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व्यंग्य // कल्चर-शॉक // डॉक्टर आफ़ताब अहमद

कौन जाने कि जब आती है हँसी होंठों पर
दर्द कम होता है या दर्द सिवा होता है

मैंने एक दोस्त से ज़िक्र किया कि 'यार पिछले साल मैंने ‘जश्न-ए-उर्दू’ समारोह में मुश्ताक़ अहमद युसुफ़ी की रचनाओं से कुछ अंश पढ़कर सुनाये थे। लोगों को बड़ा मज़ा आया था। कैसा रहेगा अगर इस बार समारोह के लिए स्वयं एक व्यंग्य-लेख लिखकर श्रोताओं के होंठों को मुस्कानों से सजाऊँ।” कहने लगा, "लिखने-विखने की तकलीफ़ क्यों करोगे। अगर हँसाना ही उद्देश्य है तो यह तो और बेहतर तरीक़े से पूरा हो सकता है।” मैंने पूछा, “कैसे?” बोला, “अलग-अलग एंगल्स से अपनी तस्वीरें खिंचवाकर हाल में टांग दो।” मैंने उसकी बात मज़ाक़ समझकर टाल दी और लेख लिख डाला जो आपके सामने प्रस्तुत है। ख़ुदा के लिए मुश्ताक़ अहमद युसुफ़ी को अपने साथ नत्थी करने का मतलब यह न समझ लीजिएगा कि मैं उनसे प्रतियोगिता की भावना रखता हूँ। कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली ! युसुफ़ी उर्दू हास्य-व्यंग्य के आकाश के सबसे चमकते सितारे हैं। उनके जैसे हास्य-व्यंग्य लेखक उर्दू साहित्य के पूरे इतिहास में इक्का-दुक्का हैं। मेरा तो लेख लिखने का यह पहला प्रयास है।

इस लेख के द्वारा मैं आपको अपने एक अनुभव में शामिल करना चाहता हूँ, जो मुझे अमरीका आने के कुछ ही महीनों बाद हुआ था। लेख का शीर्षक है "कल्चर शॉक"। अपनी बात इन पंक्तियों से शुरू करता हूँ।

कोई ना-वाक़िफ़-ए-आदाब-ए-चमन आया था
मैंने काँटों पे भी होंठों के निशाँ देखे हैं

चमन के आदाब से नावाक़िफ़ वह शख़्स यह नाचीज़ था। अमरीका पहुँचा तो शुरू-शुरू में दिलो-दिमाग़ पर ऐसा नशा छाया रहता था कि फूल तो फूल, काँटों को भी चूम-चूमकर अपने होंठों को लहू-लुहान किये फिरता था। उसी ज़माने की बात है…… थैंक्स-गिविंग से एक दिन पहले वाली शाम थी। छुट्टी के विचार से धीमी-धीमी मस्ती छाई हुई थी। एक मित्र के साथ रेस्टोरेंट में चार बजे ही डिनर खा लिया। खाना काफ़ी स्वादिष्ट था। वैसे भी छुट्टी या सप्ताहाँत वाली शाम के खाने का स्वाद कुछ ज़्यादा ही हुआ करता है। खाना खाकर हल्की-फुल्की ख़रीदारी के इरादे से मार्केट पहुँचा। आपको अन्दाज़ा होगा ही कि यहाँ की मार्केट में क़दम रखना ऐसा है, मानो किसी दलदल में क़दम रख दिया हो। निकलना मुश्किल हो जाता है। दुकानों के पारदर्शी शीशों के पीछे से चीज़ें हाथ बढ़ा-बढ़ाकर दिल का दामन खींचने लगती हैं। अतः मैंने घंटों तक विंडो-शॉपिंग की।

बाल-बच्चे तो थे नहीं कि जल्दी घर पहुँचने की मजबूरी होती। चुनांचे तुझे देखा तो यह जाना सनम, प्यार होता है दीवाना सनम और आ जा सनम, मधुर चाँदनी में हम तुम मिलें, तो वीराने में आ जायेगी बहार, जैसे रोमांटिक गीत गुनगुनाता हुआ काफ़ी देर में अपार्टमेंट पहुँचा। अंधेरा फैल चुका था। अपार्टमेंट की इमारत में प्रवेश किया तो अप्रत्याशित रूप से उसकी सीढ़ियों पर अन्धेरा था। बल्ब जलाने के इरादे से सीढ़ियों के पास वाली दीवार पर स्विच टटोलने लगा। जिस चीज़ पर हाथ पड़ा वह साधारण स्विचों जैसी नहीं थी। सोचा शायद यहाँ सीढ़ियों के पास वाले स्विच ऐसे ही होते हों....।

