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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 250 // भिन्नता // सुधा शर्मा

प्रविष्टि क्रमांक - 250

सुधा शर्मा

भिन्नता

जून माह में दिल्ली के प्रगति मैदान के मैट्रो स्टेशन के प्रवेश द्वार पर मैं पहुँची ही थी कि वहाँ खडे अनेक ठेलों पर नजर बरबस ही पहुँच गई। सूरज देव के यौवनकाल के कारण पाँच बजे भी शरीर पसीने से तरबतर था। बस पानी या पेय पदार्थ ही हर प्राणी के लिए अमृत थे। उदरपूर्ति होने के बाद भी पेय-पदार्थ पेट में जाने के लिए लालायित रहते। गेट पर खडे जूसवाले की आमन्त्रण भरी आवाज ने बरबस ही मेरे कदमों को रूकने के लिए मजबूर कर दिया। बीस रुपये में जूस का गिलास सूर्य के प्रकोप के कारण मुफ्त में मिले प्रसाद जैसा आभास दे रहा था। मैंने शीघ्रता से जाकर एक गिलास जूस देने के लिए कहा। दो मिनट बाद ही जूस से लबालब  गिलास मेरे हाथ में था। 

      मैंने अभी रसास्वादन के लिए एक घूँट ही भरा था कि एक थका हारा परिवार भी वहीं आकर रूका। पति पत्नी के साथ एक दस- ग्यारह साल की लडकी और लगभग नौ साल का लडका था। देखने से ही आभास हो रहा था कि परिवार किसी गाँव से आया था या बिहार या अन्य किसी प्रदेश  से काम की कामना में आया परिवार है । लड़की की भावभंगिमा बता रही थी कि या तो वह बिमार है या गर्मी तथा रास्ते की थकान ने उसके आगे चलने के हौसलों को ध्वस्त कर दिया है। उसने माँ के इर्द- गिर्द अपनी नन्हीं भुजाएँ फैला दी और अपना सिर माँ के शरीर से चिपका दिया।  पिता ने अतिशीघ्रता से जूसवाले को एक गिलास जूस बनाने का आदेश दिया। एक मिनट बाद ही जूसवाले का हाथ जूस के गिलास के साथ उसके सामने उपस्थित था। पिता ने भी उतनी ही फुर्ती से दस का नोट जूसवाले को देने के लिए हवा में लहरा दिया। 'बीस रूपये का है जूस' जूसवाले के इस वाक्य ने पिता को जेब टटोलने के लिए मजबूर कर दिया। शायद बीस रूपये खर्च करना उसकी औकात से बाहर था। लड़की और उसके पिता के चेहरे पर आई निराशा स्पष्ट पढी जा सकती थी। लड़की और जूसवाले के बढ़े हुए हाथ वापिस लौट चुके थे। माँ का चेहरा क्रोध से तमतमा गया था। पता नहीं वो पति की लाचारी पर नाराज थी, या बेटी की असमर्थता पर।

     मेरे जूसधारक हाथ को  मानो काठ मार गया था,वह मुँह तक जाने में संकोच कर रहा था। मैं किंकर्तव्यविमूढ़ सी विचारमग्न थी। मेरे सामने दो ही विकल्प थे या तो मैं दस रुपये दे दूँ या जूसवाले को जूस देने के लिए प्रेरित करूँ। मैंने पहले प्रथम विकल्प को अपनाया और जूसवासे से कहा- "भैया आधा गिलास दे दो। लगता है लडकी की तबियत ठीक नहीं है।" मेरे शब्द समाप्त भी नहीं हुए थे कि जूसवाले ने जूस का गिलास लड़की को थमा दिया। मेरे बीस रुपये देने का प्रयास विफल हो गया और उसने उस पिता के दस रुपयें को भी विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया। मेरा मन उस जूसवाले के प्रति भावविभोर हो उठा। पिता शायद धन्यवाद शब्द कहना नहीं जानता था। इस औपचारिकता को मैंने पूरा किया और मैं मैट्रो ट्रेन में सवार होने के लिए चल पडी।

मैं मैट्रो ट्रेन में सफर कर रही थी लेकिन मेरे सामने उस जूसवाले का चेहरा था ,जो मुझे एक घटना को याद करने के लिए बार - बार बाध्य कर रहा था। आज ही तीन घंटे पहले जब मैं दिल्ली के कशमीरी गेट मैट्रो स्टेशन पर थी। मेरे पर्स में इकलौता पाँच सौ का नोट पडा था। वहाँ टोकन देने के लिए व्यक्तियों के स्थान पर दस रोबोट लगे थे। मेरा नोट पुराना होने के कारण रोबोट उसे स्वीकार नहीं  कर रहा था। भरसक प्रयास करने पर भी रोबोट ने अपनी नाराजगी नहीं छोडी। मैं गन्तव्य पर समय से न पहुँचने की आशंका से तनावग्रस्त थी। तभी एक अजनबी ने मेरी चिंता को भांपा और सौ- सौ के पाँच नोट मेरे सामने कर दिए।

    आज की दो घटनाओं ने मुझे इंसान और मशीन में  अन्तर समझा दिया । मेरी आँखें बंद थी,लेकिन मेरे मस्तिष्क के चित्रपटल पर निरन्तर विचार भ्रमण कर रहे थे। मशीन मानव का मुकाबला कभी नहीं कर सकती मशीन में डाटा फीड है, जो निर्धारित मानकों पर ही काम करेगा । भगवान की मशीन में काम,क्रोध, लोभ,मोह जैसे अवगुणों के साथ- साथ करूणा,ममता,दया,सहानुभूति, जैसे दिव्य गुण भी दिए है। वह निर्धारित डाटे पर काम नहीं करता । कभी वह मोम की तरह पिघलता है,कभी चट्टान की तरह अडिग हो जाता है। कभी लोमडी की भाँति लालच का पुतला बन जाता है, कभी कर्ण की तरह दानी। वह परिस्तिथियों के अनुसार बदल जाता है।

तभी मेरे मुँह से निकला "विकास करो लेकिन इतना नहीं कि इंसानों को ढूँढते रहे और मशीनों से उलझते रहें।" तभी मेरा गन्तव्य स्टेशन आ गया । उदघोषिका द्वारा स्टेशन की घोषणा सुनकर मेरी तन्द्रा टूटी ।मैं  अचकचाकर उठी और दरवाजा खुलते ही स्टेशन से बाहर निकल अपनी मंजिल की ओर बढ चली।

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