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प्राची - जनवरी 2019 : व्यक्तित्व-कृतित्व - जीवन जिया तो क्या जिया - प्रो. मृत्युंजय उपाध्याय (डी. लिट.)

व्यक्तित्व-कृतित्व

जीवन जिया तो क्या जिया

प्रो. मृत्युंजय उपाध्याय (डी. लिट.)

वास्तव में शिक्षक का धर्म पढ़ना, पढ़ाना है। वह पढ़ेगा, तो सोचेगा, चिंतन करेगा फिर लिखेगा। अधिकांश प्रोफेसर चर्वित चर्वण करते-करते जीवन व्यतीत कर देते हैं। एक बार कोई नोट बनाया, उसे ही दुहराते हुए जिन्दगी की शाम घिर आई। परन्तु कुछ यहां ऐसे भी प्रोफेसर हैं जिन्होंने गम्भीर अध्ययन किया, सभा, गोष्ठियां, सेमिनारों में अपने विचारों से क्रांति लाई। इतना ही नहीं, अपने गहन, अध्ययन मनन, चिंतन की अभिव्यक्ति पुस्तकों में की। सभा, समारोहों में अपने शोध-गवेषण का प्रकाश फैलाया। प्रबुद्धों को जगाया, उन्हें दिशा दी। नागार्जुन की एक कविता है “अरे जीवन जिया तो क्या जिया”। इसका निहितार्थ है कि मनुष्य (चिंतन, मनन, सृजन, प्रकाशन) होने का पक्का प्रमाण न दे पाया तो उसका जीवन निष्फल है, निष्प्रयोज्य है। परन्तु डॉ. उपाध्याय विद्यासागर हैं। वहां का जल खारा नहीं, मीठा है। अगजग की प्यास बुझाने वाला. वह पढ़ते रहे वर्षों। मनन करते रहे उस पर। फिर लिखना आरम्भ किया तो सभी दिशाओं में सारस्वत चेतना का प्रकाश फैल गया। तब यह आवश्यक हो गया कि उनके पांडित्य को अभिव्यक्ति का व्यापक आकार मिले, उसका प्रकाशन, प्रसारण हो। इस दिशा में डॉ. रोशनी देवी का प्रयास सार्थक है, प्रामाणिक है और भावी पीढ़ी का दिग्दर्शक।

यह कृति ‘पशुपतिनाथ उपाध्याय : व्यक्तित्व एवं कृतित्व छः अध्यायों में विभक्त है। पहना अध्याय तो उनके जन्म, शिक्षा, वातावरण, साहित्यिक गतिविधियों, मौलिक कृतियों, उनके मिलने वाले सम्मानों आदि पर विरमता है और उनके साहित्यानुशीलन के क्षितिज पर प्रकाश डालता है। यह अध्याय विषय प्रवेश भर न होकर आगे के अध्यायों के कथ्य, विषय, स्थापनाओं, मूल्य आदि की पीठिका तैयार करता है।

अग्नि पुराण में कहा गया है कि इस अपार काव्य-संसार का प्रजापति कवि है और वह अपनी इच्छानुसार उसे जैसा समझता है, उसे जैसा रुचता है, वैसा ही सृजन करता है।

अपारे काव्य संसारे, कविरेव प्रजापति।

यथास्मै रोचते विश्वे, तथास्मै सृज्यते।।

इस लेखक का साहित्य-संसार पद्य पर नहीं गद्य पर टिका है, वह भी आलोचना पर। वैसे गद्य लिखना, वह भी परिष्कृत, बड़ा कठिन काम है। कवियों के लिए ‘गद्य’ निकष (कसौटी) है,

‘गद्य’ कवीनां निकषं वदन्ति.

लेखक की गति गद्य में उल्लेखनीय है।

आलोचना के क्षेत्र में इनका काम ऐतिहासिक है। काव्याशास्त्र में भी इनकी गति है, जिसका उल्लेख ‘समन्वयवादी समीक्षा और डॉ. नगेन्द्र में किया गया है। उनका मानना है कि वाद-विवाद, मत-मतांतर, पक्ष-विपक्ष के कांतार में यत्र-तत्र भटकने से मूल उद्देश्य ओझल हो जाता है। रह जाता है मत वैभिन्य, अलगाववाद और अपनी ढपली, अपना राग। इस विषम-विपरीत परिस्थितियों में उनका निर्णय विवेक सम्मत और समीचीन लगता है : ‘मुझे किसी वाद से विवाद नहीं है और न ही किसी के पक्ष-विपक्ष में इजहार करना है बल्कि आज के युग की यही आकांक्षा है, यही अभिलाषा है और यही मांग है। वसुधैव कुटुम्बकम् की संकल्पना तभी साकार और सार्थक हो सकती है, जब साहित्यालोचन साहित्य का शंखनाद करे। समस्याएं आती रहीं हैं और आशा एवं विश्वास है कि भविष्य में भी आती रहेंगी लेकिन उनका समाधान सामंजस्य में है, समन्वय में है। तादात्म्य में है। यही संकल्प है और यही आज की समस्या का विकल्प। मेरी अपनी समस्या साहित्यालोचन की भी यही रही है। (समन्वयवादी आलोचना पृ.7)

