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प्राची - जनवरी 2019 : डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय : समन्वयशील आलोचक - डॉ. रमेश सोबती

डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय : समन्वयशील आलोचक

डॉ. रमेश सोबती

हिन्दी आलोचना एवं समीक्षा के प्रति उत्तरदायी, लब्ध प्रतिष्ठित एवं ख्यातिप्राप्त चिंतक डॉ. पशुपतिनाथ जी उपाध्याय के संबंध में विशेष चिन्तन करते हुए, कहा जा सकता है कि उनसे संलग्न तथा सम्बन्धित विषयों के प्रति, सावधानी तथा निगरानी उनमें प्रचुर मात्रा में है। ये सब वस्तुएं उनकी समीक्षा को इकहरी और एकांगी होने से बचाती हैं। वे साहित्य की किसी भी विधा, भाषा-विज्ञान या फिर संस्कृति ही क्यों न हो, इन सब पर उनकी पैनी दृष्टि रहती है। इसीलिए वे किसी भी लेखक की रचनाओं में सम्पादित होने वाली अनुगूंजों के सन्दर्भ का परिचय प्राप्त कर लेते हैं ऐसा मेरा पूर्ण विश्वास है। गहन-चिंतन-गुरुता डॉ. उपाध्याय की साहित्य के प्रति समग्र दृष्टि का परिणाम है। यह दृष्टि आज के आलोचकों में लुप्त सी हो गई है बल्कि इसके स्थान पर हठी, अड़ियल, आक्रामक जैसी क्षुद्रता को प्रश्रय दिया जाने लगा है। डॉ. उपाध्याय इसका अपवाद रहे। यह नहीं कि उनके अपने वैचारिक झुकाव नहीं हैं, किन्तु वे किसी सैद्धान्तिक खूंटे के साथ बंधकर नहीं रहे या रहना नहीं चाहते। वे हमेशा समीक्षात्मक नज़रिये को कुण्ठित करने की बजाए एक ऐसा विचार देते हैं जहां उनकी नैतिक अन्तश्चेतना उनके सौन्दर्यबोध के साथ घुल मिल जाती है।

श्रेष्ठवक्ता, प्राज्ञ डॉ. उपाध्याय के सृजन एवं चिंतन पर यदि विस्तारपूर्वक चिंतन-मनन करें तो वे गद्य व सामाजिक सक्रियता से अपनी रचनात्मक संसिद्धि द्वारा समान रूप से लोकचित्त बंधे हुए हैं और लोकप्रिय होकर शब्द की क्षमता और सार्थकता पर बल देते रहे हैं। इनके द्वारा कृतियों पर की गई समीक्षाएं एवं आलोचनाएं व्यापक मानवीय प्रतिबद्धता का सशक्त लेखन है और इनमें चिंतक और आलोचक की सूक्ष्म और वस्तुनिष्ठ दृष्टि प्राप्त होती है, जिसके प्रमाण में इनकी आलोचनात्मक व चिन्तनपरक कृतियां ‘परम्परा और प्रयोग’, मिथकीय समीक्षा, हिन्दी आलोचना विकास एवं प्रवृत्तियां, समन्वयवादी आलोचना नव्य परिप्रेक्ष्य, शुक्लोत्तर समीक्षा के नए प्रतिमान, अद्यतन काव्य की प्रवृत्तियां, शिक्षा और संस्कृति आदि में प्रकाशित निबन्ध हैं। जैसे मैंने पहले उन पर अपनी टिप्पणी देते हुए लिखा है, समीक्षक डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकारों में एक हैं। नैतिक विचार, संयत अथवा समीकृत मनोवेग तथा पारदर्शी अभिव्यक्ति का समन्वय ही डॉ. उपाध्याय को कला का उपकरण दिखाई देता है। उनका समन्वयशील समीक्षक विग्रह नहीं, सन्धि का आकाँक्षी है। सन्धि ही योग है, योग ही साधना है, साधना ही कला है। इस प्रकार सामंजस्य ही साहित्य का अपर नाम उनकी समीक्षाओं में आकृष्ट करता है। वे रचनात्मक क्षणों में अपने तथा अपने विषय के सर्वाधिक समीप होते हैं। वे अपने अनुभव, विवेक तथा कृति जिसकी वे समीक्षा कर रहे होते हैं उस वक्त, परिवेश और जीवन के प्रति, सरोकार रखते हैं। उनकी कोशिश हमेशा यही रहती है कि कृतिकार की चिंता को बिखरने से बचाया जाए और लेखक के मूल्यों को प्रतिष्ठापन किया जाए तथा वे उसे साहस के घूंट लगातार पिलाते हैं इस प्रकार वे अपनी रचना को, जिन्दगी को अर्थवान बनाने का प्रयास भी करते हैं।

ज्ञान का समाजशास्त्र साहित्य रचना के परिवेश की तलाश का समाजशास्त्र होता है। ज्ञान की अभिव्यक्ति का चित्त समाज में तथा उसका व्यवहारिक प्रबन्ध और उसके तन्त्रीय वितरण से आच्छन्न होता है। साहित्य, संस्कृति एवं समाज के अनेक तन्त्रों का भाग है। डॉ. उपाध्याय शायद यह मानते हों कि साहित्य को समाज से अलग कर देखना नितांत असंभव है। पूरे जीवन में उन्होंने कई प्रकार साहित्य का अवगाहन किया और समझा. इसी के माध्यम से उन्होंने अनेक विचारधाराओं से जानकारी प्राप्त की। विश्व में होने वाली उथल-पुथल पर पैनी दृष्टि रखी। इन सभी प्रकरणों को डॉ. उपाध्याय ने सतत शिक्षा के रूप में ग्रहण किया। फिर भी जितना रसीला साहित्य होµ उथल-पुथल से बचना उनके लिए आसान नहीं। ऐसी परिस्थिति में समीक्षक या साहित्यकार का दायित्व यही बनता है कि वह समसामयिक घटना चक्रों के लिए एक पुखता विचार बनाए और विशेष रूप में, अपने आपको अभिव्यक्त करें। इस दृष्टि से डॉ. उपाध्याय ने सजग तथा निर्मम दृष्टि को बनाए रखने में विशेष ध्यान दिया, अतः आवश्यक भी है।

