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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 325 व 326 // नयना (आरती) कानिटकर


प्रविष्टि क्रमांक - 325


नयना (आरती) कानिटकर
बदलाव
सुहानी भोर थी आज की। मन बडा प्रसन्न। दो दिनों से बहुत कुछ घट रहा था यहाँ। मेहमान, पूजा, फूलों और हवन की खुशबू से मेरा रोम-रोम आल्हादित था। सुस्वादू भोजन के साथ अतिथि सत्कार से मेरा मन गर्व से भर उठा था। सब लोग आनंदित हो विदा हुए थे यहाँ से।

बहुत खूबसूरत तरीके से सलीके से सजाया हैं उसने मुझे। उसने मतलब मेरी स्वपना ने।
बडी तेजी से उसके हाथ चल रहे हैं। देखते ही देखते मैं चाय, सब्जी के मसाले, घी के पराठे की खुशबू से मैं फिर महक रहा हूँ। सब झटपट तैयार कर उसने खुद हल्का-सा मेकअप किया और उन दोनों को 'बाय' कर वह बाहर निकल गई.

बब्बु बेटा भी उठ गया, वह भी स्कूल यूनिफोर्म पहनकर उसको 'बाय' कर बाहर निकल गया।
अब वह भी तैयार हो गया, उसने सारे दरवाजे, खिडकियाँ बंद की, सारे नल, गैस बंद किये और घर में ताला डालकर बाहर निकल गया।

मैं भी सुबह की भागदौड से थक गया था। थोडा सुस्ताने-सा लगा था कि फिर खटर-पटर। वह आयी थी। उसने सिंक में पडे बर्तनों को धोया, लंबे-लंबे फर्राटे मारते झाडू लगाई ना मेरे बिस्तर की सलवटे हटी, ना बिखरे जुते करीने से रखे गए. महक बिखरने के लिए गुलदस्ता भी फूलों का इंतजार करता रहा।
तभी फिर बब्बू लौट आया। बस्ता एक तरफ बिस्तर पर फेंका। फ्रिज से निकाल कर कुछ काला-सा पेय गटका। दन्न से अलमारी खोली कुछ निकाला उसपर अपनी अंगुलियाँ नचाते शोर करता रहा। अब मुझे भी उस आवाज से चिढ़ हो रही थी। मैं शांति और सुकून चाहता था।

अब वह भी मतलब मेरी स्वामिनी स्वपना भी आ गयी उसने अपने सैडल एक तरफ़ फेकें। मैं बडी आस से उसको देख रहा था।

मगर वह मेरे गद्देदार सोफे पर धस चुकी थी कि तभी वह भी आ गया। "कुछ" साथ में लाया था।
उसने टेलीविजन आन किया। तब तक वह उस "कुछ" को गर्म कर लाई. सबने उसे खाया।
अब बब्बू को अपने कमरे में जाने की हिदायत दी गई. वह पैर पटकता, चिडचिडाता अपने कमरे में चला गया।
वो दोनों भी अपने कमरे में आ गये। उसने हाथों से बिस्तर की सलवटें हटाई, वह कबर्ड से तकिया, चादर निकाल लाया।

दोनों ने उसपर अपना शरीर झोंक दिया और अपनी बायीं करवट सो गये।
रात चढ़ने लगी और मैं मकान में तबदील होता रहा।

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प्रविष्टि क्रमांक - 326
 नयना (आरती) कानिटकर
अबोध


"ओहो! फिर से झगड़ पडे तुम दोनों"—क्या करु? देखो ना विजय! अब सब कुछ फिर छूटता-सा लग रहा। कितना भी समझाओ पर ये बच्चे भी ना।
कहाँ हो विजय? अब तुम ही बताओ में क्या करु?
अनघा अपना सर पकड़ कर धम्म से सोफे पर बैठ गई।

अनुज भी अभी तो वैसे बहुत छोटा हैं कितनी बार समझाया है पर अनु को भी वहीं चाहिए जो अनुज के पास हो। कही हर बार अनु को टोककर ग़लत तो नहीं करती ना...वैसे कुछ भी कह लो विजय ने मुझे अनुज के साथ स्वीकारा हैं। पर फिर मैंने भी तो अनु के साथ उसे स्वीकारा हैं। हम दोनों ही तलाक शुदा हैं। मैं अपने बेटे को जीत लाई थी अपने पहले पति से पर विजय—उसकी पत्नी तो अपनी फूल-सी बेटी को पता नहीं कैसे छोड़ कर चली गई थी। विजय से ज़्यादा अनु ने मेरा दिल जीत लिया था अपनी प्यारी-प्यारी बोली से। शायद वह अपनी पहली माँ के ज़्यादा नजदीक थी ही नहीं।

वैसे हम दोनों का आपस में बहुत अच्छा सामंजस्य है मगर ये बच्चे—इन्हें कैसे एक करूं?
मैं अपने विचारों में खोई हुई कि—मुझे अनुज के जोर-जोर से चिल्लाने की आवाज आई. मैं दौड़कर बाहर आई.
"हिम्मत कैसे हुई अनु पर हाथ भी उठाने की" अनुज अपने दोस्तों पर चिल्ला रहा था।
" अबे साले! वह तेरी कौन लगती हैं। चल हट इसने हमारा खेल बिगाडा है। अनुज को लगभग धक्का लगाते दूसरे बच्चे भी चिल्ला रहे थे।

मैं उनके बीच कुछ कहने जाती उसके पहले ही—
" खबरदार! जो किसी ने इसे छुआ भी तो—-अनुज ने अनु का हाथ कसकर थामते हुए कहा—
"ये मेरी छोटी बहन हैं।"
विजय मेरा कंधा थामें कब आकर मेरे पीछे खडे हो गये पता ही नहीं चला।
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© नयना(आरती) कानिटकर
पता २६४,रचना नगर
गोविंदपूरा भोपाल(म.प्र.)
४६२०२३
ईमेल- nayana.kanitkar@gmail.com

1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है आपकी सलाह, सुझाव हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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