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लघुकथा - शरारत - सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

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' देखो ! आज तो थोड़ी सी छूट देनी पड़ेगी ।' उसकी आँखों में शरारत थी ।

' कैसी छूट ? ' उसने  चेहरे पर अपनी  चिरपरिचित मुस्कान के साथ पूछा ।

वह उसके पास खिसकता हुआ बोला , ' आज तुम्हें किस करना चाहता हूँ । '

' पागल हो गए हो ! ये कैसे सोच लिया ? समय से पहले  मैं ऐसा कुछ नहीं करने वाली । आगे से ऐसा सोचना भी मत । ' वह अपने कथन के साथ मुस्कुरा भी रही थी ।

' फोन पर तो सबकुछ कर लेती हो । तब तो समय का कोई बंधन नहीं होता । ' उसके शब्दों में उलाहने के साथ उलझन भी थी ।

' वो तो मैं तुम्हारा दिल रखने के लिए कर देती हूँ और वह भी कभी - कभी । ' वो थोड़ा पीछे भी खिसक गई ।

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' पर तब मैंने तो तुम्हें ऐसा करने के लिए  कभी नहीं  कहा । ' उसने सफाई दी ।

' इतने दिन हो गए तुमसे मिलते हुए ! जानती नहीं क्या , कि तुम्हारे अंदर क्या चलता रहता है । इसलिए तुम्हारी धड़कनों को नियंत्रित करने के लिए कभी - कभी  कुछ करना बुरी बात है क्या । ' उसने उसे उसकी ही  बातों में उलझा दिया ।

' प्लीज !  अब भी दिल रख लो ।'  वह फिर से करीब आकर मनुहारने लगा

' प्लीज - व्लीज कुछ नहीं । कह दिया नहीं तो बस अब नहीं ...... समझे मेरे हमसफ़र जी । ' कहते हुए वह अपने  दोनों होंठों को एक - दूसरे पर रखकर भींच भी रही थी ।

' यार ये क्या बात हुई । हर बात अपने मन की ही करती हो । कभी तो मेरा भी हक़ बनता है न ।'  उसने एक आखिरी कोशिश की ।

' हाँ , भूल गयी तुम्हारा हक़ , यही न । प्लीज ,  अधीर मत बनो । सब कुछ समय के साथ अच्छा लगता है । मेरे चरित्र पर कोई लांछन आये , यह मुझे नहीं चाहिए ।'  उसने शर्माते हुए एक आखरी तर्क दिया ।

उसके चेहरे पर मायूसी छा गयी । उसे लगा लहलहाते खेतों को  अचानक बर्फीली हवाओं ने रौंद दिया है ।

वह बेंच से उठी । धीमें कदमों से चलकर  पांच कदम दूर जाकर खड़ी हो गयी । कुछ पल  उसकी मायूसी को मुस्कुरा कर देखने के बाद अपने दाहिने हाथ की दो अंगुलियों को अपने उन्मुक्त होंठों पर रखकर धीमें स्वर में चूमने के बाद हलके से हवा में लहराने  लगी ।

वह उसके इस करतब पर इतना ही कह पाया , ' शैतान कहीं की ,  मैं नहीं करता तुमसे बात ।'

वो बोली , मैं तो करूंगी । चलो देर हो रही है , अब चलते हैं  । '

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सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

साहिबाबाद ( उ. प्र .)

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