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प्राची - जनवरी 2019 : डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय का सकारात्मक शिक्षा-चिन्तन डॉ. वेदप्रकाश ‘अभिताभ’

डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय का सकारात्मक शिक्षा-चिन्तन

डॉ. वेदप्रकाश ‘अभिताभ’

डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय एक विद्वान आलोचक होने के साथ साथ-साथ शिक्षाविद् भी हैं। अनेक आलेखों और कृतियों में ‘शिक्षा’ को लेकर उनका विचार-मंथन ध्यान आकर्षित करता है। शिक्षा को व्यापक अर्थ में लेते हुए उनका अभिमत है, ‘शिक्षा व्यापक अर्थ में जीवन भर चलने वाली सतत सक्रिय है, जिसमें व्यक्ति सम्पूर्ण जीवन कुछ-न-कुछ अवश्य सीखता है।’ शिक्षा संस्थाओं द्वारा दी जाने वाली औपचारिक शिक्षा का अपना पृथक महत्त्व है। वे मानते हैं कि ‘शिक्षण संस्थाएं सैद्धान्तिक शिक्षा की प्रयोगशालाएं हैं।’ वे शिक्षा के सन्दर्भ में जॉन ड्यूबी से सहमत हैं कि ‘यह त्रिमुखी प्रक्रिया है। इसमें शिक्षक, शिक्षार्थी के साथ सामाजिक शक्तियां भी सम्मिलित हैं।’ सामाजिक तत्त्व के अभाव में शिक्षार्थी को सभ्य-सामाजिक बनाने का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। डॉ. उपाध्याय निर्भ्रान्त हैं कि ‘इस उद्देश्य की प्राप्ति ‘अतिवाद’ से दूर समन्वयवादी दृष्टिकोण को स्वीकारने से ही सम्भव है।’

डॉ. उपाध्याय ने अपने शिक्षा-चिंतन में एडम्स, रॉस, जॉन, ड्यूबी, रस्क, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्ण, डॉ. देवराज, डॉ. श्यामाचरण दुबे आदि शिक्षाशास्त्रियों और दार्शनिकों के मन्तव्यों को जहां-तहां आत्मसात् किया है। इनके मतों का समाहार करते हुए उन्होंने माना है कि शिक्षा के चार मुख्य उद्देश्य हैंµ ज्ञानार्जन, शारीरिक विकास, जीविकोपार्जन तथा जीवन की पूर्णता, हरबर्ट स्पेंसर के इस मत से उनकी सहमति है कि ‘शिक्षा पूर्ण जीवन की तैयारी है।’ अतः जीवन की पूर्णता का एक अर्थ नैतिक मूल्यों के प्रति समर्पण और उनकी स्वीकृति भी है। इसी स्तर पर ‘शिक्षा’, संस्कृति से जुड़ती है। विद्वान लेखक शिक्षा-संस्कृति के सम्यक् संश्लेष के पक्ष में है। उसे दोनों ही नैतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा में सहायक लगते हैं। डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय के शब्दों में ‘शिक्षा और संस्कृति दोनों मानव-मुक्ति के अमोघ साधन हैं। दोनों मानव को संस्कारित करते हैं, शिक्षित करते हैं, दीक्षित करते हैं एवं सुसंस्कृत करते हैं।’

मूल्यपरक शिक्षा के प्रति लेखक में आश्वस्ति का भाव है। वे कहते हैं कि ‘मूल्यपरक शिक्षा ही छात्रों के चरित्र एवं व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास कर सकती है क्योंकि छात्र, राष्ट्र की निधि है, भावी कर्णधार हैं और शिक्षक राष्ट्र-निर्माता, ‘मूल्य’ मीमांसा-दर्शन का विषय है। अतः लेखक ने शिक्षा और दर्शन के अन्तर्सम्बन्ध पर भी विचार किया है। उसके अनुसार ‘जीवन का समुचित सुव्यवस्थित विकास ही दर्शन का उद्देश्य है जबकि शिक्षा ही सर्वांगीण विकास में विश्वास रखती है। इस प्रकार शिक्षा और दर्शन संस्कृति-जन्मा हैं। दोनों का उद्देश्य भी करीब-करीब एक ही हैं।’ यदि दर्शन मानव-जीवन में शुचिता, महानता, उदात्तता आदि की स्थापना का आग्रही है तो शिक्षा का उद्देश्य भी मिलता-जुलता है।

शिक्षा के विकास में शिक्षक का दायित्व सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। डॉ. उपाध्याय के शब्दों में ‘शिक्षक का दायित्व समाज का सर्वांगीण विकास करना है। चरित्रवान, विद्वान, योग्य एवं परिश्रमी शिक्षक ही राष्ट्रोन्नति में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। आदर्श एवं योग्य शिक्षक के अभाव में छात्रों में निराशा, कुण्ठा, अवसाद, असन्तोष एवं अनुशासनहीनता की भावना विकसित होती है।

स्ववित्तपोषित शिक्षा प्रणाली के प्रति डॉ. उपाध्याय आश्वस्त नहीं हैं क्योंकि वहां शिक्षा व्यापार है। अध्यापक और छात्र के बीच आत्मीयता का भाव वहां नहीं होता। लेखक पाता है ‘स्ववित्त पोषित शिक्षा प्रणाली के तीव्रगति से फैलते मकड़जाल ने शिक्षक, शिक्षार्थी और अभिभावकों को अपनी परिधि में ग्रसित कर, कुपोषण एवं शोषण का शिकार होने के लिए बाध्य कर दिया है। यह प्रणाली मौलिक एवं मुक्त चिन्तन, मूल्यप्रेरित जीवन के विकास में बाधक ही है। इसका सामाजिक परिवर्तन से भी कोई सम्बन्ध नहीं है जबकि विद्वान लेखक भूमण्डलीकरण के दौर में भी मूल्यपरक और अंतर-सांस्कृतिक शिक्षा का पक्षधर है। वह ‘डिग्री’ से अधिक छात्रों को संस्कार देने में विश्वास रखता है। जातिवाद, सम्प्रदायवाद, धनलिप्सा को लेखक ‘शिक्षा’ में अवरोध मानता है। शिक्षा में नैतिक मूल्यों, राष्ट्रीय भावना के समावेश के साथ वह सार्वभौमिक मूल्यों को आत्मसात् करने का पक्षधर भी है।

स्वयं अध्यापन से जुड़े रहकर डॉ. उपाध्याय ने शिक्षा जगत की गिरावट को प्रत्यक्ष देखा है, अध्यापकों के नैतिक पतन के वे साक्षी रहे हैं। अतः उनके शिक्षा-चिन्तन में अपने समय का यथार्थ केन्द्रस्थ है। अतः आदर्शवादी रुझान लिए उनकी उपलब्धियां चिन्त्य नहीं लगतीं अपितु चिन्तन के लिए प्रेरित करने में सक्षम हैं। समग्रतः उनका चिन्तन सकारात्मक है और प्रासंगिक भी है।

सम्पर्क : डी-131, रमेश विहार,

अलीगढ़ (उ.प्र.) 202001

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