रक्तिम पूर्णविराम का हस्ताक्षर अंकित हो गया. बच्ची का रक्त-रंजित, अस्त-व्यस्त शव मेरी गोद में है.

अभी सुबह तक हमारे पास समय नहीं था कि बच्ची को देते और अब कोई कारण ही नहीं बचा जो व्यस्त हों. गुनाह के बोझ से दबी इनकी नजरें ठीक उसी जगह ठहरी हैं जहां सुबह झिड़की दी थी. समय भाग्य के पहलू में है.

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प्रविष्टि क्रमांक - 263

रोली अभिलाषा

2. बेटियां

मैं अस्पताल के बर्न डिपार्टमेंट के बाहर सीढ़ियों पर बैठकर डॉक्टर का राउंड खत्म होने की प्रतीक्षा कर रही थी. जनवरी की धूप भी मुझे चिलचिलाहट महसूस करा रही थी. बच्ची का स्कूल छूटने का वक़्त हो चला था शायद मुझे चाचाजी को बिना देखे ही जाना पड़े. पिछले 25 दिसम्बर से यही चल रहा था. विनी की छुट्टी हो गई उसे घर पर अकेला कैसे छोड़ती और अस्पताल लाना ठीक नहीं था. चाचाजी हर रोज पूछते विनी की मां नहीं अाई और ये उतरे हुए चेहरे से मुझे बताते. जबसे शादी होकर आई तबसे चाचाजी को ही अपना श्वसुर माना और उन्होंने भी मुझे अपनी बहू से कम मान नहीं दिया. जो शॉपिंग श्वेता के लिए होती वही मेरे लिए. हमेशा कहते तुम तो बड़ी बहू हो इस घर की. हम दादा की कमी तो पूरी नहीं कर सकते पर यह कोशिश तो हमेशा रहेगी कि तुम्हें कोई कमी न हो. विनी के होने के समय तो उनका स्नेह देखते बनता था. पूरी रात अस्पताल के वेटिंग रुम में कुर्सियों पर बिता दी थी वो भी कड़कती ठंड में. आज मैं अपने बच्चे के लिए इतनी मजबूर हो गई कि ...शायद ममता इंसान को स्वार्थी बना देती है.

पीछे अचानक से आई वृद्ध दंपत्ति की आवाज ने मुझे अतीत से वापस खींचा. किसी बात पर बहस हो रही है.

"कुछ भी हो हम अपनी बेटी को इस हालत में पहुंचाने वाले को माफ़ नहीं कर सकते."

"मगर एक बार ये भी सोचो वो पैसे वाले हैं. उनके आगे हमारी नहीं चलेगी और फ़िर हमारे पास केस लड़ने के लिए पैसा कहां से आएगा. जो था अब तक दहेज़ में हवन कर दिया."

"तो क्या हमारी बेटी को इंसाफ नहीं मिलेगा?" इतना कहते ही आंटी फफक कर रो पड़ी. तभी वहां दूसरे पक्ष के वकील आ गए.

"देखिए सदानंद जी, आपकी ये बेटी तो चली गई क्या दूसरी बेटी की चिंता नहीं? बस आप पैसे बोलिए और रफ़ा-दफा करिए इसे यहीं. आपका बुढ़ापा मजे में कट जाएगा. नहीं तो पूरी ज़िंदगी जूते घिसने में निकल जाएगी. दर-बदर हो जाएंगे. न बन पड़े तो बिठा देना अपनी बेटी को कोठे पर..." वकील अनाप शनाप बकते हुए निकल गए. अंकल जो अब तक आंटी को ढांढस बंधा रहे थे खुद भी किसी बच्चे की तरह बिलखने लगे. सारा माजरा अब तक समझ में आ चुका है मुझे. एक और बेटी दहेज़ की बलि चढ़ी. सच जानते हुए भी मां बाप निरीह से हैं. पैसा, रसूख, पहुंच एक बार फिर ममता, स्नेह और मानवीय संवेदनाओं को कुचल रहा है. समाज की ये दर्दनाक तस्वीर एक करारा तमाचा है असभ्य, हैवान समाज के गाल पर. कब कांपेगी रुह उनकी जो पराई बेटी को जलाते वक़्त ये भूल जाते हैं कि उनकी लाडली भी कभी पराई होगी.

पीछे की दीवार पर लगी घंटा घड़ी मुझे स्कूल जाने का संकेत कर रही है. आज इतनी कोशिश के बावजूद मैं चाचाजी से बिना मिले ही लौट रही हूं. सड़क पर आते ही मेरे कदमों ने रफ़्तार पकड़ी. एक बार फ़िर उसी सड़क पर आ गई जहां ममता, स्नेह, भावनाएं कुछ भी नहीं हैं. हर इंसान एक चेहरे पर लगा मुखौटा है बस. विनी का ख़याल आते ही मन घुटने लगा...वो भी तो बेटी है.

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परिचय-
नाम: रोली अभिलाषा
जन्मतिथि: 11 मार्च
सम्प्रति: काउंसलर @ आर पी शाह मेमोरियल ट्रस्ट, लखनऊ।
लेखन: स्वतन्त्र लेखन गद्य एवम पद्य।
वर्ष 1995 से समाचार-पत्र में पाठकों के पत्र से लेखन कार्य प्रारंभ हुआ
जो आप सबके सहयोग से निरन्तर जारी है। समाचार-पत्रों के अतिरिक्त मेरी
सहेली, महकता आँचल, सुरभि, रूप की शोभा, ग्रह-शोभा आदि पत्रिकाओं में
प्रकाशन।
वर्ष 1999 एवम 2000 में जे एम डी प्रकाशन दिल्ली से काव्य संग्रह
"काव्य-गरिमा" और "एकता की मिसाल" में कविताओं का प्रकाशन। जिसका
लोकार्पण संसद के केंद्रीय सभागार में माननीय मुरली मनोहर जोशी जी के
द्वारा हुआ।
प्राची पब्लिकेशन की ओर से "पंखुड़ियां" 2017 नामक कहानी संग्रह में देश
भर के 24 लेखकों में मुझे स्थान मिला।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माननीय फेरिक ग्रे जी की एनथोलॉजी "Dream Catchers
Part-IV" 2017  में स्थान मिला

A collaborative love poem with Dr. Ashutosh in an Anthology "Eternally"

आतिश-२ एनथोलॉजी में प्रकाशनार्थ प्रतीक्षारत

Published book: "बदलते रिश्तों का समीकरण" 2018

1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है आपकी सलाह, सुझाव हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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