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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 306 // जीवन की मुस्कान // एकता उपाध्याय

प्रविष्टि क्रमांक - 306

एकता उपाध्याय

जीवन की मुस्कान

जनवरी की कुनकुनी धूप पर कंपकपी फैलाती हवा वो दो चोटियां बनाये बारह तेरह वर्ष की बच्ची थी जो खेतों के बीच पगडंडियों से होती सड़क तक आती फिर इंतज़ार में पहले से खड़े रिक्शे पर बैठ स्कूल चली जाती है। मैं उसे रोज देखता गोरी सी मासूम सुन्दर किसी भले घर की लगती। कभी सरसों के पीले फूलों से गुजरती गेंहू की बालियो को छूती और पास आ सड़क पर बनी मेरे चाय नाश्ते की दुकान के करीब आते-आते मेरी छोटी सी फुलवारी के फूलों को देखती स्वाभाविक बचपने दिखाती वो उड़ती तितलियों को पकड़ने की कोशिश भी करती।

आज उस का रिक्शा नहीं आया था तो मैंने उसे अपनी छोटी सी दुकान पर बैठने का आग्रह किया जिसे उसने स्वीकार भी कर लिया। "चाचाजी नमस्ते " मैं अभिभूत बहुत समझदार वो नन्हीं बालिका मेरी दुकान का अन्वेषण अपनी नन्ही समझ से कर रही थी साथ साथ कुछ प्रश्न भी। अचानक वो उठी और मेरी दुकान के पीछे चली गई जहाँ एक बूढ़ा ईट का चूल्हा बना कुछ लकड़ियों को जला एक रात की सूखी रोटी गर्म कर रहा था कि रोटी मुलायम हो तो वो उसे खा सके,वो कुछ उदास हो गई तभी रिक्शेवाले ने आवाज़ दी "बेबी जी" और वो रिक्शा पर बैठ अपने स्कूल चली गई ।

मैं अपने दैनिक कार्य में लग गया काम में दिन भर उलझा रहा शाम के तीन बजे अचानक वो बच्ची आई और मुझसे बोली "काकाजी मेरे साथ चलिए" और फिर दुकान के पीछे उस बूढ़े तक ले गई जो प्रायः अर्धपागल सा वही लेटा रहता था। फिर उसने धीरे से अपने बस्ते को खोला और टिफ़िन निकाला साथ ही एक बिस्किट का पैकेट कुछ डरती सी गई और बूढ़े के हाथों में पकड़ा बोली "बाबा इसे खा लो" मैं चकित देखता रहा जो मुझे नहीं दिखा वो इस नन्हीं बालिका ने देख लिया। र यह रोज का क्रम हो गया वो बालिका अपने नन्हें हाथों से बूढे को कुछ देती मुस्कुराती और उसका हालचाल पूछती चली जाती। अब बूढ़ा जिसे वो बाबा बुलाती उसे दुआएं भी देने लगा था और मैं देख रहा था मानवता की डोर में बंधी किस तरह जिंदगी मुस्कुरा रही थी।

एकता उपाध्याय


गोरखपुर (उत्तर प्रदेश)

1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है, आपकी सलाह, सुझाव हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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