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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 294 // प्याऊ की घंटी // अमन पुरोहित

प्रविष्टि क्रमांक - 294


प्याऊ की घंटी

अमन पुरोहित

जोधपुर सेंट पॉल स्कूल का चपरासी बिहारी लाल परेशान हो गया, न मालूम किस क्लास का बच्चा प्याऊ में आकर ग्लास बजाकर चला जाता है ? ग्लास बजने की ध्वनि सुनकर उसे ऐसा लगता..मानों स्कूल के फादर के कमरे में घंटी बज रही हो..? प्याऊ की घंटी सुनकर बेचारा बिहारी लाल, दौड़ पड़ता फादर के कमरे की तरफ़। मगर, वहां जाकर बेचारे बिहारी लाल को, फादर की फटकार सुननी पड़ती। उसे शक हो गया, जब फादर ने घंटी नहीं बजायी तो कोई तो ऐसा शातिर बच्चा है जो उल्लू का पट्ठा घंटी बजाकर उसे परेशान कर रहा है ? खैर, एक दिन प्याऊ के पास छिपकर घात लगाकर वह बैठ गया।

तीसरा कालांश आया, पांचवी क्लास में अनिता मेडम का पीरियड था..मगर वह चिकित्सा अवकाश में रहने के कारण वह स्कूल आयी नहीं। इस कारण, पांचवी क्लास का यह ख़ाली कालांश था। मेडम के क्लास में न आने पर, उसने थोड़ी देर बाद क्या देखा ? पांचवी क्लास का बच्चा तन्मय बाहर आया, और वह सीधा चला गया प्याऊ में। फिर उसने वहां रखी दो पीतल की ग्लासें उठायी, और दोनों ग्लासों को आपस में पांच दफ़े बजा डाला। ग्लास के बजते ही, क्लास से पांच बच्चे बाहर निकले। फिर क्या ? झट बिहारी लाल पड़ोस की क्लासों में पढ़ा रहे दो अध्यापकों को बुला लाया, फिर इन तीनों ने मिलकर इन बेचारे मासूम बच्चों घेर डाला। फिर उन सब को पकड़कर, ले गए फादर के पास।

उन छह बच्चों को देखते ही फादर को गुस्सा आ गया, डांटते हुए उनसे पूछ लिया “कमबख्तों, तुम सभी वे ही बच्चे हो, जो घंटी बजाकर इस बेचारे बिहारी को परेशान करते हो ?”

बेचारे बच्चे कुछ बोले नहीं, चुपचाप खड़े हो गए। अब तो फादर के गुस्से का, कोई पार नहीं रहा। वे झट उन्हें सज़ा के तौर हुक्म दे डाला “नालायकों। बन जाओ, मुर्गा।”

बेचारे बच्चे इंसान होकर भी, सज़ा के तौर पर मुर्गे बन गए। जब-तक तीसरा कालांश ख़त्म नहीं हुआ, तब-तक बेचारे बच्चे मुर्गे बने रहे। आख़िर चौथा कालांश लगा, तब कहीं जाकर उन बच्चों को क्लास में जाने की अनुमति मिली।

मगर, यह क्या ? बच्चे सुधरे नहीं। दूसरे, तीसरे और चौथे दिन भी भी प्याऊ में घंटी बजती गयी, फर्क यह था इस बार अलग-अलग कालांशों में प्याऊ के घंटी बजी। फादर बेचारे परेशान हो गए, वे इस समस्या का कोई हल नहीं निकाल पाए। तब उन्होंने इन बच्चों की जासूसी करने की ठान ली। उन्होंने झट शारीरिक शिक्षक दयाल भय्या को, इन बच्चों की जासूसी करने की सलाह दे डाली। और कहा, बच्चों को मालुम नहीं होना चाहिए कि, तुम उनके पीछे लगे हो।” शाम को ही फादर के पास दयाल भय्या ने रिपोर्ट पेश कर दी, जानकारी हासिल होते ही फादर बहुत ख़ुश नज़र आने लगे। फिर क्या ? झट उन्होंने दयाल भय्या को अगला हुक्म सुना दिया कि, “कल स्कूल में गणतंत्र दिवस मनाया जाएगा। तुम इन बच्चों को बाध्य करके कहोगे कि, कल उनको स्कूल में आना सख्त ज़रूरी है। अगर वे न आये तो, उनके अभिभावकों को उनकी शिकायत भेज दी जायेगी।” दूसरी तरफ़ फादर ने, इन बच्चों के अभिभावकों को दूर-भाष सन्देश भेजकर गणतंत्र दिवस समारोह में बुला लिया।

