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प्राची - जनवरी 2019 : निबन्धकार डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय - डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदी

निबन्धकार डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय

डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदी


साधक कुछ है जन्मना कुछ का है निर्माण।

सच्चा जो साहित्य वो करता है कल्याण।।

समयशिला पर हो गया दिव्यांकित है नाम।

कौन भूल सकता उन्हें जिनके बोलें काम..


आधुनिक हिन्दी गद्य के विकास में सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान रहा है भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जो बहुमुखी है। आपने विभिन्न विधाओं में गद्य लिखकर हिन्दी गद्य को सम्पन्न बनाया। आपको हिन्दी निबंध का जनक माना जाता है। आपने विभिन्न विषयों पर अपने निबंध साहित्य का सृजन किया है। डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय ने साहित्य की समृद्ध परम्परा का निर्वाह करते हुए अपने निबंध साहित्य का सृजन किया है। ‘शब्दार्थ-कल्पद्रम’ नाम शब्दकोष में निबंध का व्युत्पत्तिपरक अर्थ है नि$बन्ध$ल्युट= निवध्यते अनेन अस्मिनवा अर्थात् जिसके द्वारा भावों और विचारों को बांधा जाए वही निबंध है।

निबंध अंग्रेजी में ‘ऐसे’ शब्द का पर्याय है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार निबंध गद्य की कसौटी है। संस्कृत में निबंध एवं प्रबंध समान अर्थों में प्रचलित रहे हैं। हिन्दी निबंध की विकास-यात्रा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से आरम्भ होकर द्विवेदीयुग, शुक्लयुग तथा आधुनिक युग में अविराम चल रही है।

आधुनिक युग में समीक्षात्मक, विचारात्मक तथा विवेचनात्मक निबंध निरन्तर लिखे जा रहे हैं। निबंध साहित्य में डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय का प्रमुख स्थान है। निबंध साहित्य से भी अधिक समसामयिक हिन्दी आलोचना में आपका महत्वपूर्ण स्थान है जिससे साहित्य को नूतन दिशा मिली है। आपने आचार्य रामचन्द्र-शुक्ल एवं डॉ. नगेन्द्र जैसे आलोचक के साहित्य का गहन अध्ययन किया है।

पहली जनवरी 1950 में रामनगर-बलिया में जन्में डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय की आलोचना साहित्य पर तलस्पर्शी दृष्टि पर पड़ी है। विचार-मंथन के द्वारा समीक्षा-सागर की सतह पर मिले रत्नों से अपने आलोचना-साहित्य को सम्पन्न बनाया है तथा इसी विशेषता से आपका समीक्षा संसार आलोकित है। आपकी मौलिक प्रकाशित कृतियों मेंµ आलोचक डॉ. नगेन्द्र : कृतित्व के विविध आयाम, समन्वयवादी आलोचना, शुक्लोत्तर समीक्षा के नए प्रतिमान, प्रेरणा के ड्डोत, हिन्दी आलोचनाः विकास एवं प्रवृत्तियां, अद्यतन काव्य की प्रवृत्तियां, मिथकीय-समीक्षा, समन्वयवादी आलोचनाः नव्य परिप्रेक्ष्य, शिक्षा और संस्कृति, परम्परा और प्रयोग, गोपालदास नीरज, सृष्टि और दृष्टि, हिन्दी आलोचना : बदलते परिवेश, आपातकालोत्तर हिन्दी कविता, हिन्दी नाटक एवं रंगमंच, सांस्कृतिक प्रदूषणः वैश्विक परिदृश्य, हिन्दी साहित्य की विविध विधाएं, साहित्यानुशीलन के नए क्षितिज, समकालीन हिन्दी आलोचनाः दशा और दिशा, साहित्य समीक्षा के नए मानदण्ड, समकालीन हिन्दी कहानीः दशा और दिशा, समकालीन हिन्दी उपन्यासः दशा और दिशा, समकालीन हिन्दी नाटक : दशा और दिशा, साहित्य और संस्कृति, यात्रा-वृतान्तः सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य, सार्वभौम साहित्यशास्त्र और डॉ. नगेन्द्र, योगसाधनाः साहित्यिक परिप्रेक्ष्य एवं ब्रिटेन प्रवास के नब्बे दिन उल्लेखनीय हैं।

आपने विविध साहित्यिक विधाओं पर समीक्षात्मक आलेख लिखे हैं जिनकी भूयसी विशिष्टिता है आपकी शोध दृष्टि तथा तर्कमय शैली। यही नहीं आपकी सम्पादित कृतियों में भारतीय काव्य चिंतन में डॉ. राकेश गुप्त, परिवेश और परिणति- डॉ. शिवशंकर शर्मा, मृत्युंजय मूल्यांकन प्रकल्प, धरोहर, समीक्षा के नए आयाम, सपनों के साहिल तथा समीक्षा के अभिनव सोपान आदि महिमामंडित समीक्षा कृतियां हैं। आपको अपने कृतित्व के कारण अखिल भारतीय स्तर के सम्मान प्राप्त हुए हैं। उत्तर-प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा आपको 2001 में साहित्य सर्जना पुरस्कार, 2004 में साहित्यश्री ग्रंथायन द्वारा, 2005 में गुलाबराय साहित्य सर्जना पुरस्कार, 2016 रामचन्द्र शुक्ल नामित पुरस्कार 50 हजार रुपये एवं 2017 साहित्य भूषण सम्मान उत्तर-प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा प्राप्त हुए हैं। आपको सम्मानित कर पुरस्कारों की गरिमा संवर्धित हुई हैं।