स्विच को छूते ही महोदय ने एक तूफ़ान खड़ा कर दिया। पूरी इमारत में कोहराम मच गया। हुआ यह था कि स्विच के धोखे में मैंने फ़ायर-अलार्म की दुखती रग को छू लिया था। हंगामा देखकर मेरी साँसें सीने में थम गईं। बुरी तरह हड़बड़ा गया। दीवार को एक सिरे से दूसरे सिरे तक टटोल डाला कि आवाज़ को रोकने वाला स्विच भी यहीं कहीं होगा। कुछ हाथ न लगा तो इमारत से बाहर निकल आया। बाहर दरवाज़े के पास एक लकड़ी के बोर्ड में कई बटन जड़े हुए नज़र आये। उनमें से एक लाल बटन अलार्म की “हों हों” की ताल पर जल-बुझ रहा था। बिस्मिल्लाह कहकर उसपर उंगली रख दी। कोई फ़ायदा न हुआ। मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की। लगता था कि अब यह शोर कभी नहीं थमे गा----कम-से-कम मेरी ज़िंदगी में। यह कोई साधारण शोर नहीं था। भगवान कृष्ण जब पूतना राक्षसी के स्तन के रास्ते उसके प्राण खींचते हुए बाल-लीला कर रहे थे, तो वह ऐसी ही आवाज़ में चीख़ी, चिल्लायी होगी। इसे सुनकर अच्छे भले स्वस्थ आदमी को भी दिल का दौरा पड़ सकता था। थोड़ी ही देर में लोग बिलबिलाकर इमारत से निकल पड़े। देखते ही देखते लगभग तीस लोग जमा हो गए।

इस इमारत में रहते हुए मुझे लगभग तीन महीने हुए थे। पहली बार अहसास हुआ कि इसमें इतने सारे इंसान रहते हैं। ख़ुदा जाने वे इतने छिपकर क्यों रहते हैं। अपने यहाँ तो सिर्फ़ चोर-उचक्के और टटपुँजिये मुजरिम पुलिस के डर से मजबूरी में साधु-संतों वाला ऐसा वैराग्यपूर्ण जीवन बिताते हैं। अपनी क्षुद्र व अनियमित कमाई से भला कहाँ तक बेचारे नौकरशाही महापुरुषों की बर्फ़ीली हथेलियाँ पिघलाते रहें। हाँ, उच्च स्तर के अपराधियों की बात अलग है। वे सीना फुला-फुलाकर और क़ानून व प्रशासन की आँखों में आँखें डालकर बल्कि उन्हें चिढ़ा-चिढ़ाकर घोटाला, हत्या, जालसाज़ी जो चाहे करें। उन्हें भला कौन हाथ लगा सकता है। क्या पता कब वे अपने क़ानून-भंजक कारोबार की उंगली पकड़कर एम. एल. ए., एम. पी., मंत्री या मुख्यमंत्री पद पर आसीन हो जाएँ और अपने भूतपूर्व सहचरों के लिए प्रकाश-स्तम्भ बन जायें तथा जनता में लोकप्रियता प्राप्त कर लें। जहाँ तक हम जैसे सुशील, शालीन, सदाचारी, विनयशील और मर्यादित व्यक्तियों का सम्बन्ध है तो हमारे लिए तो बस इतना ही प्रयाप्त है कि जिस पड़ोस, क़स्बे या नगर में हम रहें, वहाँ के लोग हमारे उपर्युक्त गुणों से सिर्फ़ भलीभांति परिचित हों। हम भी दूसरों के हालात और हरकतों से परिचित रहना अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी समझते हैं। अतः अन्य बातों के अतिरिक्त, चाहे अनचाहे, हम पड़ोसियों की सारी बुरी आदतों और कुकर्मों से परिचित हो जाते हैं। मसलन हमें भलीभांति मालूम होता है कि पड़ोस के अमुक अधिकारी या क्लर्क की ऊपरी आमदनी कितनी है। अमुक पड़ोसी के घर में चोरी की बिजली से कितने ए.सी. चलते हैं। अमुक के घर में क्या पकता है, अमुक की लड़की या बहन का आजकल किससे अफ़ेयर चल रहा है और उस व्यक्ति की जाति या धर्म क्या है। अगर मुस्लिम पड़ोस है तो यह एक्स्ट्रा-इन्फ़ार्मेशन भी होती है कि कौन-सा पड़ोसी हफ़्ते में कितने दिन गोश्त, बिरयानी, कबाब, पुलाव और ज़र्दा उड़ाता है और कौन-से पड़ोसी को सिर्फ़ दाल-सब्ज़ी रोटी जैसे हिन्दुवाना भोजन पर गुज़ारा करना पड़ता है।

