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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 268 // “क्या से क्या हो गया...?” // अमित पुरोहित

प्रविष्टि क्रमांक - 268

अमित पुरोहित [Chartered Accountant]


“क्या से क्या हो गया...?”

 

जालप मोहल्ले में वीणा भाभी की मासी का असली नाम तो किसे को भी मालूम नहीं, मगर मोहल्ले के लोगों के लबों पर उनका नाम ‘बहन आंटी’ चढ़ा रहता था। छोटे-बड़े सभी उनको इसी नाम से पुकारा करते थे। पुराने ख़्यालों में पली बहन आंटी को व्रत रखना, रोज़ मंदिर जाना, दोपहर पीहर जाकर हफ्वात हांकना वगैरा तो उनके शौक थे ही..और शाम को बैठकर वह रोज़ मंदिरों में विराजमान देवी-देवताओं की मूर्तियों के लिए, ज़री-गोटे लगाकर पोशाकें किया करती थी। कभी-कभी वह ब्लाउज़ के कट-पीस होल सेल की दुकान जाकर, सस्ते में ख़रीद लाती और उन्हें मंदिर में आयी औरतों को महंगे भाव में बेच दिया करती..इससे उसका ज़ेब-ख़र्च आराम से चलता था। कल की ही बात है, वह दोपहर अपने पीहर गयी, वहां जाकर चाय की चुस्कियां लेती हुई अपनी मां और बहनों से हफ्वात हांक रही थी..तभी उनको याद आया कि ‘उन्हें गुप्त नवरात्रि के उपवास करते नौ दिन बीत गए हैं, अब कल उनको नौ बालिकाओं को भोजन खिलाना है।’ वे अक्सर ऐसे मौक़ों पर, रिश्तेदारों की कुंवारी कन्याओं को भोजन का निमंत्रण दिया करती। ऐसे काम में, उनकी मां रूप कौर उनकी मदद करती। फिर क्या ? झट अपनी मां को काम सौंपकर, वे ख़ुद इस काम से फारिग़ हो गयी। अब कल कुंवारी कन्याओं को भोजन पर बुलाने की जिम्मेदारी, उनकी मां की बन गयी। कल किस-किस छोरी को बुलाना है..? यह सोचने का प्रश्न, मां पर डालकर शाम को वे अपने घर चली आयी।

घड़ी में रात के दस बजे होंगे, और तभी मोबाइल की घंटी बजी। मोबाइल ओन करके, बहन आंटी बोली “हेल्लो कौन ? मां..?”

“हाँ, बेटा। बात यह है कि, ‘शहर में अभी रिश्तेदारी में, शादियाँ बहुत है। यही कारण है, उनकी बच्चियां कल तेरे यहाँ भोजन करने नहीं आ पायेगी। बस, यही कहने के लिए तूझे फ़ोन किया..अब फ़ोन रख रही हूँ, जय श्री कृष्ण।” इतना कहकर, रूप कौर ने अपना मोबाइल बंद कर दिया। अब बहन आंटी को फ़िक्र सताने लगी, अब रात के दस बजे, वह कैसे कुंवारी कन्याओं को भोजन करने के निमंत्रण भेजेगी ? दूसरी बात एक और, कल सुबह उसे गंग श्यामजी के मंदिर में भागवत-कथा सुनने भी जाना है..! जहां कथा का समय, सुबह ९ बजे से शाम के ४ बजे तक रखा गया। उनके सामने समस्या आ गयी, अब कल इन बच्चियों को भोजन कैसे करायेगी ? और, कैसे वह सही वक़्त पर कथा सुनने मंदिर जा पायेगी ? बहन आंटी को फ़िक्रमंद पाकर उनके बेटे मोंटू की बहू रेखा को चिंता होने लगी। वह सोचने लगी, ‘उसकी सास इतनी ख़ुश-मिज़ाज़ होते हुए भी, इस वक़्त फ़िक्रमंद क्यों है ?’ चिंता का कारण मालुम होते ही, रेखा अपनी सास को दिलासा देती हुई बोल उठी “माताजी, आप फ़िक्र न करें। नौ बच्चियों को भोजन कराने का काम, मुझ पर छोड़ दीजिये। इस काम को, मैं स्वयं कर लूंगी। आप तसल्ली से, कथा सुनने मंदिर चली जाएँ। मेरी अम्माजी भी व्रत करती है, वह जिन बच्चियों को भोजन कराती है..उन्ही बच्चियों को, मैं यहाँ बुला लाऊंगी। आप बेफिक्र होकर, मंदिर जाएँ।” यह सुनकर, बहन आंटी को ढाढ़स बंधा। दूसरे दिन, वह मंदिर में कथा सुनने चली गयी। शाम को जब घर लौटी, तब उन्हें कहीं भी जूठे बरतन पड़े नज़र नहीं आये..बस, बहन आंटी को शक हो गया ‘इस नालायक भुल्लकड़ बहू ने, कन्याओं को खाना नहीं खिलाया है..?’ फिर क्या ? अपने मुख से बहन आंटी अंगार उगलने लगी, तभी उनके बेटे मोंटू ने उनको समझाते हुए कहा “माताजी, गुस्सा काहे करती हैं आप ? आपकी बहू ग़रीबों की बस्ती में जाकर, कुंवारी बच्चियों को खाना खिलाकर आ गयी।” अब तो बहन आंटी का गुस्सा और बढ़ने लगा, और वह बेनियाम होती हुई आगे कहती गयी “राम राम, सत्यानाश कर डाला। अच्छी जात की छोरियों को छोड़कर, इसने नीच जात की छोरियों को खाना खिला दिया..? अब तो, अम्बे मां नाराज़ हो जायेगी। तेरी बहू को, इसकी मां ने यही सिखाया है..? इसकी मां पापिनी और यह ख़ुद...”

