नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 272 // कान्हा // रूपा साह ‘रूपाली’

प्रविष्टि क्रमांक - 272

रूपा साह ‘रूपाली’

कान्हा

कब से गुलाब बेच रहा था , गा-गा कर। बहुत मीठे थे उसके गीत, मैं उस पर से अपना ध्यान ही नहीं हटा पा रही थी। कितना मधुर स्वर था- प्रेम की निशानी ले लो बाबू,

प्रेम मिलेगा अपार रे...।

खुशियाँ बरसेगी तेरे घर अँगने में,

जीवन में आएगी बहार रे...।

मैं मंत्रमुग्ध सी उस बच्चे को देखती जा रही थी, उम्र होगी कोई 14-15 साल। अचानक वो मेरी कार के पास आता है। ‘ मैडम जी गुलाब ले लो ना।’

‘ कितने का एक गुलाब ? ‘ – मैंने पूछा।

‘ सिर्फ दस रुपए, ले लो ना मैडम जी’

‘ सारे ले लूँगी लेकिन पहले मेरे कुछ सवालों के जवाब दो।’

‘ सारे ! पूछो न क्या पूछना है ? ‘

‘ तुम्हारा नाम ?’

“ माधव “

‘ कहाँ रहते हो ?’

“राधानगर” में।

‘ घर में कौन कौन हैं ?’

‘ सिर्फ माँ है - “ यशमती “।’

‘ ले लो न मैडम जी, सिर्फ तीन ही फूल बिके हैं सुबह से।’

‘ ले तो लूँ पर सोच रही हूँ क्या करूंगी इन फूलों का ?’

‘ अरे अपने पति को दे देना।’

‘पर मेरी तो शादी ही नहीं हुई है।’

‘ अच्छा ! फिर ... फिर वो देखो मंदिर ‘कान्हा’ का, उनके चरणों में रख देना। वो आपकी सारी मुरादें पूरी करेंगे।’

‘ ये ठीक रहेगा लाओ सब दे दो।’

‘ कितने हुए ?’

‘ 400 रुपए।’

वो फूल पकड़ा के और पैसे ले के जाने लगता है।

अरे सुनो ... जी मैडम... ये लो, ये सारे फूल।

वह विस्मित... “नहीं चाहिए आपको ?”… आँखों की सारी खुशी एक पल में मिट जाती है।

‘ अरे नहीं, ये फूल तो मैंने खरीद ही लिये हैं, ये मेरे हैं।’

‘ फिर ... ?’

‘ तुमने कहा था न कान्हा को दे देना।’

‘ हाँ कहा था ... !’

‘ तो तुम्हारा नाम ‘माधव’ , घर ‘राधानगर’, माँ ‘यशमती ‘ तो कान्हा मिल गए न मुझे ‘जीवंत ‘ , और ये फूल तुम्हें समर्पित ...।’

मैंने उसकी ओर देखा - चेहरा श्याम सा, उसकी मुस्कान मनमोहन, आश्चर्यचकित से कमल नयन। मैं मेरे कान्हा का ये सुदर्शन रूप हृदय में समेट आगे बढ़ जाती हूँ।

--

रूपा साह ‘रूपाली’

C/o- RK Sah

Dy Manager, POWERGRID

Maharana Complex, Behind Bus Stop

At/Po/PS/Dist - Boudh, Pin- 762014

Mail ID- ilapur123@gmail.com

.................xxx…………….

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.