तो मैं यह कह रहा था कि बीस-पच्चीस लोग इमारत से निकल आये। लेकिन किसी को फ़ायर-अलार्म बंद करने का उपाय मालूम नहीं था। मैंने कई और विचित्र बातें नोटिस कीं। मसलन यह कि सिर्फ़ हमारी इमारत के रहने वाले लोग बाहर निकले। पड़ोसियों के कानों पर जूँ तक न रेंगी। वहाँ से एक भी व्यक्ति यह पता करने न आया कि यह कैसा हंगामा है? न ही राहगीरों ने रुककर मालूम करने की कोशिश की कि भला यह चिल्ल-पों क्यों मची हुई है। सबसे अधिक आश्चर्य तो इस बात पर हुआ कि ख़ुद हमारी इमारत के जो लोग वहाँ एकत्रित हो गये थे, उनमें से भी किसी ने न पूछा कि किस दुष्ट ने यह हरकत की है ? मैं समझ नहीं पा रहा था कि भला इतनी महत्वपूर्ण बात जानने की किसी को उत्सुकता क्यों नहीं थी? लोगों की जिज्ञासा इतनी कुण्ठित क्यों थी? आख़िर यहाँ पड़ोसी के मामलात के प्रति इतनी उदासीनता क्यों है लोगों में? किसी ने अलार्म-राग छेड़ने वाले अनजान अपराधी को एक गाली भी नहीं दी। अरे, गाली तो दूर, कोई झूठे-मुँह बड़बड़ाया भी नहीं कि 'साले! कमीने! न जाने कहाँ-कहाँ से हमारी ज़िंदगियाँ हराम करने चले आते हैं।' ख़ुदा जाने यह उनकी शालीनता थी या असंवेदनशीलता, लेकिन अपनी तो यह हालत थी कि अपराध-बोध से गर्दन झुककर ठोड़ी से जा लगी थी। कोई देखता तो कहता कि महोदय " दिलके आईने में है तस्वीर-ए-यार, इक ज़रा गर्दन झुकाई, देख ली वाले रोग से पीड़ित जान पड़ते हैं। किसी ने हमारी ओर ध्यान न दिया।

तभी एक सज्जन ने फ़ायर-सर्विस को फ़ोन कर दिया। मैं सोच भी नहीं सकता था कि बात इतनी आगे बढ़ जायेगी। बुरी तरह से डर गया। दुश्चिंताओं के भँवर में डुबकियों पर डुबकियाँ खाने लगा। साँसें उखड़ने लगीं। अब तो यह बात पक्की थी कि फ़ायर-सर्विस वाले पूछ-ताछ करेंगे और अपराधी का पता लगा ही लेंगे। शायद उनके साथ पुलिस भी आये और मुझे पकड़कर जेल में ठूँस दे। कोई बड़ा जुर्माना भी देना पड़ सकता है। कुछ नहीं तो सबके सामने अपमानित तो करेंगे ही कि 'अबे साले मूर्ख! गँवार! तेरा अमरीका आना इतना ज़रूरी था क्या? और अगर आ ही गया था तो कम-से-कम यह तो मालूम कर लेता कि यहाँ की इमारतों पर फ़ायर-अलार्म नाम की एक चिड़िया बैठी होती है, जो समय आने पर चहचहाती भी है। सिर्फ़ दीवारों की शोभा बढ़ाने के लिए नहीं होती।

