नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

लघुकथा--जल की गरिमा-नेहा शर्मा

आज प्रधानाचार्य श्री राम स्वरूप चतुर्वेदी जी अपनी पोस्टिंग के बाद पहली बार भरतपुर राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में आए। प्रार्थना सभा के बाद प्रधानाचार्य जी टहलते हुए विद्यालय की शिक्षा व्यवस्था व साफ-सफाई का निरीक्षण करने लगे। निरीक्षण करते वक्त सहसा प्रधानाचार्य जी की नजर कोने में लगे हुए उस बिना टोंटी के नल पर गई ।जिसमें से पानी व्यर्थ बह रहा था। और  विद्यालय के विद्यार्थी उस बहते हुए जल को अनदेखा करते हुए सिर्फ पानी पीते और चले जाते। तभी प्रधानाचार्य जी ने नल पर पानी पी रहे उस बच्चे को इशारे से अपने पास बुलाया। और पूछा बेटा क्या इस नल को बंद करने के लिए कोई टोंटी  नहीं है? बच्चे ने जवाब दिया - नहीं गुरुजी।यह तो हमेशा ऐसे ही बहता रहता है ।बच्चा यह बोलकर अपनी कक्षा की तरफ चला गया।

तभी प्रधानाचार्य जी ने चपरासी को बुलाया और नल बंद करने के लिए टोंटी लाने का आदेश दिया। और साथ में यह भी कहा कि सभी बच्चों को छुट्टी के बाद विद्यालय परिसर में एकत्रित हो जाएँ । छुट्टी के बाद सभी बच्चे एक दूसरे से कानाफूसी करते हुए विद्यालय परिसर में एकत्रित हो गए। सभी शिक्षक सोच रहे थे कि प्रधानाचार्य जी ऐसा क्या कहेंगे जो सभी बच्चों को एक साथ इकट्ठा कर लिया है। तभी प्रधानाचार्य जी ने कहा कि आज मैंने विद्यालय का निरीक्षण करते वक्त कोने में लगे हुए उस व्यर्थ बहते हुए पानी के नल को देखा। जिस पर हमारे शिक्षक, बच्चों किसी का ध्यान नहीं था। उन्होंने पास ही  में खड़े उन शिक्षक महोदय से कहा कि- आज आप बच्चों को कक्षा में जल ही जीवन है पढ़ा रहे थे ना। लेकिन आपके विद्यालय में आपका जीवन रूपी जल ऐसे ही नाली में बहा जा रहा था।

हमें सिर्फ किताबों में लिखी हुई बातों को पढ़ना व बच्चों को पढ़ाना नहीं है। बल्कि उसे अपने वास्तविक जीवन में चरितार्थ भी करना है।हमें जल की महत्ता को समझना है व  दूसरों को भी जल की एक एक बूंद बचाने के लिए प्रेरित करना है। आज हम सभी यह संकल्प लेते हैं कि हम ना ही व्यर्थ पानी बहाएंगे और ना ही व्यर्थ पानी बहने देंगे ।बच्चों व शिक्षकों की इस गूंजती हुई आवाज से प्रधानाचार्य जी को यह संतोष हो गया कि आज इन सभी को जल ही जीवन है का पाठ लगता है सच्चे अर्थों में समझ आ गया है।

नेहा शर्मा।

vpo- बीजवाड़ चौहान,

        अलवर,  (राजस्थान)

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.