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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 327 // जाना पहचाना सा अजनबी // वैष्णवी पारसे

प्रविष्टि क्रमांक - 327

वैष्णवी पारसे

जाना पहचाना सा अजनबी

आज मोहल्ले में कुछ शोर सुनाई दे रहा था, मैंने अपनी पड़ोस में रहने वाली विमला आंटी से पूछा ये शोर किस बात का है। उन्होंने मुझे कहा अरे तुम्हें नहीं पता हमारे इलाके के जो विधायक पद के प्रत्याशी है,आलोक श्रीवास्तव ये उनके समर्थक हैं। जो उनकी जीत का जश्न मना रहे हैं, इतना कह कर वो वहां से चली गई । आलोक श्रीवास्तव ये नाम सुनते ही मेरा मन अतीत की यादों में खो गया,कुछ समय पहले हमारे इलाके में ऐसा ही चुनावी माहौल था, मैं उस समय दसवीं कक्षा में पढ़ती थी, अल्हड़ उम्र थी मेरी अपनी ही दुनिया में मस्त पढ़ाई लिखाई खेलकूद यही थी मेरी जिंदगी।

एक दिन में पढ़ाई कर रही थी, तभी दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। मैंने उठकर दरवाजा खोला सामने एक मध्यम कद काठी का हंसमुख चेहरे वाला अजनबी खड़ा था। उसने मुझे अपना परिचय दिया मैं आलोक श्रीवास्तव अविनाश श्रीवास्तव का बेटा और अपने पिता को वोट देने की बात कह कर वो वहां से चला गया। पर न जाने उसके व्यक्तित्व में ऐसा क्या आकर्षण था, जो उसके जाने के बाद भी मैं वहीं खड़ी रही, गई मेरे कानों में अब तक उसकी आवाज गूंज रही थी, मैं अभी भी उसके बारे में ही सोच रही थी, अब मेरा मन पढ़ाई से निकल कर उसकी और खींचा जा रहा था। अविनाश जी का कार्यालय मेरे स्कूल के नजदीक था, मेरी नजरें आते जाते आलोक को टटोलती पहले पहल तो मैं नजरें चुराती फिर धीरे धीरे हमारी नजरें मिलने लगी। कभी कभार हम एक-दूसरे को देख के मुस्कुरा देते ।

एक दिन अचानक मुझे गाड़ी की ठोस लगते लगते बची ,आलोक ने मेरी मदद की मुझे गाड़ी के सामने आने से बचाया, उस दिन के बाद हमारी एक दूसरे से बात होने लगी हमारे बीच दोस्ती की एक प्यारी सी शुरुआत हो रही थी ,और मैं अपनी दुनिया से बाहर आकर सपनों की दुनिया में खोने लगी थी,  क्योंकि वो अजनबी मेरे मन पे दस्तक देने लगा था। पर सपने तो सपने होते हैं, हकीकत कुछ और होती है। एक दिन मेरे आर्मी अफसर पिता छुट्टियों पर घर आए उन्हें देखते ही मुझे उनकी दी हुई सारी हिदायतें याद आ गई। वे काफी सख्त थे, और इन सब बातों के खिलाफ, उनके हिसाब से मुझे इस वक्त अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर देना चाहिए‌। अगर उन्हें ये सब पता चल जाता तो मेरी खैर नहीं थी। और उनसे बगावत करने की मुझमें हिम्मत भी नहीं थी।

मैंने अपनी भावनाओं पर अंकुश लगा दिया, अपने सपनों के बहाव को वहीं थाम दिया। और सपनों से हकीकत की दुनिया में लौट आयी, और उस अजनबी के अपने बनने से पहले मैं उसके लिए अजनबी बन गई। क्योंकि मैं जान गई थी, जिस राह पर मैं चल रही हूं उसकी कोई मंजिल नहीं है। अचानक किसी ने मुझे आवाज दी मेरी तंद्रा टूट गई, और मैं भूत से वर्तमान में लौट आई, मेरे सामने सफेद पोशाक पहने हंसमुख चेहरे वाले वहीं आलोक खड़े थे। उन्होंने मुझे अपना परिचय दिया और मेरा अभिवादन करते हुए आगे बढ़ गये। हम दोनों की मुलाकात हुई दो अजनबियों की तरह जिनकी एक दूसरे से न कोई पहचान थी, न ही कोई वास्ता मेरे चेहरे पे हल्की सी मुस्कान छा गई और मैं हंसते हुए अपने रास्ते चल दी।

वैष्णवी पारसे

छिंदवाड़ा (म. प्र.)

1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है आपकी सलाह, सुझाव हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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