दिल को समझाया कि किसी ने यह हरकत करते मुझे देखा तो है नहीं। भला अपराध स्वीकार करने की ज़रूरत ही क्या है। लेकिन अमरीका पहुँचते ही अंग्रेज़ी बेहतर करने के उद्देश्य से अपराध जगत से सम्बंधित कई सनसनीखेज़ हॉलीवुड फ़िल्में तथा टी. वी. ड्रामे देख डाले थे। मेरे मन में यह बात बहुत गहरी बैठ गई थी कि यहाँ का जासूसी विभाग बहुत होशियार है। चुटकियाँ बजाते ही सब कुछ पता लगा लेता है। यहाँ के साधारण पुलिस अधिकारियों के चेहरों में मुझे शर्लाक होम्ज़ और जेम्सबांड की शक्लें नज़र आती थीं। ख़ुदा जाने कैसे यह भय भी दिल में समा गया था कि किसी के नाम में "मुहम्मद", "अहमद", "अली", "हुसैन" या "ख़ान" का फुंदना लगा हो तब तो उसकी हर हरकत की इस विभाग को ख़बर रहती है। मसलन इस व्यक्ति की दिनचर्या क्या है। किस-किस से मिलता है। किस रेस्टोरेंट में खाना खाता है। हफ़्ते में कितनी बार नहाता है। दिन में कितनी बार खाँसता है और कितनी बार आहें भरता है। इस विभाग की धाक दिल पर ऐसी बैठ गई थी कि मुझे लगता था कि हमारे विचारों, हमारी इच्छाओं, हमारी भावनाओं, बल्कि हमारे सपनों को रिकार्ड कर लेने की कोई न कोई मशीन इसके पास ज़रूर होगी। हफ़्ते भर उर्दू भाषा पढ़ाने के बाद मेरे दिल पर एक उदासी छा जाया करती है। थोड़े-थोड़े दिनों पर रेचन कर लिया करता हूँ। न करूँ तो पागल हो जाऊँ। अतः कभी-कभी यूँ ही अपने आपसे ही उर्दू में गालियाँ बककर भड़ास निकाल लिया करता हूँ। लेकिन अक्सर ऐसा हुआ कि गालियाँ बकते-बकते चौंककर चुप हो गया और इधर-उधर देखने लगा कि कहीं कोई खुफ़िया कैमरा मेरी इस हरकत की फ़िल्म न बना रहा हो। ज़ाहिर है कि मेरे अचेतन मन में वह भय बहुत गहरा बैठा हुआ है जिसका ज़िक्र मैंने अभी-अभी किया है। इसलिए उचित यही समझा कि अगर मुझसे पूछ-ताछ करेंगे तो सच बोल दूँगा। वरना झूठ का पर्दा फ़ाश होने पर और भी अपमान सहना पड़ेगा।

ख़ैर, दस मिनट में फ़ायर डिपार्टमेंट का एक सुर्ख़ ट्रक चीख़ता-चिंघाड़ता, आसमान सिर पर उठाये आ पहुँचा। दूर ही से उसकी आवाज़ सुनकर मेरा दिल बैठने लगा था। जब ट्रक हमारी इमारत के पास आकर रुका उस समय मुझे यह होश भी नहीं रह गया था कि मैं इसी लोक में हूँ या आत्मा-लोक में विचर रहा हूँ । दो हट्टे-कट्टे महापुरुष सुर्ख़ ट्रक से प्रकट हुए। मैं समझा कि मुनकिर-नकीरI आ गए। यह सोचने का होश ही किसे था कि मुनकिर-नकीर ट्रक में बैठकर शोर मचाते हुए भला क्यों आयेंगे। और न ही वे बैंड-बाजा लेकर दुल्हन ब्याहने आये थे कि उन्हें पूरा शहर सिर पर उठाने की ज़रुरत होती। और यह भी थोड़ी देर बाद मालूम हुआ कि उनके हाथों में जिस चीज़ को मैंने गुर्ज़II समझा था वो लम्बे आकार की फ़्लैश-लाइट्स थीं। ख़ैर, ये दोनों सज्जन सीधे इमारत के एक हिस्से में गए। एक स्विच-बोर्ड के कान में चुपके से कुछ कहा। अचानक सन्नाटा छा गया। जैसे बीमार को बे वजह क़रार आ जाए...। स्विच-बोर्ड भी उनके कानों में कुछ फुसफुसाया। क्योंकि तुरन्त वे सीढ़ियों की तरफ़ बढ़े और दनदनाते हुए मेरे अपार्टमेंट के पास पहुँच गए। वहाँ के स्विच-बोर्ड से अन्तरंग बातें होने लगीं। इस दौरान मैं सोच रहा था कि इन सबसे निपटकर वे मेरी तरफ़ ध्यान देंगे। अपना अपराध स्वीकार कर लेने के लिए मैं मन ही मन तैयार हो चुका था।

