नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 321 // बाप-बेटा // नर्मदा प्रसाद कोरी

प्रविष्टि क्रमांक - 321


नर्मदा प्रसाद कोरी

बाप-बेटा

तेज धूप और गर्मी पड़ रही है। जून का महिना आधा बीत चुका है। अब जल्दी ही बरसात का मौसम आने वाला है। बल्लू अपने घर की छत सुधारने में लगा है। टूटे-फूटे कवेलू बदल रहा है। बल्लू छत सुधारने में इतना मशगूल है कि उसे होश ही नहीं है कि वह पसीने-पसीने हो रहा है। तेज दुपहरी में तप रहा है। उसका अपना घर है इसलिए धूप, पसीना, तकलीफ कुछ भी नहीं समझ आ रही है।

बल्लू के पिताजी डल्लू जी कई बार आवाज़ दे चुके हैं, बेटा थोड़ा आराम कर ले, जलपान ग्रहण कर ले और जब मौसम में हल्की ठंडक आ जाये तब छत का काम कर लेना। अब मुझसे ये तेरी जबरदस्ती की परेशानी मोल लेना बिल्कुल ठीक नहीं लग रही है। मुझे ये सब देखकर बड़ी तकलीफ़, पीड़ा हो रही है। बल्लू बेटा, तू मान जा और नीचे उतरकर थोड़ा आराम कर ले। बल्लू अपने पिताजी को कहता है ’’बस पिताजी थोड़ा और काम कर लूँ फिर नीचे आ जाऊंगा। बड़ी देर हो गई है तब भी बल्लू छत पर धूप में काम कर ही रहा है।

अब बल्लू के पिताजी से नहीं रहा जा रहा था। उन्होंने झल्लाते हुए बुद-बुदाया, मानता ही नहीं है। कैसा लड़का है। अब डल्लूजी अपने नाती पप्पू को गोद में उठा लेता है। पप्पू बल्लू का एक-डेढ़ साल का बड़ा प्यारा बेटा है।

डल्लूजी अपने नाती पप्पू को तपती चिलचिलाती धूप में गरम कवेलू पर, छत के ऊपर बिठा देता है। यह देख कर बल्लू अपने पिताजी पर बड़ा नाराज हो जाता है, कहता है कैसे सयाने बूढ़े आदमी हो, एक नन्हे से बच्चे को तपते कवेलू पर बिठा दिया। डल्लूजी अपने बेटे बल्लू से पूछता है। इसमें तुझे क्यों तकलीफ हो रही है। तब बल्लू बोलता है ’’अरे मैं इस बच्चे का बाप हूँ तो मुझे तकलीफ क्यों नहीं होगी।’’

अब डल्लूजी की बारी थी। डल्लू जी ने कहा घंटे दो घंटे से मैं तुझे समझा रहा हूँ कि बेटा अभी तेज धूप है। जब ठंडक आ जाए, तब काम कर लेना। तू पप्पू का बाप है, तुझे उसकी तकलीफ, समझ में आ रही है। अरे मैं भी तो तेरा बाप हूँ, तुझे मेरी तकलीफ, पीड़ा समझ में नहीं आ रही है।

बादशाह के पंगा

एक राजा के दरबार में एक आदमी एक गधा लेकर प्रवेश करता है। वह आदमी राजा को अपना परिचय देता है। वह अपनी खासियत बताता है कि महाराज मेरे पास एक हुनर है जो दुनिया में किसी के पास नहीं है। राजा उस आदमी से उसके हुनर के बारे में जानने की उत्सुकता जाहिर करता है। उस आदमी ने राजा को बताया महाराज, मैं गधे को आदमी बनाने का हुनर जानता हूँ। राजा को बड़ी प्रसन्नता हुई, राजा ने उस आदमी को गधे से आदमी बनाने का आदेश दिया। उस आदमी ने राजा के सामने कुछ शर्तें रखी। उस आदमी ने राजा को शर्तें में बताया, महाराज इस काम के लिए मुझे काफी धन की आवश्यकता होगी और दूसरी बात इस काम को पूरा होने में कम से कम बीस साल लगेंगे। राजा तैयार हो गया। राजा ने सख्त लहजे में उस आदमी को कहा, यदि तुम इस काम को नहीं कर पाये तो तुम्हें बीच बाजार में जिंदा ग़ाड़ा जायेगा। राजा ने अपने वित्त मंत्री को आदेश दिया, इस आदमी को इसकी मांग के मुताबिक धन मुहैया कराया जाए। सरकारी ख़जाने से उस आदमी को हजारों सोने की अशर्फियां-मोहरें मुहैया करा दी गईं। उस आदमी ने राजा को सलाम करके, बीस साल बाद मिलने का वादा कर, अपने गधे के साथ प्रस्थान किया।

जैसे ही उस गधे वाले आदमी के दोस्तों-परिचितों को पता चला, कि उसने राजा से बहुत सारा धन ले लिया है। गधा कभी आदमी बनता नहीं है अब जरूर ये गधे वाला राजा के गुस्से का शिकार होगा। सरेआम मौत के घाट उतारा जायेगा। सारे लोग उससे कह रहे थे, अरे भैया राजा से क्यों पंगा मोल ले लिया। गधा कभी आदमी बन सकता है? अब तू बेमौत मारा जायेगा।

गधे वाले आदमी ने अपने दोस्तों-परिचितों से कहा, तुम लोग मूर्ख हो। मैं भी जानता हूँ कि गधा आदमी नहीं बन सकता । मेरी नज़र तो राजा से प्राप्त धन से आनंद उठाने की है। इतना धन मुझे मिला है, आनंद से बाकी जिंदगी कटेगी। फिर लोगों ने कहा तुम्हारे हुनर का क्या होगा। राजा तो तुम्हें मार ही डालेगा। अरे मेरे शुभ-चिंतकों, आपको चिंता करने की जरूरत नहीं है। मैंने राजा से बीस साल का समय मांगा है। राजा खुद बूढ़ा है। बीस साल में खुद ही मर जायेगा। तो मेरी झंझट ही खत्म हो जायेगी या फिर बीस साल में ये बूढ़ा गधा ही मर जायेगा। तब राजा से कहूंगा महाराज मैं जिस गधे पर अपने हुनर का प्रयोग कर रहा था वह तो मर गया। अब मैं कुछ कर नहीं सकता।

--

नर्मदा प्रसाद कोरी, बैंक आफ़ महाराष्ट्र,छिन्दवाड़ा (म.प्र.) ४८०००१

1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है आपकी सलाह, सुझाव हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.