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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 319 // झरोखा // अर्चना अग्रवाल

प्रविष्टि क्रमांक - 319

अर्चना अग्रवाल


झरोखा

अरे नैना , ध्यान से ग्रुप में सब चिल्लाए

सेल्फी के जुनून में कब वो ऊटी के लैंडस्केप से फिसल गई ,पता ही नहीं चला । साँस रूक सी गई थी तभी एक हाथ ने थाम कर ऊपर खींच लिया ।

थोड़ा सँभल कर ध्यान से देखा तो वो एक बुजुर्ग थे जो मैले कपड़ों में घूम घूमकर फल बेच रहे थे।

झुर्रियों वाले चेहरे पर दो आँखें थीं जो नैना को कुछ जानी पहचानी लगीं । अवचेतन में कहीं कुछ कौंध सा गया पर वो कुछ समझ ना पाई ।

“" बेटी , ज़रा देखकर “

आवाज़ कहीं दूर से आती हुई लगी ।

बीते पल छिन तरल हो तैरने लगे

फ्रिल वाली फ्रॉक पहने नैना ऊँगली थामे चाँदनी चौक की मेन सड़क पर टप-टप चलते तांगे में बैठी है।

सफेद कुरते पजामे में एक स्नेहिल आकृति उसके साथ है ।

“" अन्ना चाचा “हठात् बोल उठी वो तो वो बुज़ुर्ग भी हैरानी से देखने लगे ।

कैसे पहचानते वो बित्ते भर की लड़की अब ब्रांडेड जीन्स , टॉप और स्टायलिश हेयर कट में सामने थी । बचपन की मासूमियत अब यौवन के लावण्य को पा चुकी थी ।

वो दरीबे की जलेबी का दोना रोज़ ज़िद करके खाना , फिर गोदी में चढ़ नुक्कड़ के

हलवाई से दूध लाना सब याद आ गया ।

अनवर चाचा नैना के पापा की गारमेंटस फैक्टरी में टेलर मास्टर थे पर बिल्कुल घर के सदस्य की तरह । आँखों में तकलीफ़ के कारण अपने गाँव वापिस चले गए थे।

इतने सालों बाद उनसे अचानक यहाँ मिलना कितना सुखद कितना अचरज भरा पुलक गई नैना ।

जी चाहा बचपन की तरह ही अन्ना चाचा की पीठ पर झूल जाए , किकली की हठ करे , लेमनचूस माँगे और ना जाने क्या-क्या पर अब वो बड़ी जो हो चुकी है ।

“" नैना , लुक हाऊ स्वीट पिक्स , सारी शूटिंग लोकेशन की ब्यूटी कैच कर ली मैंने “"मनन उसका खास दोस्त आते ही बोला पर वो तो कहीं खोई हुई थी ।

अनवर चाचा भी कुछ मंत्रमुग्ध , अवाक् से खड़े थे ।

“" अब चलो भी “ सामान उठाते हुए हाथ पकड़ कर टूअर बस में चल पड़े दोनों ।

“ कौन था ये भिखारी ?

“" प्लीज़ ...ऐसा मत कहो “तड़प उठी नैना ।

बस लैंडस्केप से एक किलोमीटर तक आगे आ चुकी थी कि गाइड ने बताया एक बूढ़ा बस के पीछे भागा आ रहा है ।

बस के रुकने पर हाँफते हुए अनवर चाचा ने मनन का आईफोन उसके हाथ में रखते हुए कहा “" बाबूजी , वहीं गिर गया था आपकी जेब से “

अनवर चाचा थके कदमों से वापिस जा रहे थे और मनन शर्मिंदा , हतप्रभ सा रह गया।

अतीत के झरोखे से आती ठंडी हवा नैना को शीतल कर गई और उसके नयन पनियाले ।

3 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है आपकी सलाह, सुझाव हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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