रचनाकार.ऑर्ग की विशाल लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 318 // पीछा करती दृष्टि // - चितरंजन भारती

प्रविष्टि क्रमांक - 318

- चितरंजन भारती

पीछा करती दृष्टि

सर्द हवा को चीरती हुई सी नाईट सुपर बस भागी जा रही थी। एक वह समय था, जब गुवाहाटी से शिलचर के लिए अनगिनत बसों की लाईन लगी रहती थी। शाम होने के साथ सभी बसें अपने गंतव्य की ओर चल देती थीं। मगर जब से गुवाहाटी शिलचर रेलवे लाईन, मीटर गेज से ब्राँड गेज में परिणत हुआ है, इन बसों को ब्रेक सा लग गया है, क्योंकि अब अनेक ट्रेनें सीधे-सीधे चलने लगी हैं। ऐसे में अब इक्का-दुक्का बस ही इस रूट पर चलती हैं। अब बस में वही लोग सवार होते हैं, जिन्हें ट्रेन में आरक्षण नहीं होने के वजह से आना¬जाना जरूरी होता है।

मेरे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ था। मुझे एक आवश्यक कार्य से दिल्ली जाना पड़ गया था। वापसी का आरक्षण टिकट बमुश्किल गुवाहाटी तक ही मिला था। और अगले दिन हर हाल में मुझे ड्यूटी पकड़नी थी, ताकि छुट्टियाँ नियमित हो सकें। और इसलिए शाम को ट्रेन से उतरते ही नाईट सुपर बस पकड़ ली थी, ताकि अगले दिन सुबह तक शिलचर पहुँचकर ड्यूटी ज्वाइन कर लूँ।

बस गुवाहाटी से शिलंग पहुँच चुकी थी। और अब शिलंग से आगे बढ़कर घने जंगलों से आच्छादित पर्वतों की चढ़ाई चढ़ रही थी। स्वाभाविक ही बस की गति धीमी थी। जबकि उसका इंजन तेज आवाज में गुर्राते हुए रात की नीरवता भंग कर रहा था। हम सभी यात्री अपर्नीअपनी सीटों पर गर्म कपड़ों में मुँह छुपाए ऊँघते हुए सो रहे थे।

अचानक एक झटके के साथ बस रूकी तो मेरी नींद खुल गई।

खिड़की के बाहर झाँका, तो कलेजा मुँह को आ गया। सड़क के दूसरी तरफ एक बस दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी। और उसमें से निकले खून से लथपथ यात्री सहायता की याचना कर रहे थे।

“अरे नहीं ड्राईवर” एक यात्री चिल्लाया “एक्सीडेंट का मामला है। थाना-पुलिस और हाँस्पीटल का चक्कर चलेगा, तो हमें देर हो जायेगी। पूछताछ में परेशान हो जाएँगे हम। चुपचाप बस बढ़ाओ आगे।

मेरे मन में भी यही बात आ-जा रही थी। छुट्टी का मामला ठहरा। विद्यालय का प्राचार्य ठहरा कानूनची। बात समझेगा नहीं और छुट्टी रद्द कर देगा। फिर हम देर क्यों करें? बस में हां-ना की आवाज आती रही। घायल यात्री बस का दरवाजा पीटते रहे। अंततः ड्राईवर ने बस आगे बढ़ा दी।

मेरी सीट खिड़की के पास ही थी। बाहर खून से लथपथ एक युवक अपनी घायल बच्ची को गोद में लिये मुझसे गिड़गिड़ा रहा था - “सर, बड़ी कृपा होगी। हमें बस में ले लीजिए। यहाँ जंगल में मेरी बेटी मर जायेगी। वह बुरी तरह से जख्मी है। ”

“हम निकटवर्ती शहर में पुलिस को खबर कर देंगे। ” मेरे बगलवाली सीट पर बैठा यात्री चिल्लाया “अरे बस को आगे बढ़ाओ भाई” देखा नहीं जा रहा यह सबकुछ ”

बस रेंगते हुए आगे बढ़ने लगी थी। उस घायल बच्ची की बेधती दृष्टि मुझे घूर रही थी। उसमें मुझे अपनी बेटी का अक्स दिख रहा था।

हमने अगले पहुँचने वाले शहर में खबर कर अपने कार्य की इतिश्री कर दी।

हम शिलचर पहुँच गए। मैंने उसी दिन अपनी ड्यूटी ज्वाइन कर अपनी छुट्टी नियमित करा ली। मगर उस बच्ची की बेधती दृष्टि मेरा पीछा सी कर रही थीं।

वह दृष्टि आजतक मेरा पीछा कर रही हैं।

--

1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है आपकी सलाह, सुझाव हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.