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लघुकथा // रमुजिया की झोपड़ी // मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

सुबह-सुबह रमुजिया की झोपड़ी पर नगर निगम के कर्मचारियों ने धावा बोल दिया | दलील थी कि देश के प्रधानमंत्री शहर में दौरे पर आ रहे हैं और उनका काफ़िला इसी मुख्य सड़क से होकर गुजरेगा | वे अगर ऐसी गंदी झोपड पट्टी को देखेंगे तो उन्हें बुरा नहीं लगेगा | कुछ दिन के लिए तो यहाँ से किसी दूसरी जगह पर तुमको जाना ही होगा |

रमुजिया दोनों हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाया -  ‘साब-साब... मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं और ऊपर से ये पौष की ठण्ड...  साब! हम मर जायेंगे |’

तभी एक कर्मचारी की नजर टाट में सिकुड़ते-ठिठुरते दो छोटे-छोटे बच्चों पर पड़ गयी | गरीबी का हृदयविदारक मंजर देख, उसके हृदय में दयाभाव जाग गया | अपने साथियों से बोला - ‘क्यों न बड़े-बड़े बैनर-पोस्टर लगाकर झोपड़ियाँ छुपा दी जायें | इस हाड़ गलाने वाली ठंड में बेचारों का घर क्यों उजाड़ें |’

माहौल देख, उसके अन्य साथियों ने भी उसकी बात का समर्थन किया | और देखते ही देखते बडे-बडे बैनरों से सड़क किनारे की सभी झोपड़ पट्टी छुपा दी गईं |

- मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
ग्राम रिहावली, डाक तारौली,
फतेहाबाद, आगरा 283111

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