बेचारी बहू सर झुकाकर, सब-कुछ सुनती रही। एक शब्द भी, वह बेचारी बोली नहीं। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई, मोंटू ने जाकर दरवाज़ा खोला। उसको यह देखकर आश्चर्य हुआ, आज़ उसके दरवाज़े पर ‘मोहल्ले की ‘जागरुक महिला समिति’ की महिलाएं, पुष्प हार लिए सामने खड़ी है। फिर क्या ? वे सभी बहन आंटी की शान में कसीदे पढ़ती हुई, बहन ओटी को पुष्प-हार पहनाने लगी। पुष्प-हार पहनाकर, उनकी अध्यक्ष बोली “बहन आंटी। आप इस मोहल्ले की जागरुक महिला हैं। आपने धर्म पर छाये दकियानूसी आवरण को हटाकर, धर्म के सही मर्म को समझा है। आपने गरीब बच्चियों को खाना खिलाकर, सच्चे धर्म के नियमों का अनुकरण किया है। आप जैसी जागरुक महिलाएं अगर हर घर में होती, तो आज़ यह देश सच्चे धर्म का पथ-प्रदर्शक बन जाता। बहन आंटी, आपको बहुत-बहुत बधाई।”

तभी मोंटू की बहू, सबके लिए चाय और नाश्ता ले आयी। सभी महिलाओं ने चाय-नाश्ता लिया, फिर बहन आंटी की तारीफ़ करती हुई रुख़्सत हो गयी। उनके जाने के बाद, बहन आंटी के लबों पर मुस्कान छा गयी। बरबस उनके मुंह से, यह जुमला निकल गया “बहू, तूने गरीब बच्चियों को खाना खिलाकर धर्म का काम किया। भरे हुए को सभी भरते हैं, मगर ज़रूरतमंद को कोई नहीं पूछता। मुझे खुशी है, तेरी मां ने तूझे बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं। मुझे गर्व है, मुझे तेरी जैसी बहू मिली।” इतना कहकर, बहन आंटी ने अपनी बहू को गले लगा लिया। बेचारा मोंटू यह मंज़र देखकर, अचरच में डूब गया। वह सोचने लगा, “अभी थोड़ी देर पहली इसकी मां बहू का मानमर्दन करती जा रही थी, और अब वह इसे अपने सर-आँखों पर चढ़ाए जा रही है ? वाह, भाई वाह। कमाल हो गया, भाई। क्या से क्या हो गया ?”

- अमित पुरोहित

निवास अँधेरी-गली, आसोप की पोल के सामने, वीर-मोहल्ला, जोधपुर [राजस्थान].

1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है आपकी सलाह, सुझाव हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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