लेकिन यह क्या? वे सीढ़ियों से खट-पट खट-पट उतरकर इमारत से बाहर आये। वहाँ पर उपस्थित जनों को थैंक्स-गिविंग की बधाई दी। और मुस्कुराते हुए सुर्ख़ ट्रक में बैठकर ख़ामोशी से चले गए। मेरी समझ में कुछ भी नहीं आया। काफ़ी देर तक यही सोचता रहा कि यह एक दुःस्वप्न था या वास्तविकता? इतना हंगामा ....! इतना शोर .......! और नतीजा? न किसी को पकड़ा-धकड़ा गया ...... न किसी को डाँटा- डपटा गया ......न किसी को मारा-पीटा गया ..... न किसी को ज़लील किया गया। खोदा पहाड़ निकली चुहिया! कहने की ज़रुरत नहीं कि मेरे लिए यह एक नाक़ाबिले-यक़ीन लेकिन सुखद ऐंटी-क्लाइमैक्स था। बाद में पता चला कि यहाँ इस प्रकार के ऐंटी -क्लाइमैक्स अक्सर होते रहते हैं। बहुत अफ़सोस हुआ। काश पहले से यह बात मालूम होती! इतनी तकलीफ़ और ऐसी मानसिक पीड़ा से तो न गुज़रना पड़ता। जी चाहा कि एक बार फिर लपककर अलार्म बजा दूँ। और अबकी बार सिर्फ़ एन्जॉय करूँ।

डॉ. आफ़ताब अहमद,

व्याख्याता, हिंदी-उर्दू, कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क

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डॉक्टर आफ़ताब अहमद

जन्म- स्थान: ग्राम: ज़ैनुद्दीन पुर, ज़िला: अम्बेडकर नगर, उत्तर प्रदेश, भारत

शिक्षा: जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी, दिल्ली से उर्दू साहित्य में एम. ए. एम.फ़िल और पी.एच.डी. की उपाधि। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ से आधुनिक इतिहास में स्नातक ।

कार्यक्षेत्र: पिछले आठ वर्षों से कोलम्बिया यूनिवर्सिटी, न्यूयॉर्क में हिंदी-उर्दू भाषा और साहित्य का प्राध्यापन। सन 2006 से 2010 तक यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया, बर्कली में उर्दू भाषा और साहित्य के व्याख्याता । 2001 से 2006 के बीच अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ़ इन्डियन स्टडीज़, लखनऊ के उर्दू कार्यक्रम के निर्देशक ।

विशेष रूचि: हास्य व व्यंग्य साहित्य और अनुवाद ।

प्रकाशन: सआदत हसन मंटो की चौदह कहानियों का “बॉम्बे स्टोरीज़” के शीर्षक से अंग्रेज़ी अनुवाद (संयुक्त अनुवादक : आफ़ताब अहमद और मैट रीक)

मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी के उपन्यास “मृगमरीचिका” का अंग्रेज़ी अनुवाद ‘मिराजेज़ ऑफ़ दि माइंड’(संयुक्त अनुवादक : आफ़ताब अहमद और मैट रीक)

पतरस बुख़ारी के उर्दू हास्य-निबंधों और कहानीकार सैयद मुहम्मद अशरफ़ की उर्दू कहानियों के अंग्रेज़ी अनुवाद ( संयुक्त अनुवादक : आफ़ताब अहमद और मैट रीक ) कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित।

सम्प्रति: हिन्दी-उर्दू लैंग्वेज प्रोग्राम, दि डिपॉर्टमेंट ऑफ़ मिडिल ईस्टर्न, साउथ एशियन एंड अफ़्रीकन स्टडीज़, कोलम्बिया यूनिवर्सिटी, न्यूयॉर्क से सम्बद्ध।

सम्पर्क: 309 Knox Hall, Mail to 401 Knox Hall,

606 West 122nd St. New York, NY 10027

ईमेल: aftablko@gmail.com


I मुनकिर-नकीर: वे दो फ़रिश्ते जो क़ब्र में मुर्दों से सवाल-जवाब करते हैं। अल्लाह के नेक बन्दे तो आसानी से उत्तीर्ण हो जाते हैं। गाज गिरती है गुनहगारों पर। बेचारे गुनाहगार एक भी सवाल का सही जवाब नहीं दे पाते । फिर तो ये खूँखार फ़रिश्ते लोहे की भयानक गुर्ज़ से उनकी ऐसी धुलाई करते हैं कि क़ब्र में भी उनको नानी याद जाती है। हमारे मदरसों के उस्ताद बच्चों को डंडे से पीटने की प्रेरणा इन्हीं फ़रिश्तों से लेते हैं।

II गुर्ज़- गदा सरीखा लोहे का कोड़ा जिससे मुनकिर-नकीर पापियों को प्रताड़ित करते हैं। वे अपना सारा ग़ुस्सा इन मुसलमान पापियों पर उतार देते हैं क्योंकि हिन्दू पापियों पर उनका बस नहीं चलता।

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