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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 320// कौन जात हो // मृणाल आशुतोष

प्रविष्टि क्रमांक - 320

मृणाल आशुतोष

कौन जात हो

सवेरे-सवेरे हाजत महसूस होते ही मैं शौचालय की ओर भागा। जैसे ही दरवाजा खोला कि आवाज़ आयी,"कौन जात हो तुम!" मैं आश्चर्य से चारों ओर देखने लगा। कोई दिखा नहीं। फिर आवाज़ आयी,"कौन जाति हो तुम? अच्छा तो तुम शुद्र हो!" इस बार आवाज़ में थोड़ी कठोरता भी थी। मुझे डर महसूस होने लगा। मेरे होंठ बुदबुदाये पर कोई शब्द बाहर न आ सके! मेरी घबराहट बढ़ने लगी थी । मैं फटाफट नहा-धोकर भगवान की पूजा करने बैठ गया। अचानक कंधे पर किसी के हाथ रखे जाने का आभास हुआ और फिर नेपथ्य में वही आवाज़ गूँजी,"कौन जात हो? ओह्ह! तुम ब्राह्मण भी हो!"

दुकान जाने का मन तो बिल्कुल नहीं हो रहा था पर बिना गए काम बिगड़ता तो कदम स्वतः ही बढ़ पड़े।

दुकान पहुँच कर जैसे ही खाता-बही उलटना शुरू किया फिर वही आवाज़ दोहराया गया,"अच्छा, अब तुम वैश्य बन गये!"  डर अब खत्म सा होने लगा था।

शाम में जब दुकान बंद कर लौट रहा था तो रास्ते में देखा कि कुछ दोपाया कुत्ते एक महिला से ज़बरदस्ती करने की कोशिश कर रहे हैं। मैंने गाड़ी लगायी और उन पर पिल पड़ा। बेचारे जान बचाकर भागे। नेपथ्य में अब आवाज़ गूँजी,"बहुत बढ़िया! तुम तो क्षत्रिय भी हो!"

"नहीं। मैं मात्र मनुष्य हूँ! मनुष्य समझते हो न!" अबकी मेरी आवाज़ बुलंद थी।

सहसा मेरी नींद खुल गयी।

***

©मृणाल आशुतोष

1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है आपकी सलाह, सुझाव हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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