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प्राची - जनवरी 2019 : समन्वयवादी समीक्षक - डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय - पद्मभूषण गोपालदास ‘नीरज’

समन्वयवादी समीक्षक डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय

पद्मभूषण गोपालदास ‘नीरज’

हिन्दी समीक्षा की विविध प्रवृत्तियों में समन्वयवादी समीक्षा की अपनी एक अलग पहचान बन चुकी है, जिसमें भारतीय एवं पाश्चात्य काव्य-शास्त्र की समन्वित प्रवृत्ति देखने को मिलती है। वैश्विक धरातल पर द्रुतगति से होते हुए सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन ने समीक्षाशास्त्र को भी प्रभावित किया है। सम्प्रति मानव तनावग्रस्त, घुटन, टूटन, संत्रास, अवसाद आदि की विषम परिस्थितियों से गुजरता हुआ जीवन-यात्रा पूरी कर रहा है। वैज्ञानिक प्रगति, सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन तथा कदम-कदम पर कड़ी प्रतियोगिता उसके लिए एक चुनौती है। बढ़ती हुई हथियार संग्रह करने की होड़ एवं परमाणु परीक्षण की बलवती अभिलाषा-आकांक्षा ने मानव अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है। साहित्य समीक्षा भी इसी विषम परिवेश और दुरूह परिस्थितियों से गुजर रही है। ऐसी भयावह संक्रमण की स्थिति और परिस्थिति में समग्र क्रान्ति या विद्रोही स्वर ध्वनित करने से, साहित्य और समाज किसी को भी, कोई लाभ नहीं मिलने वाला हैं. यही कारण है कि साहित्य-समीक्षकों ने अपनी चिंतन प्रक्रिया बदल दी है, जिसकी परिणति में समीक्षा के क्षेत्र में समन्वयवादी विचारधारा चल पड़ी है। डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय एक ऐसे ही सुधी समीक्षक और चिन्तक हैं, जिन्होंने डेढ़ दर्जन से अधिक समीक्षात्मक पुस्तकें लिखकर अपनी अलग पहचान बनाई है। डॉ. उपाध्याय सामंजस्य को ही सौन्दर्य मानते हैं। ‘समन्वय ही साहित्य का प्रणतत्त्व है’ ऐसी उनकी मान्यता है।

‘हिन्दी आलोचना : विकास एवं प्र्रवृत्तियां’ पुस्तक में डॉ. उपाध्याय ने सौष्ठववादी एवं स्वच्छन्तावादी आलोचना, मनोविश्लेषणवादी आलोचना, मार्क्सवादी या प्रगतिवादी आलोचना, रसवादी आलोचना, शैली वैज्ञानिक आलोचना, शास्त्रीय आलोचना, अन्वेषण एवं अनुसंधानपरक आलोचना, मिथकीय आलोचना तथा समन्वयवादी आलोचना शीर्षकों के अंतर्गत विवेचन-विश्लेषण किया है।

वस्तुतः समन्वयवादी आलोचना भारती एवं पाश्चात्य काव्यशास्त्र के संश्लिष्ट सिद्धान्त-सूत्रों का सम्मिश्रण एवं समन्वित रूप की विकसित अवस्था कही जा सकती है। ‘समन्वय’ जहां ‘सामंजस्य’ का वाचक बन जाता है तथा सौन्दर्य की प्रतीति कराता है, अनुभूति कराता है, वहीं वह साहित्य-निकष बन जाता है और वह समीक्षा का भी प्रतिमान सिद्ध होता है, जिसके पक्षधर डॉ. उपाध्याय हैं। उनकी मूल स्थापना भी यही है। उनके शब्दों में ‘सामंजस्य का अर्थ हैµ मानव प्रवृत्ति की आधारभूत वृत्तियों का समन्वय। ये आधारभूत वृत्तियां सामान्यतः तीन हैं- भाववृत्ति, ज्ञानवृत्ति एवं कर्मवृत्ति, जहां इन तीनों वृत्तियों का समंजन हो जाता है, वहां जीवन और व्यक्तित्व में अनायास ही सौन्दर्य का समावेश हो जाता है। भाव के स्तर पर जो प्रेय हैं, ज्ञान के स्तर पर वही सत्य है और कर्म के क्षेत्र में वही श्रेय का पर्याय बन जाता है और इन तीनों का समन्वय ही व्यक्ति के स्तर पर आत्मसिद्धि है।’

हिन्दी समीक्षा के क्षेत्र में डॉ. उपाध्याय ने महत्वपूर्ण कार्य किया है और वे समन्वयवादी समीक्षक के रूप में स्थापित हो चुके हैं। उनकी दर्जनों कृतियों के दृष्टिगत कहा जा सकता है कि डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय निरंतर पढ़ने-लिखने के अभ्यस्त, परिश्रमी और साहित्य-सर्जन में लीन रहने वाले व्यक्ति हैं।

समीक्षा क्षेत्र के अतिरिक्त, डॉ. उपाध्याय की कृतियां तथा कृतित्व से स्पष्ट होता है कि वे एक श्रेष्ठ निबन्धकार, शिक्षाविद्, शिक्षाशास्त्री, भारतीय संस्कृति के संवाहक और कवि हृदय भी हैं।

मूलतः अंग्रेजी के शिक्षक होते हुए भी, उन्होंने हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य की सर्वोच्च उपाधियां अर्जित की हैं। डॉ. उपाध्याय उन बिरले और बहुआयामी व्यक्तियों में से एक हैं, जिन्होंने विगत तीस वर्षों से अपनी साहित्य सर्जना की है, जो एक कठिन तपश्चर्या है। सहिष्णुता, सहजता, सरलता, बोधगम्यता एवं मृदुलता उनके व्यक्तित्व में चार चांद लगा देते हैं। सामाजिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक समारोहों में सक्रिय सहभागिता करना उनकी प्रवृत्ति है। उनकी संवेदनशीलता, उदात्त जीवनादर्शों के प्रति समर्पण की भावना तथा नैतिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता निश्चय ही सराहनीय है। ईश्वर उन्हें सतत साहित्य साधनामय सार्थक, निरामय सुदीर्घ आयु प्रदान करें, यही प्रार्थना है।

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