नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 229 से 231 // कविता नागर

प्रविष्टि क्रमांक - 229


कविता नागर

1-चरित्र

भूमि का चेतन से ब्रेकअप हो गया था,कालेज के सब लोग चटकारे ले लेकर किस्से सुन रहे थे।

मीना कह रही थी,ये देखो क्लास की टापर लड़की भी ना बच पाई। इसके मायाजाल में इस कदर उलझी कि अपना सब कुछ गंवा बैठी।

उधर चेतन और उसके कुछ चमचे नुमा दोस्त भूमि का मजाक उड़ा रहे थे, देखो तो क्लास टापर का हाल हुआ बेहाल। चेतन ने उसकी और भूमि की कुछ वीडियो क्लिप्स और फोटो कालेज में फैला दिए थे।

सब भूमि के चरित्र पर उंगली उठा रहे थे और थू थू कर रहे थे, एकपल में ही सर्वगुण संपन्न लड़की बस चरित्रहीन होकर रह गयी थी।

भूमि गरीब परिवार की मेधावी कन्या थी,और सबकुछ भूलकर बस पढ़ाई पर ध्यान देना चाहती थी,मगर पिछले कुछ दिनों से चेतन ही उसको शर्मसार करने की सारी कोशिशें कर रहा था,ये उसकी एक शर्त का हिस्सा था।

आज फिर जब वह कालेज आई,तो उसनें सामने की मीनार को इंगित करते हुए कहा देखो दोस्तों इस खूबसूरत इमारत के तो हम चप्पे चप्पे से वाकिफ है।

भूमि आज अपमान का घूंट नहीं पी सकी,वह भी सामने आई और बोली,हाँ दोस्तों मुझे भी कुछ कहना है,ये जो इंसान आप देख रहे हो,जाने कितनी लड़कियों के सच्चे प्रेम का इसने मजाक उड़ाया है,और उन्हें बदनाम किया है।

मैं भी इसके कपटी इंसान रुपी मशीन के पुर्जे पुर्जे से अच्छी तरह वाकिफ हूं। जिसके अंदर कोई संवेदनाएं नहीं है।  और मैंने ही इससे नाता तोड़ा है। अब आप फैसला लें कि चरित्रहीन कौन है,और किसे मुंह छिपाना चाहिए।

---

प्रविष्टि क्रमांक - 230

कविता नागर


2-बुनावट

पिछले कुछ दिनों से निम्मी के रिश्ते की बात चल रही थी। एक से एक लड़के और खानदान के रिश्ते देखे जा रहे थे। कुछ लड़के मिलने भी आए थे। सब कुछ ठीक रहता फिर भी ना जाने क्यों दादाजी सब मना कर देते। निम्मी उन्हें बहुत मानती थी।

आज जो लड़का आया था। वो एकदम स्टाइलिश हीरों की तरह और एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में इंजीनियर था,उससे बातचीत हुई और दादाजी बोले शाम को बताता हूं।

उसी दिन शाम को फिर एक सरकारी कंपनी में बैंककर्मी लड़का भी आया। जिसकी थोड़ी बहुत ज़मीन भी थी।

शाम को दादाजी ने उस लड़के को जो बैंककर्मी था,निम्मी के लिए पसंद कर लिया।

निम्मी की माँ को ये जमा नहीं, वो बोली आपने अच्छा पढ़ा-लिखा लड़का छोड़कर एक साधारण नौकरी और जमीन जायदाद वाले वर को क्यों चुना,मुझे कारण बताईए । इस पर दादाजी बोले बताता हूँ, जाओ पहले निम्मी की दादी की वो सहेजी साडी ले आओ,जो वो निम्मी को देना चाहती थी,और जो कल तुम नये कपड़े और वस्त्र लाई हो वो भी लाना।

इसके बाद उन्होंने कहा इनको दोनों को फाड़ने की कोशिश करो। लाख कोशिश के बाद भी निम्मी की दादी वाली साड़ी यथावत रही और कल ही नया आया परिधान फट गया।

देखों बहू वो चमचमाता लड़का ये नया परिधान था,जो बस देखने में ही आकर्षक था,पर उसकी बुनाई कमजोर थी।

वो सादा लड़का इस साड़ी की तरह, जिसके संस्कारों की बुनावट बहुत मजबूत और टिकाऊ है।

ये सब मुझे उन दोनों से बातचीत करके समझ आ गया।

बाकी फैसला मैं तुम दोनों पर छोड़ता हूं।

अनुभव के चश्मे से देखकर आपने ये फैसला लिया,मैं आपसे क्षमा चाहती हूं,मैं समझ गयी आपकी बात को। निम्मी की माँ बोली।


---

प्रविष्टि क्रमांक - 231

कविता नागर


3-किताब।

शरद जी अपने एक मित्र के यहाँ आए हुए थे। वे बड़े विचारशील और दूरदर्शी व्यक्ति थे। ये मित्र पिछले ही दिनों फेसबुक के माध्यम से मिला था।

दोनों मित्र अपने सुख-दुख साझा कर रहे थे। सुधीर जी ने उन्हें अपने परिवार से मिलाया,बच्चों की पढ़ाई वगैरह  का जिक्र किया और कहा कि पढ़ने के लिए उन्होंने सारे लेटेस्ट उपकरण ले रखे है ताकि बच्चों को कोई समस्या ना हो। कम्प्यूटर, प्रिंटर वगैरह बच्चों का काम आसान कर देते है।

वे उन्हें अपना सारा घर दिखा रहे थे। सब देखने के बाद वे बाहर लान में आकर बैठ जाते है।

सुधीर जी पूछते है और बताईये कैसा लगा आपको हमारा घर,कहीं कोई कमी तो नहीं।

इस पर शरद जी कुछ सोचते हुए बोले अगर आप बुरा ना माने तो एक बात कहूँ,

जी कहें, सुधीर जी बोले।

शरद जी बोले मित्र आपका घर देखने के बाद मुझे एक बहुत बड़ी कमी दिखी।

क्या..सुधीर जी आश्चर्य से बोले।

जी मित्र आपके घर में बच्चों के कोर्स के अलावा कोई अन्य किताबें नहीं है और जब मैंने उनसे पूछा आप कोर्स के अलावा कुछ अन्य किताबें पढ़ना चाहते हो तो उन्होंने ना में सर हिलाया।

मित्र आप कैसे भूल गये कि अच्छी किताबें सबसे बड़ी

पूंजी होती है।वे बड़ी सरलता से व्यक्ति को   जीवन का महत्वपूर्ण पाठ सिखा देती है।

आप और हम भी तो किताबों के सान्निध्य में बचपन गुजारे है,क्या आप उन कागज के पन्नों की खुशबू और कहानियों का जायका भूल सकते है। जो मन की जुबान पर चढ़ जाता है।

आपसे अनुरोध है कि घर में एक कोना किताबों के लिए बनाईये। अपने बच्चों को भी जिदंगी की शीत में किताबों की ऊष्मा भी दीजिए। शरद जी बोले।


   कविता नागर

   देवास(म.प्र.)

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.