भारत में साहित्य की परम्परा लोक परम्परा रही है। साहित्य और संस्कृति का एक ही उद्देश्य रहा है- लोकमंगल। समाजवादी आंदोलन की तुच्छ व्यवस्था को न केवल चुनौती दी पर साथ ही सामाजिक परिवर्तन का वाहक भी। नरेश भार्गव अपने आलेख में लिखते हैं, ‘कि आंदोलन स्थापित अभिजात्य वर्ग को चुनौती था और उसके द्वारा स्थापित सामाजिक व्यवस्था का विरोध। समाजवादी चित्तन से यदि कोई रचना हुई है तो वह समाज के नवीन रचना के ढाँचे के विरुद्ध अथवा साहित्यिक सर्जना के विरुद्ध नहीं रही है।’ समाजवाद हमारे भारतवासियों का सपना है, यही सपना मनुष्य को सामाजिक संकीर्णताओं और विषमताओं से पार ले जाने वाला ख्वाब है। समता के इस सपने में सामाजिक संरचना द्वारा प्रदत्त अवरोधों से टककर तो लेनी ही पड़ेगी। डॉ. उपाध्याय की इस स्वीकारोक्ति का मैं समर्थन करता हूं कि आज का सबसे बड़ा संघर्ष साम्प्रदायिकता के विरुद्ध संघर्ष है। देखना यह है कि आज का सुसंस्कृत समाज अन्य सामाजिक ताकतों से कैसे सामंजस्य करता है? भारत में अमीरी-गरीबी के बराबरी के सन्दर्भों को एक तरफ रख भी दें तो यहां जाति व्यवस्था के सिरताज ब्राह्मणों में भी बहुत खींचातानी है। बड़े दुख से कहना पड़ता है कि यहां के समाज में दुर्बोध मनोग्रन्थियां कुकुरमुत्ताओं की तरह पैदा हुई हैं। इन्हीं मनोग्रन्थियों ने गैर बराबरी और साम्प्रदायिकता को जन्म दिया है। इन मनोग्रन्थियों पर प्रहार और समाज की पुनर्रचना समाजवाद का स्वप्न है। यही सपना डॉ. उपाध्याय जैसे साहित्यकारों का भी है। डॉ. साहिब का समाजवादी मन इसी पुर्नचना का मन है।

सृजनात्मक-प्रवृत्ति अभिव्यक्ति का रास्ता तलाशती रहती है, तथापि अनुभूतियों के परिक्व होने पर ही वे स्पष्ट रूप से बहिर्गत होती है। अध्ययन, सामाजिक अनुभव, चिन्तन, मनन, पर्यटन इत्यादि विचारों में गहनता, व्यापकता और सम्पन्नता लाते हैं। साहित्यकार जब किसी विषय-विशेष से प्रभावित होता है, अथवा तत्सम्बन्धी, सम्यक-ज्ञान प्राप्त करता है तभी वह उस विषय के सम्बन्ध में शोधात्मक आलेख लिखने के लिए अपनी कलम उठाता है। ऐसी ही परिक्रिया से गुजरते हुए डॉ. उपाध्याय जी गतिशील हुए तथा लक्ष्य प्राप्त किया, और रचनात्मक कार्य गतिमान रहा। वे विभिन्न प्रकार की शैलियों से परिचित हुए और प्रत्येक विधा के सूक्ष्म निरीक्षण में प्रवृत्त हुए। डॉ. साहिब लिखते हैं, ‘शिक्षण के क्षेत्र में रहते हुए मुझे साहित्यिक आयोजनों में सहभागिता करने का अवसर मिला। अनेक महापुरुषों का साथ व सहयोग मिला। डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ. नगेन्द्र और डॉ. नामवर सिंह जी से अनेक बार भेंट हुई, वार्ता हुई और उन सबका मार्ग दर्शन भी मिला, फलतः पुस्तकें लिखता रहा, प्रकाशित करवाता रहा।य् डॉ. साहिब ने अपने आलेखों में गम्भीर चिंतन और अध्ययनशील होने के साथ मनस्वी विचारक होने का साक्ष्य प्रस्तुत किया है। यही कारण है कि वे अपनी कल्पनाशीलता, अपने विवेक और वास्तव में अपने विविध लेखन और रचनाओं के कारण ही आज एक ऐसा व्यक्तित्व हैं, जिनकी पहचान आज के हल्ले के बीच सार्थक सृजन की पहचान की दिशा में आगे बढ़ने के लिए सम्भवतः आवश्यक है। आज के मध्यवर्गीय समाज में डॉ. उपाध्याय की सक्रियता इस अर्थ में जीवंत और प्रासंगिक है कि उसके मूल में अन्यों से प्रेम ही क्रियाशील रहा, दूसरों की आलोचना नहीं।

उन्होंने ने बहुत शोधात्मक ग्रन्थों की रचना की है जो उनकी विशेष गति और प्राणवत्ता को रेखांकित करते हैं जिनमें उनके आत्यंतिक सत्य भी आलोकित होते हैं।

सम्पर्क : फगवाड़ा (पंजाब)

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