नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 264 // परिस्थिति // सुधा शर्मा

प्रविष्टि क्रमांक - 264

सुधा शर्मा

परिस्थिति

कक्षा में प्रवेश करने से पहले ही मुझे प्रदीप सागर का चेहरा याद आ जाता। उसकी भोली शक्ल मेरी आँखों में नाच उठती लेकिन उसकी शरारतों से मेरा दिल दहल जाता। केवल उसकी अध्यापिका होने का गर्व शायद मुझे इसे बात को स्वीकार करने  से रोकता है,अन्यथा वास्तव में मैं मन ही मन उससे डरती थी। उस पर किसी बात का असर  ही नहीं  होता था। उसके आस- पास बैठे विद्यार्थी हमेशा उसकी शिकायत करने में तल्लीन रहते। वह स्वयं न पढ़ता था न पढ़ने देता था। मेरी ही नहीं अन्य अध्यापिकाओं की भी यही शिकायत थी। उसके कारण कोर्स काफी पीछे रह जाता। अगर उसे पीटने के लिए हाथ उठाती तो वह बडी फुर्ती से शरीर को ऐसे मोड़ता कि अपना ही हाथ डेस्क पर आकर लगता। छडी के प्रयोग का भी विशेष लाभ नहीं था उसकी फुर्ती के कारण छडी इधर- उधर लग जाती फिर या तो डॉ. के पास ले जाना पड़ता या प्रिसिपल से सुननी पड़ती या अगले दिन घर से शिकायत आ जाती। ऊपर से यह कथन तो दिमाग में तूफान मचा देता कि " कैसे अध्यापक हो जो एक बच्चे को कंट्रोल नहीं कर सकते। किसने बना दिया तुम्हें अध्यापक? कहीं कोटे से हो क्या? यह सुनकर प्रयास करने  पर भी माथे की सिलवटें हटती नहीं थी। मन करता था या तो रिजाइन दे दूँ या इस बच्चे का नाम रजिस्टर से गायब कर दूँ, लेकिन हमारी मजबूरी हम दोनों ही काम नहीं कर सकते थे । 

     कभी - कभी तो वह घर आकर भी दिमाग पर छाया रहता। और मेरा मन उसके माँ- बाप को सोचकर चिंतित हो जाता " कैसे सँभालेंगे वो अपने बच्चे को ?,वो उनका भविष्य है वैसे भी तीन बहनों का इकलौता भाई। उसकी करतूत देखकर उसके माता- पिता का भविष्य अँधकारमय नजर आता। कुछ दिनों बाद मेरा ट्रासफर हो गया।

     कई वर्ष बीत गए। स्कूल में नए प्रधानाचार्य के आने की चर्चा जोरों पर थी। उनके अनुशासन, कार्यप्रणाली, की प्रशंसा उनके आने से पहले ही स्कूल में पहुँच गई थी। और स्कूल का स्टाफ उनके स्वागत में तन्मयता से तैयारी में जुटा था। स्कूल के चपरासी साफ- सफाई में जुट गए थे। कार्यवाहक प्रधानाचार्य स्कूल की शोभा बढाने में जी- जान से जुटे थे। चार्ट पेपर  पर सूक्तियाँ लिखी जा रही थी। चार्ट पेपर के बैकग्राउंड में हल्के रंग से सुन्दर चित्र बने थे। कार्यवाहक  प्रधानाचार्य के निर्देशानुसार चार्ट बनाने का कार्य मैं निभा रही थी। दो दिन की भागादौडी के बाद स्कूल का नक्शा बदल गया था और अगले दिन सम्माननीय प्रधानाचार्य जी आ गये थे। आते ही उन्होंने परिचय के लिए एक मीटिंग रखी। नवयुवक प्रधानाचार्य को देखकर स्टाफ धन्य हो रहा था। प्रत्येक चेहरे की स्निग्ध मुस्कान नवागंतुक प्रधानाचार्य को पाकर प्रसन्नता का परिचय दे रही थी। उनके संबोधन में अति आत्मीयता से प्रत्येक हृदय गदगद था। अति विनम्र शब्दों में उन्होंने अपनी कार्यशैली समझा दी थी  और अवज्ञा करने पर विनम्र चेतावनी भी दे दी थी।