अगले दिन समारोह में बच्चों को पुरस्कार देते हुए, फादर ने मंच पर इन बच्चों का नाम पुकारा। सुनकर, बेचारे बच्चे सहम गए। बस काटो तो खून नहीं, जैसी स्थिति बन गयी। बेचारे बच्चे धड़कते दिल को थामे मंच पर चढ़े। मगर, यह क्या ? फादर तो खिलखिलाकर हंस रहे थे, मुख्य अतिथि ने झट उठकर उन बच्चों को आशीर्वाद देते हुए उन्हें मालाओं से लाद दिया। फादर ने झट माइक हाथ में लेकर बोले “मुझे इन बच्चों पर बहुत गर्व है, ये बच्चे अपने खाली कालांश का वक़्त जाया नहीं करते, ये सभी पड़ोस की झुग्गी-झोपड़ी की बस्ती में जाकर वहां उन ग़रीब बच्चो को पढ़ाया करते हैं। ये जानते हैं, शिक्षा पाकर ये बच्चे, कल इस देश को विकास के पथ पर ला सकते हैं। सभी बच्चों को, शिक्षा ग्रहण करने का हक़ है। अब कल से इन बच्चों को ग़रीब बस्तियों में जाने की कोई ज़रूरत नहीं, इन ग़रीब बच्चों को स्कूल में बुला लिया जाएगा और खाली कालांश में तालीम ले रहे बच्चे और अध्यापक इनको पढ़ाएंगे। साथ में इस स्कूल से इन ग़रीब बच्चों को निशुल्क पुस्तकें और पोशाकें भी मिलेगी। राज्य सरकार द्वारा दिए जा रहे पोषाहार से इन ग़रीब बच्चों को आहार भी दिया जाएगा। बस, हमारी यह तमन्ना है, देश के सभी बच्चों को शिक्षा मिले, कोई भी बच्चा कमज़ोर आर्थिक स्थिति के कारण पढ़ने से वंचित न रहें।”

फिर क्या ? सभी बच्चों व अध्यापकों ने इन बच्चों का उत्साह बढाने के लिए, ज़ोर-जोर से “प्याऊ की घंटी जिंदाबाद” के नारे लगाए। पुरस्कार प्राप्त करके ये बच्चे जब मंच से नीचे उतर रहे थे, तब उन्हें ऐसा लग रहा था कि, उनके पाँव ज़मीन पर न पड़ रहे हैं..!

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बाल लेखक का नाम – अमन पुरोहित

पिता का नाम – श्री राज़कमल पुरोहित

जन्म-तिथि – १३-१० २००८

विद्यालय का नाम – सेंट पॉल सीनियर हायर सेकेंडरी स्कूल, जोधपुर [राजस्थान].

कक्षा – पांचवी

निवास-स्थान का पत्ता – अंधेरी-गली, आसोप की पोल के सामने, वीर-मोहल्ला, जोधपुर [राजस्थान].

2 टिप्पणियाँ

  1. अमित भले उम्र में काफी छोटा है, मगर इसने जिस बिंदु को उजागर किया है...वह समाजिक व्यवस्था में अभावों में पल रहे बच्चों की ओर इंगित है ! कि, ग़रीब बच्चे अर्थाभाव के कारण पढ़ नहीं पाते । उनको भी शिक्षा प्राप्त करने का हक़ है ।
    दिनेश चंद्र पुरोहित

    जवाब देंहटाएं
  2. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है, आपकी सलाह, सुझाव हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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