समन्वयवादी आलोचना और लेखन का शुभारंभ का कथ्य है- आलोचना के अर्थ, संदर्भ, लक्षण, तत्व, उद्देश्य और प्रभाव पर विचार-विमर्श करना। बलाघात रहता है। समन्वय के तत्वों, घटकों, पड़ावों, प्रवृत्तियों पर। जहां मत वैभिन्य है- मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना है, वहां समन्वय नहीं होगा, फिर उसका न प्रभाव होगा, न कृति आस्वाद्य (जो कृति का मूल उद्देश्य है) होगी। अतः धनुष की डोरी की याद करनी होगी जिसे न खूब कसा जाए, न ढीला ही छोड़ा जाए। एकदम सम पर रहे-सधी, संतुलित, तभी कृति आस्वाद्य और रसग्राहिणी बन सकेगी। यह बड़ा आश्चर्यमिश्रित आनन्दानुभूति कराना है कि लेखक डॉ. उपाध्याय की व्यापक विद्यायिनी दृष्टि सर्वत्र अपना मार्ग, प्रशस्त करती चलती है। पहले सूत्रात्मक कथन, फिर विवेचन, तब स्थापनाएं, निष्कर्ष, प्रमाण, साक्ष्य आदि।

व्यावहारिक आलोचना पर लेखक की टिप्पणी उल्लेखनीय है क्योंकि व्यावहारिक आलोचना वह रूप है जिसमें वैज्ञानिक प्रक्रिया द्वारा साहित्य-सिद्धान्तों का निरूपण समन्वयवादी प्रवृत्ति से किया जाता है। इसमें कृति बाह्य, आभ्यांतरिक, गौड़ और प्रधान आदि सभी पक्षों का विवेचन होता है। (पृ. 83) यह हुआ सैद्धान्तिक कथन, जिसकी अनिवार्यता, प्रासंगिकता, निर्विवाद है. परंतु लेखक को इसी से संतोष नहीं होता। वह एक लेखक का सच्चा जीवन जीता है- सिद्धान्त में- व्यवहार में। अतः उसने अपनी दीर्घकालीन साधना से जो सीखा है, जो राय बनाई है, उसे निस्संकोच कह देता है।

टी.एस. इलियट ने कहा है कि हम जो जीवन जीते हैं, भोगते हैं, पल-पल पर जिसका अहसास होता है, उसकी अविकल अभिव्यक्ति साहित्य नहीं है। भोगना, जीना एक बात है और उसे सृजन बनाना एकदम दूसरी बात। भोगने वाली मनीषा और सृजन करने वाली मनीषा में अंतर होता है और यह अंतर जितना गहराता है- कला उतनी ही महान होती है। ष्प्दकप टपकनंसपजलं दक ज्ंसमदजष् में यह कथन है। डॉ. उपाध्याय ने बहुत पढ़ा है और उसे पचाया है और इलियट की मान्यता का पग-पग पर विनियोग किया है। उसे आजमाया है। यही कारण है कि उनकी स्थापनाएं स्पष्ट, निर्विवाद, नीरक्षीर, विवेकी और शास्त्र सम्मत हैं।

डॉ. उपाध्याय ने समन्वयवादी आलोचना के विकास, प्रक्रिया, प्रभाव और इतिहास पर प्रामाणिक स्थापनाएं दी हैं। उस समय के कवि होते थे रसवादी, जिसकी व्याख्या, विवेचना करने और उसे लेखन में अमल करने में उनका योगदान रहा है। वह तुलसीदास का साक्ष्य देते हैं, जो महान समन्वयवादी थे।

डॉ. उपाध्याय इसे और व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखते हैं_ ‘महान कवि का स्वान्तः सुखाय लोकमंगल के साथ पूर्ण तादात्म्य स्थापित कर लेता है। इसी से उसकी अनुभूति साधारणीकरण की अनुभूति बन जाती है। (पृ. 123) लेखक ने शुक्लपूर्व युग में समन्वयवादी तत्वों की प्रधानता पर बल दिया है। परन्तु शनैः शनैः उसके ”ास पर भी चिंता व्यक्त की है। यह आलोचनात्मक कृति कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण बन सकी है। यहां न केवल आलोचना की परिभाषा, अवधारणा, प्रवृत्ति, योगदान, विकास आदि की व्याख्या-विवेचना हुई है, उसकी गहनता में प्रवेशकर आलोचना की प्रवृत्ति, विकास, प्रमुख आलोचक, उनके योगदान आदि की अंतर्यात्रा भी हुई है। समन्वयवादी आलोचना के सुदीर्घ इतिहास, विकास, उसके प्रधान घटकों पर विरमते हुए लेखक उस युगधारा के अवगाहन करता है और वहां के अच्छे तैराकों का प्रामाणिक वर्णन भी करता है। उनके देय, अवदान की चर्चा भी करता है। वहां लेखक समाज की आशा-आकांक्षाओं, उसके स्वप्न-सम्भावनाओं को जगाने और उसे समाज सापेक्ष बनाने की दिशा में तत्पर दिखता है।

