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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 265 व 266 // दिलीप कुमार

प्रविष्टि क्रमांक - 265

दिलीप कुमार


देवी-देवता

बोरी संभालते हुए बटेश्वर ने गर्दन को थोड़ा झुका लिया और कांपते हुए बोला, "जागे बाढ़ तो उतर चुकी है ,मगर राहत का सामान अब मिला "।

"सरकारी काम है ,साहब लोग टाइम लगा ही देते हैं "जागे ने चावल की बोरी को अपनी पीठ पर थोड़ा और चढ़ाते हुए कहा ।

बटेश्वर छूटते ही बोला "मगर सामान तो आठ नौ दिन पहले ही आ गया था यहां गांव में ,बाढ़ उतरे भी तो 15 दिन हो चुके हैं "बटेश्वर ने निर्विकार भाव से कहा।

" तो कुछ काम रहा होगा साहब लोगों ने माल की जांच पड़ताल कर ली होगी ,तभी बटना था ,मूने बता रहा था ।"

बटेश्वर तमक कर बोला "सारी जांच पड़ताल मूने ने ही तो की है , दिनभर माल की चौकीदारी और रात को बोरियां हल्की करता था।" बटेश्वर बात को समझ गया ,वह हौले से बोला "जाने दो ,कोई सुनेगा तो आफत आ जाएगी । मूने ने चावल की बोरी से 5 किलो दाल आधा किलो तेल नमक सब चुराया है और यहां तक कि बच्चों का बिस्कुट भी "।

जागे ने लोगों की आमदरफ्त मापी और कहा "प्रधान कह रहे थे कि जो सामान बाढ़ राहत वालों से काटा जाएगा ,वह दुर्गा पूजा की कीर्तन कमेटी को जाएगा 'जागे ने धीरे से कहा तो कीर्तनिया लोग गरीब गुरबा का धन खाकर गाएंगे और देवी देवता को खुश करेंगे "

बटेश्वर ने समझाते हुए कहा "प्रधान कहते है कि किसी देवी देवता की कृपा रही ,तभी इस भयंकर बाढ़ में इधर का बांध नहीं टूटा और गांव बच गया ,इसलिए पूजा पाठ में पूरे गांव से चढ़ावा जाना चाहिए । जागे ने बुदबुदाते हुए कहा "ई बाढ़ भी तो कोई देवी देवता ही लाते होंगे, ऐसा ही था तो उनको पहले ही चढ़ावा दे देते इतना दुख तबाही काहे को झेलते "।

बटेसर ने भी जागे की बात को दोहराया" हां ,ई बाढ़ भी कोई देवी देवता ही लाते होंगे "।ऐसा कहते हुए बटेश्वर ने अपने घर की तरफ जाने वाली पगडंडी पकड़ ली । जागे अभी वहीं खड़ा यह सब बुदबुदा रहा है ।

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प्रविष्टि क्रमांक - 266

दिलीप कुमार


‘घिनौना’

‘‘पंडाल का माहौल बहुत इमोशनल था। सभी की मानवीय संवेदनायें हिलोरे मार रही थी। जिस तरह लोगों के जेहनी जज्बात थे वैसा ही अगर सब सोचते तो ये सताये हुये लोग यहाँ क्यूं जमा होते। नेताजी राजधानी से चलकर इस छोटे से जिले में आये थे तेजाब पीड़ित लड़कियों को सरकारी इमदाद देने। ये जिला खासा कुख्यात था न जाने कितने हमले तेजाब पीड़ित लड़कियों पर हो चुके थे। नेताजी के मसरूफ दौरे के मददेनजर आस-पास के जिलों की लड़कियां भी यहीं बुला ली गयी थीं। माइक पर पहले हर लड़की की दुख भरी कहानी सुनायी जाती थी, जनता उसके दुख में साझी होती तब नेताजी उस लड़की को चेक और आशीर्वाद देते थे। पूरा पंडाल दुख और उदासी के साथ मानवीय संवेदनाओं से सरोबार था और उनकी भावनाओं को माइक पर शब्द दे रहे थे नेताजी के पीए। सात-आठ लड़कियों को चेक देने के बाद नेताजी इतने इमोशनल हुये कि उन्हे चक्कर आ गया और वे बेहोश होकर गिर पडे़। उनकी चेतना तुरंत लौट भी आयी मगर उन्हें डाक बंग्ले ले जाया गया। उनकी अनुपस्थिति में कार्यक्रम सुचारू रूप से संपन्न हुआ, उनकी मानवीयता की मिसालें दी गयी।

रात को डिनर के वक्त उनके पीए ने जब उनकी महानता के कसीदे गढे़ और कार्यक्रम की बाकी की लड़कियों के विषय में विस्तार से बताना शुरू किया तो नेताजी चिल्लाते हुये बोले ‘‘चुप कर नालायक, फिर उल्टी करवायेगा क्या। उन जली-कटी लड़कियों के चेहरे दिन भर याद आते रहे और मुझसे कुछ खाया न गया। इतने घिनौने चेहरे मुझे दिखाने की जरूरत ही क्या थी’’?

नेताजी के पीए को चमचमाती रोशनी में नेताजी का दमकता चेहरा अचानक घिनौना नजर आने लगा था।

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आनंद बाग,बलरामपुर,

उत्तर प्रदेश

ईमेल  dk_writer@yahoo.co.in

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1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है आपकी सलाह, सुझाव हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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