निबंधों का वर्गीकरण अनेक प्रकार से किया गया है-

1. सर्जनात्मक निबंध, 2. आलोचनात्मक या समीक्षात्मक निबंध। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने निबंध के दो अन्य भेद भी बताए हैं। भावयित्री प्रतिभा सम्पन्न लेखक आलोचनात्मक निबंध लिखते हैं। कुछ आलोचक निबंध को व्यक्तिप्रधान तथा विषय

प्रधान बताते हैं अभिरुचि के आधार पर निबंध के चार प्रकार हैं- 1. वर्णनात्मक, 2. विचारात्मक, 3. विवरणात्मक, 4. भावात्मक। विषयानुसार ही निबंधों की शैलियां हैं- संस्कृतनिष्ठ- वर्णनात्मक, अलंकृत प्रतीकात्मक, भावक शैली, विवेचनात्मक तथा भावात्मक आदि शैलियां हैं। आपकी अविराम विशिष्ट साधना ने आपका समीक्षा के क्षेत्र में- क्षितिज में आलोकित रूप निर्मित किया है। आपके आलोचना- साहित्य की भाषा-शैली तत्समता से मुक्त होकर भी अंग्रेजी-फारसी-अरबी आदि शब्दों से सम्पृक्त है।

आप अविराम साधक, समीक्षा के क्षेत्र में नित्य नूतन आयाम उद्घाटित कर रहे हैं। ‘आलोचना’, ‘अवलोकन’ सूक्ष्म निरीक्षण करना, नीरक्षीर विवेक सम्मत दृष्टि रखना- आलोचना के सोपान समीक्षक करता है। व्यापक दृष्टि समीक्षक को तभी प्राप्त होती है जब उसका गहन अध्ययन होता है। डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय मजे हुए समीक्षक हैं जिनका समीक्षा क्षेत्र में व्यापक अध्ययन है। यही कारण है कि आप हिन्दी साहित्य के लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं। बिना लोचन कुछ भी देखना सम्भव नहीं, वैसे ही बिना आलोचना दृष्टि के किसी साहित्यकार के कृतित्व को समझना सम्भव नहीं। समीक्षक वो तीव्र दृष्टि प्रदान करता है जिससे लेखक के कृतित्व को समझना सहज हो जाता है। डॉ. पशुपतिनाथ जी के लिए दोहे प्रस्तुत हैं :

व्यापक जिनकी ख्याति है वे हैं पशुपतिनाथ।

साथ आपका प्राप्तकर आलोचना है सनाथ।।

रहे लेखनी आपकी ज्योर्तिमय अविराम।

सभी दृष्टियों में पले होकर वही प्रकाम।।

डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय बहुमुखी और बहुआयामी प्रतिभा से समन्वित और मंडित सम्पन्न रचनाकार हैं। वे आलोचना, समीक्षा, गीत, कविता, हाइकू, निबंध, शोध-आलेख, पत्र, यात्रा-वृतान्त, संस्मरण, रिपोर्ताज आदि अनेक विधाओं के सर्जक साहित्यकार हैं।

उच्चशिक्षित डॉ. उपाध्याय समालोचना के क्षितिज को निरंतर विकसित करने में साधनारत हैं। निष्ठावान शिक्षक एवं प्राचार्य के रूप में सुपरिचित वे अपने कृतित्व के कारण समीक्षा जगत के सुपरिचित हस्ताक्षर हैं। डॉ. पशुपतिनाथ जी ऐसे साधक हैं, जिन्हें उसके व्याकरण का भी पूरा ज्ञान है।

चार पंक्तियां उन्हें समर्पित हैंµ

जो दूर को अज्ञान भगा देता है,

पात्रों में चेतना जगा देता है,

जिसमें हो संकल्प का सूर्योदय,

पानी में भी वो आग लगा देता है।

हिन्दी समालोचना को आपसे अनेक अपेक्षाएं हैं। साहित्य का क्षेत्र अनन्त तथा अपार हैµ

अनन्तापारं किल शब्द शास्त्रम्

स्वल्पं तथायुः वहवश्च विघ्नाः।

सारं ततो ग्राह्यमुपास्य फलम्

हंसै यथा क्षीर मिवाम्बमध्यात्।।

‘एकाक्षरी कोष’ में कहा गया है कि ‘इस अनन्त और अपार शब्द-शास्त्र से मानव सीमित ज्ञान प्राप्त कर सकता है क्योंकि उसका जीवन सीमित और अल्प है।

डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय मनीषी आलोचक हैं, जो शोध और समालोचना का सार प्रस्तुत कर सुधी पाठकों का मार्गदर्शन करते हैं। उनका आवाहन रहता है कि ‘सार-सार को गहि रहे, थोथे देश उड़ाय’ आपके लिए मेरे कुछ दोहे-

साधक हैं साहित्य के, डॉक्टर पशुपतिनाथ।

प्रिय शारद आशीष हैं, सदा आपके साथ।।

रामनगर में जन्म ले, किया बहुत उपकार.

बलिया की मन-बीन के, थे सब झंकृत तार।।

किया समीक्षा के क्षितिज का जिसने सुविकास।

ऐसा पुशपतिनाथ का, प्रकरक रहा सुहास..

संघर्षों ने आपको, दिखलाए हैं कूल।

जहां पहुंचकर आप हैं, सुरभित सुस्मित फूल..

व्यापक अध्ययन आपका, तेजोमय है दृष्टि।

काव्यालोचन में किया करते नूतन सृष्टि।।

सदा आपकी लेखनी, दे अमूल्य उपहार।

हिन्दी के साहित्य को, दे रत्नों का हार।.


संपर्क : 24, आंचल कॉलोनी, श्यामगंज

बरेली (उ.प्र.) 24305

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