लेखक की यह चिंता चैन नहीं लेने देती कि आज आलोचना में व्यक्तिवाद, गुट, अहोरूप, अहोध्वनि की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। कोई कुछ छपवाता है, तो अपने ही गुट के लोगों को चर्चा के लिए बुलाता है। यदि यही प्रवृत्ति रही तो कृतियों की अन्तरात्मा में अवगाहन कर रत्न कौन निकालेगा? अगजग का कल्याण कैसे सधेगा? यही चिंता लेखक को सताती है और वह इस ओर सकारात्मक पहल करता है।

‘अतएव, आधुनिकतावादी प्रवृत्ति भारतीय संवेदना को सामंजस्य एवं समन्वय को ठोस पीठिका पर अधिष्ठित करना चाहती है जिससे साहित्यालोचन जगत् में विषमता के स्थापन पर समता, विद्रोह के स्थान पर सौहार्द्र, आक्रामक स्वर के स्थान पर समन्वयात्मक स्वर तथा जीवनमूल्यों के प्रति संवेदनात्मक भाव जाग्ररित हो सके। (पृ. 165)

लेखक का एक-एक वाक्य सूत्रात्मक है। गहन अध्ययन, मनन, अनुशीलन का साक्ष्य है। साहित्य समष्टि का गायक है। लोकमंगल का साधक है। कृति में इस प्रकार कवियों, प्रवृत्तियों, विचारधाराओं, उनके योगदान प्रभाव का प्रामाणिक वर्णन करते हुए लेखक सामाजिक, साहित्यिक अवदान का चित्रण है, विवेदन है। उन्होंने समरस समाज की स्थापना हेतु सर्वधर्म समभाव को स्वयं अंगीकार किया है। उनका मानना है कि छात्रों को जो साधन उपलब्ध कराए जाते हैं, उनके सर्वांगीण विकास के लिए, वे पर्याप्त नहीं हैं। इसके साथ घर, परिवार, समाज का व्यवहार भी मधुर होना चाहिए।

डॉ. उपाध्याय का साहित्य विविध आयामी है। यहां शिक्षा, संस्कार, मूल्य, पारस्परिकता, त्याग, समर्पण श्रम, साधना आदि मानवोत्थान के विषयों को लिया गया है। उनका दर्शन सबको साथ लेकर चलना। विकास का यही प्रत्यय है। शून्य से यात्रा कर पूर्ण पर जाकर विश्राम यही ध्येय रहता है। सबको सुखी, आनंदित बनाने की दिशा में अहर्निश प्रयास। यह साहित्य सृजन द्वारा हो या फिर समाज सेवा द्वारा।

जयशंकर प्रसाद ने कामायनी में यही संदेश दिया है_

औरों को हंसते देखो,

मन है सो और सुख पाओ,

अपने सुख को विस्मृत कर लो,

जग को सुखी बनाओ।

यह बड़ी बात ध्यान देने योग्य है कि इस कृति में अभीष्ट व्यक्ति डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय, उनकी कृतियों पर पहले विचार किया गया है। व्यक्तित्व, क्रियाकलापों पर बाद में। ऐसे अधिकांश शोधग्रंथ व्यक्ति, परिवार पर विचित्र टिप्पणीकार रचनाओं पर थोड़ा प्रकाश डालकर सिद्धकाम होते हैं। परन्तु डॉ. रोशनी देवी के पांडित्य, साधक, धैर्य, उत्साह, साहित्य की विविध विधाओं में उसकी गति की जितनी चर्चा की जाए, कम है। डॉ. रोशनी देवी ने कृति ‘पशुपतिनाथ उपाध्यायः व्यक्तित्व एवं कृतित्व’ में बहुआयामी व्यक्तित्व अनुशीलन स्वच्छन्दतावादी धरातल पर समन्वयात्मक दृष्टि से तटस्थतावादी वृत्ति के साथ किया है। ऐसे वैश्वानर अब इतिहास के पृष्ठों में अंकित हैं। परन्तु डॉ. रोशनी देवी ने वर्षों डॉ. उपाध्याय के साहित्य का अध्ययन किया। उनके कई बैठकों में संवाद किया। तब यह कृति शरीर धारणकर सकी है। इसीलिए इतनी प्रामाणिक और ऐतिहसिक बन पड़ी है। दोनों को अशेष साधुवाद।

सम्पर्क : वृन्दावन, राजेन्द्रपथ,

धनबाद (झारखण्ड)

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