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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 267 // इज्जत // निशा मिश्रा


प्रविष्टि क्रमांक - 267




निशा मिश्रा
इज्जत
आज इस शरीर की पीड़ा सही नहीं जा रही है। पता नहीं क्यूं उठा नहीं जा रहा है? " रमा ने अपनी बडी जेठानी से कहा- उसकी आवाज उसके दर्द को बयान कर रही थी, " क्यूं क्या हुआ?" जेठानी ने धीमे स्वर में पूछा।
"दीदी अगर किसी स्त्री की इज्जत लूट ली जाती है। तो वह समाज में अपराधी दिखाई देता है। लेकिन दीदी मेरा क्या? जब अशोक शराब के नशे में धूत कमरे आता है और कई बार मेरी इजाजत बिना रात में कई बार मुझे तार -तार करता है। तो क्या? यह अपराध नहीं है। "

इसकी शिकायत अम्मा से की तो अम्मा कहती है "पति को खुश रखना तुम्हारा धर्म है। "
क्या? मेरी आत्मा की इज्जत जाते नहीं दिखाई देती। इन्कार करने पर जब वह मुझ पर प्रहार करता है तो वह क्या? सुनाई नहीं देती।
‘’दीदी फर्क इतना है एक स्त्री बंद कमरे में दरिंदगी सहती और एक स्त्री इस बनावटी समाज में। ‘’

यह सब सुन रमा की जेठानी अपने आंसू पोंछते हुए उसे अपने पैरों पर लिटाकर मौन थी कि न जाने ऐसी कितनी रमा और भी होगी। वैसे भी इस समाज में हम केवल भोग्य की वस्तु ही बन कर रह गई है हम क्या सोचती है ? क्या चाहती है ?कभी किसी ने हमसे पूछा ही नहीं कभी कोई पूछे तो बताया जाए इन्हीं के असमंजस सोच में थी रमा की जेठानी ............क्या आज समाज बदला है?
आधुनिकता की बस खोखली चादर ओढ़े पड़ा है केवल ढूंढता है बस अपनी इज्जत।

1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है आपकी सलाह, सुझाव हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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