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चिंतन- * तीसरा * - डॉ आर बी भण्डारकर

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भाषा शास्त्री अर्थ के दो प्रकार बताते हैं-वक्ता को अभिप्रेत अर्थ और श्रोता को अभिप्रेत अर्थ। आज के युग में इसमें एक तीसरा भी आ गया है। वह श्रोता को वक्ता और श्रोता से भिन्न अपने ढंग का अर्थ बताता है।

आपने कहा- "रमेश ! कल सायं यहाँ घर पर पूजा का आयोजन है। तुम कल सवेरे ही आ जाना।"

कथन में वक्ता(आप) का अभिप्रेत हो सकता है कि वह अधिक सान्निध्य के लिए रमेश को जल्दी बुलाना चाहता है।

श्रोता रमेश इसको वक्ता के अभिप्रेत अर्थ में भी ले सकता है या उसका अभिप्रेत अर्थ यह भी हो सकता है कि सम्भव है पूजा की व्यवस्था सम्बन्धी कार्यों में सहयोग के लिए वक्ता उसे सवेरे से ही बुलवा रहा है।

यहाँ  तीसरा आपके लिए एक अलग ही अर्थ (अभिप्रेत) प्रस्तुत कर सकता है। वह कहेगा इस कथन का आशय यह है कि आप कल ही आना,कहीं ऐसा न हो कि आप आज से ही आ धमकें उन साहब के यहाँ।

अब श्रोता शंका में पड़ जाता है;सचमुच में कहीं ऐसा ही तो नहीं सोचा है वक्ता साहब ने मेरे बारे में।

आप परेशान तीसरे द्वारा उपजाई गयी शंका के वशीभूत होकर तीसरे अर्थ का कारण ढूँढने में। आप बने मूर्ख तीसरा सफल। तीसरे को हमारे यहाँ विनाशकारी ही माना गया है। शिवजी जब रुष्ट होते हैं,अत्यंत क्रुद्ध होते तब विनाशाय उनका तीसरा नेत्र खुलता है। शिव तो शिव हैं सदैव कल्याण के प्रतीक सो उनका तीसरा नेत्र खुलने की नौबत कम ही आती है। यहाँ यह तीसरा बेचारा सांसारिक प्राणी दूसरों के सुख से दुखी,हर जगह हाज़िर। इस मायावी संसार के रंगमंच पर एक अहम किरदार है यह तीसरा। सबसे बड़ी बात यह हमारा,आपका,इसका,उसका सबका ही बड़ा प्रिय। इसकी अनुपस्थिति सबको खलती है। जीवनानन्द कुछ नीरस,फीका-फीका लगता है।

साहित्य समाज का ही दर्पण होता है। साहित्य की विषय वस्तु आमतौर पर अपने आस-पास,अपने परिवेश से ही प्राप्त होती है साहित्यकार को। सच यह भी कि पाठक तभी सरल और सच्चा तादात्म्य स्थापित करता है रचना से। अब जब साहित्य में समाज है,समाज में साहित्य है तो वर्ण्य-विषय  किसी न किसी को तो  अपने पर सटीक बैठता लगेगा ही;साहित्यकार का उद्देश्य भी यही होता है,तभी तो समाज प्रेरणा लेगा उससे। हमने आपने इसने उसने विषय पढ़ा ,अपने ऊपर घटित लगा ,पाठक प्रसन्न, उसका व्यष्टि समष्टि हो गया। उसे मान मिला। तीसरे का अपना काम। वह दूर की कौड़ी लाएगा,कहेगा निश्चित ही यह आपकी बात,आपके विरुद्ध भाव से प्रस्तुत की गई है,मैं ऐसे इस रचनाकार को कतई पसन्द नहीं करता,बात भी नहीं करता इससे। आप  असमंजस में,तीसरे का मन्तव्य पूरा हुआ।

आशय यह कि यह तीसरा ही दुनिया चला रहा है। हमें मनसा, वाचा, कर्मणा सक्रिय रखे हुए है। नमन इसको; इसकी निष्क्रियता से दुनिया कितनी नीरस हो जाती कल्पना से परे है।

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सी-9,स्टार होम्स

रोहितनगर फेस-2

भोपाल-462039

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