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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 232 व 233 // प्रेरणा गुप्ता

प्रविष्टि क्रमांक - 232

प्रेरणा गुप्ता

1) *पिघलता लावा*

सबको चाय देकर शिल्पी जैसे ही वापिस जाने को मुड़ी, बड़ी दीदी बोल पड़ी, "अरे शिल्पी, कहाँ जा रही हो? कभी हमारे पास भी बैठ लिया करो ।"

न चाहते हुए भी उसे वहाँ बैठना ही पड़ा। सासूमाँ और दोनों ननदें उसी की ओर देखती, आँखों ही आँखों में इशारे कर रही थीं।

मन कसैला हो चला । सगाई के वक्त इन्हीं दोनों ननदों में, उसने अपनी बहनों की छवि देखी थी और सासू माँ, वह तो अपनी माँ से भी ज्यादा प्यारी लगी थी।

तभी छोटी ननद बोल पड़ी "क्यों माँ, भाभी के कान पर ये टॉप्स कुछ कम जँचते हैं न।"

सासूमाँ ने एक उड़ती-सी निगाह उसके कानों पर डाली, "हाँS, असल में, कान बहुत बड़े-बड़े हैं न, जैसे सूपा।" जोरदार हँसी से कमरा गूँज उठा।

आँखें भर आईं। होंठ थरथरा उठे। कल, परसों और पहले भी न जाने कितनी बार मजाक बनाया था इन सबने उसका। कभी उसकी आँख का, तो कभी नाक का, तो कभी उसके शारीरिक गठन को लेकर।  जो तह की तह जमा होता, आज उसके भीतर लावा बन सुलग उठा। वह आक्रोश से भर उठी, ये सब उसकी माँ-बहनें नहीं, बल्कि हीन भावना परोसने की चलती फिरती दुकानें थीं। 

एकाएक, बचपन में पढ़ी कहानी "लिटिल रेड राइडिंग हुड" का खलनायक उसके भीतर, भेड़िया का रूप धर अवतरित हो उठा और चीख-चीख कर कहने लगा, "हाँ, हैं मेरे कान बड़े-बड़े, जिससे मैं तुम सबकी बातें, अच्छी तरह से सुन सकूँ। आँखें भी मेरी, इसीलिए बड़ी-बड़ी हैं, जिससे मैं तुम सबको अच्छी तरह से डरा सकूँ। और मेरे दाँत ...!  धधकता हुआ लावा तेजी से अपने उच्चतम शिखर पर जा पहुँचा । इसके पहले कि उसके संस्कार की कड़ियाँ खुल कर बिखर जातीं, वह तेजी से उठकर बाहर जाने को हुई।

तभी सासूमाँ बोल पड़ीं, “जरा तेवर तो देखो इनके!"

वह तड़प कर फौरन पलट पड़ी, "माँ, बहुत बड़ी गलती हुई है आप से ।"

सासूमाँ की त्योरियाँ अब सातवें आसमान पर जा पहुँचीं।

“कितना अच्छा होता कि आप अपने बेटे की शादी अपने ही खानदान की ...।" कहती हुई वह सर्र से बाहर निकल गयी।

ज्वालामुखी फट चुका था और अब उसके भीतर का लावा पिघल-पिघलकर वातावरण को झुलसा रहा था।

मौलिक, अप्रसारित एवं अप्रकाशित

प्रेरणा गुप्ता - कानपुर

prernaomm@gmail.com

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प्रविष्टि क्रमांक - 233

प्रेरणा गुप्ता

2) *बदलता मौसम*

तेजी से अनार के दाने निकालती हुई, चार महीने में कितनी एक्सपर्ट हो गयी थी अनु की ऊँगलियाँ !

उस दिन भी वह अनार के दाने ही तो निकाल रही थी। तभी दीदी आ गई थीं। देखते ही बोली थीं, "अनु, ये क्या हाल बना रखा है तूने ! देखा है आईने में खुद को ! कितनी कमजोर हो गयी है !”

हँसकर वह भी बोली थी, "दीदी, अभी तो मेरा ध्यान सिर्फ इन पर लगा रहता है।"

दीदी ने एक गहरी साँस ली थी और फिर दुलार करते हुए बोली थीं, "देख अनु, ये मुश्किल भरे दिन भी कट जाएँगे। मगर तेरा स्वास्थ गिर गया तो फिर कौन सम्हालेगा ! देख, जब भी तू भास्कर के लिए कुछ सूप वगैरह बनाती है, एक कप खुद के लिए भी बनाकर पी लिया कर । इसी तरह अनार का रस या और जो भी कुछ, तेरे शरीर को भी तो पोषण चाहिए।"

उसने गहरी नजरों से उनकी ओर देखा था।

"ऐसे क्या देख रही है?"

"और जो मन को चाहिए और आत्मा को ...?"

दीदी फट पड़ी थीं, "उफ्फ ! कैसे समझाऊँ ! इतनी आपाधापी में या तो तू शरीर का कर ले या फिर ... जो तेरी समझ में आए।"

वह चुप रह गयी थी और सिर झुका लिया था। कैसे कहे अपने मन की बात, है तो छोटी-सी ... । जब से भास्कर का ऑफिस जाना बंद हुआ है, बस उन्हीं के मन का जीती है। उसे कमरे की खिड़कियाँ खोलकर रहना अच्छा लगता है और वे, सारे दिन खिड़कियाँ बंद करके रखते हैं। मानो खिड़कियों के साथ मन के भी दरवाजे भी बंद हो गये थे उनके । कितना जी घुटता है उसका।

दीदी फिर बोल पड़ी थीं, मगर इस बार धीरे से, "अनु, मैं समझती हूँ सब। तू अभी जो कुछ भी कर रही है न, समझ ले ये तेरी साधना है ...।" और फिर वह उसके सिर पर हाथ फेरती रही थीं।

अचानक उसकी तंद्रा टूटी, "सुनो अनु, डॉक्टर ने मुझे आज से ऑफिस जाने की अनुमति दे दी है। चहकते हुए भास्कर ने कहा।

वह भी खुशी से चहक उठी, “तो चलिए जल्दी से ये रस तो पी लीजिए। और हाँ समय से खाना जरूर मँगवा लीजियेगा।"

"सच कहूँ तो तुम्हारी वजह से आज मैं इतनी जल्दी ठीक हो गया हूँ। तुमने जो किया मेरे लिए, कोई और नहीं कर सकता। लेकिन एक सच और कहूँ ...?"

"हाँ कहिए न !"

"इतने दिनों तक घर में रह कर, मैं घुटता ही रहा । ऑफिस जाने की तलब लगी रहती थी।"

"ओह मुझे भी ... ।" कहते-कहते चुप रह गयी वह।

भास्कर के ऑफिस जाते ही वह कमरे में आ गयी और सारी खिड़कियाँ खोल दीं। पूरे कमरे में बस वह थी और उसका तन-मन जो उसकी रूह के साथ अब सुर-लय-ताल मिला कर थिरक रहा था।

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पता - प्रेरणा गुप्ता

C/O एस के टेक्सटाइल

50/28, नौघड़ा

कानपुर - यूपी

पिन कोड - 208001


ईमेल - prernaomm@gmail.com

2 टिप्पणियाँ

  1. विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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  2. दोनों कथायें बढिया हैं।

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