     मीटिंग में उनकी दोनों आँखें निरन्तर मुझे घूर रही थी, जो मेरे अंदर उत्सुकता, शक, और डर का मिलाजुला भाव पैदा कर रही थी। मीटिंग समाप्त हो गई। सब कुर्सी से उठने के लिए उत्सुक थे। लेकिन कोई भी अपना इम्प्रेशन खराब करना नहीं चाहता था। उठने की शुरूआत प्रधानाचार्य ने ही की। लेकिन सबकी आँखें उस दृश्य को देखकर आश्चर्यचकित और भाव विभोर थी। प्रधानाचार्य मेरे पास आकर मेरे पाँव छू रहे थे। मेरी आँखें छलक आई जब उन्होंने अपना परिचय दिया" आपकी कक्षा का सबसे उद्दण्ड बालक।

   प्रधानाचार्य अपने  आफिस में जागकर बैठ गए । लेकिन मेरे प्रति सबके मन में कौतूहल पैदा कर गए।

मैं भी अपने मन की जिज्ञासा शांत करना चाह रही थी

अत: मैं सीधे आफिस गई और चुपचाप जाकर खडी हो गई। वो मेरी मौन भाषा को पहचान गए। वो अपनी सीट से खडे हो गए और उत्सुकता से बोले -" मैडम मैं आपका अपना प्रदीप सागर। आप सोच रही होंगी कि कक्षा सबसे उद्दण्ड बालक कैसे सुधर गया। मैडम ईश्वर के निश्चित नियम हैं । जिसे कोई नहीं सुधार सकता उसे परिस्थितियाँ सुधार या बिगाड़ देती हैं।

   चौदह- पन्द्रह साल की उम्र तक भी मैं बहुत नालायक था। पढ़ने में होशियार था वो एक अलग बात थी। जब मैं बारहवीं में था तभी पापा की अचानक मौत ने बहुत बड़ा झटका दे दिया। अब आधी रात तक सड़कों पर खडे होकर दोस्तों से बातें करना, तफरी करना एकदम गायब हो गया। माँ बिल्कुल अकेली पड़ गई। जिम्मेदारी का अहसास हुआ। अब मेरे अंदर बडे भाई की जगह एक पिता की भावना ने जन्म ले लिया था। माँ अनपढ़ होने के बावजूद भी बहुत हिम्मतवाली थी। उसने घर के बाहरी हिस्से में सब्जी की दुकान खोल ली। मैंने बी.एस. सी. के साथ-साथ ट्यूशन देनी शुरू की । एम एस सी के बाद आपके आशीर्वाद से नेट क्लीयर किया और प्राइवेट पढाते- पढाते तीन साल में पी एच डी पूरी कर ली । तुरंत सरकारी नौकरी लग गई। तीनों बहनों की शादी की। फिर अपनी शादी की और अब आपके सामने खडा हूँ।"

    मैं सुनकर बडी प्रसन्न हुई लेकिन बडी आहिस्ता से बोली-"तुम्हें सबके सामने मेरे पाँव नहीं छूने चाहिए थे। आखिर तुम यहाँ प्रधानाचार्य जैसी गरिमामय पोस्ट पर आए हो।"

वे हँसे और बोले -"मैडम आप मेरी गुरू थी और गुरू से गरिमामय पद कोई हो नहीं सकता।"

मेरी आँखों से खुशी के मोती झर रहे थे और दिल से आशीर्वाद की बरसात हो रही थी। आज विश्वास हो गया था ईश्वर परिस्थितियों से सबको नियन्त्रित   कर लेता है।

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.