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तोहफा - अंकुश्री की लघुकथाएँ

(लघुकथा)
तोहफा

अंकुश्री (Ankushri)


                        - अंकुश्री

गांव में कुछ नवयुवक घूम-घूम कर प्रचार कर रहे थे, ‘‘गरीब जनता के लिये तोहफा आया हुआ है. धोती, साड़ी और रुपये मुफ्त में बांटे जा रहे हैं.’’
‘‘सभी को मिलेंगे ?’’ किसी ने पूछा.
‘‘हां ! तोहफा आखिर तोहफा है. बच्चे-बूढ़े सभी को मिलेंगे.’’
गांव में एक शिविर लगा हुआ था. अपना काम धंधा छोड़ कर गांव के सभी लोग तोहफा के लिये शिविर में एकत्रित होने लगे.
शिविर के अंदर कुछ डाक्टर और उनके सहायक बैठे हुए थे. अंदर जाने वालों को डाक्टर समझा रहे थे, ‘‘बच्चा दो या तीन बस !’’
     ‘‘पर मुझे तो एक ही बच्चा है.’’ किसी ने कहा तो देखा-देखी दूसरे लोग भी अपनी वास्तविकता बताने लगे, ‘‘मुझे तो एक भी नहीं है.’’
     ‘‘मेरी तो इसी साल शादी हुई है.’’
     ‘‘मैं तो अब सत्तर पार कर चुका हॅू.’’
       ‘‘मेरी तो अभी शादी ही नहीं हुई है.’’
     अंदर जाने वालों को डाक्टर ने समझाया, ‘‘ऐसा अच्छा मौका फिर कभी नहीं मिलेगा - - - . मुफ्त का तोहफा भी कहीं छोड़ा जाता है !’’ डाक्टर का बात करने का लहजा बहुत अच्छा था. कई ग्रामीण उसके कहने में आ गये. जो अंदर गया, उसका ऑपरेशन कर दिया गया.
     शिविर से बाहर आने वालों के एक हाथ में धोती या साड़ी और दूसरे हाथ में नकद रुपये थमा दिये गये. बच्चा हो या जवान, बूढ़ा हो या विधवा, दुल्हा हो या कुंआरा - डाक्टरों ने तोहफा के लिये किसी को निराश नहीं होने दिया.
     दूसरे दिन देखा गया कि गांव के अधिकतर लोगों का चेहरा मलीन हो गया था. लेकिन वे तोहफा के नवीन वस्त्र में सुसज्जित थे. चेहरे की मलीनता वस्त्र की नवीनता मे छिपने का असफल प्रयास कर रही थी.   
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(लघुकथा)
स्पष्टीकरण
                               - अंकुश्री

     कारखाने का वार्षिक रिपोर्ट देख कर मालिक को चिंता हो गयी. पिछले साल पचास लाख रुपये का घाटा लगा था.
     पूछने पर मैनेजर ने स्पष्टीकरण दिया, ‘‘काम बढ़ गया है लेकिन उसके अनुसार कर्मचारी नहीं बढ़े हैं. काम निपटाने के लिये कर्मचारियों को समय बीतने के बाद भी रोका जा सकता था. लेकिन कारखाना में ओवर टाईम की कोई व्यवस्था नहीं है. इसलिये कर्मचारियों ने ओवर टाईम नहीं किया.’’
     मालिक ने उसी समय आदेश दिया कि अब ओवर टाईम देकर कर्मचारियों से काम कराया जाये.
     दूसरे साल कारखाना का रिपोर्ट देख कर मालिक ने माथा पकड़ लिया. उस साल एक सौ पचास लाख का घाटा हो गया था.
     मैनेजर स्पष्टीकरण देने के लिये फिर तैयार था. उसने कहा, ‘‘घाटा तो एक सौ लाख रुपये का ही हुआ है; बाकी पचास लाख रुपये कर्मचारियों को ओवर टाईम देने में खर्च हुआ है.’’
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अंकुश्री
सिदरौल, प्रेस कॉलोनी,
पोस्ट बॉक्स 28, नामकुम,
रांची-834 010

E-mail : ankushreehindiwriter@gmail.com

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