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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 370 से 374 // अर्विना गहलोत

प्रविष्टि क्रमांक - 370


अर्विना गहलोत

संकल्प

माँ ये स्टोर रुम क्यू साफ कर रही हो ?

हितेश घर में बहुत कबाड़ जमा हो गया फिर तेरे दाद भी तो आ रहे हैं , उन्हें तो कबाड़ एकदम पसंद नहीं है । दादा के सोने के लिए जगह बना रही हूँ।

"क्या माँ दादा यहाँ रहेंगे ? "

देख तो रहे हो ! रहेंगे यहीं दिन भर खांसते जो रहते हैं ।

तुम को पढ़ने में परेशानी ना हो इसीलिए यहाँ इंतजाम कर दिया है।

ओह ! फिर मैं कहानी कैसे सुनूंगा ,हर बार तो मेरे कमरे में रहते थे अब क्यों नहीं रह सकते ?

अभी तुम जाओ बाहर जा कर खेलो मुझे बहुत काम है ।

हितेश घर से बाहर निकल आया गेट पर ही रिक्शा से उतरते हुए दादा जी‌ दिख गए । दादा जी ने देखते ही गले से लगा लिया ।

रिक्शा वाले को पैसे देकर दोनों घर के अंदर आ गए।

दादा जी आपको पता है कल साल बदलने वाला है ?

हितेश नए साल में क्या संकल्प लेने वाले हो ?

दादा जी सीक्रेट है।

आज रात को 12बजे ही बताऊंगा ..... तब तक इंतजार करना होगा।

हितेश मम्मी पापा दादा जी के साथ नए साल के आगमन की प्रतीक्षा कर रहा था । जैसे ही बारह बजे हितेश ने सभी के चरण स्पर्श कर सभी को नव वर्ष की बधाई दी ।

दादाजी दिल थाम ले मैं अपना संकल्प लेने जा रहा हूँ।

माँ पापा दादा जी मेरे साथ मेरे कमरे में रहेंगे और मैं उनकी देखभाल का संकल्प लेता हूँ।

हितेश का संकल्प सुनकर माँ और पिता जी की नजरें झुकी ज़मीन ताकने लगी वहीं दादाजी गर्व से हितेश को सीने से लगा लिया पास रखी टेबल पर रखा हितेश का मोबाइल में हेप्पीन्यूईयर ....हेप्पी न्यू ईयर गाना बज उठा।

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प्रविष्टि क्रमांक - 371

अर्विना गहलोत


दिलेर फोजी

चल हाथ दे

"नहीं में नाला पार नहीं कर पाऊंगी ।"

ओह ! तुझे मुझ पर विश्वास नहीं है ।

विश्वस है ।

"रोहन ! तेरे साथ शादी की है ।"

"फौजी की पत्नी हो के इतना क्यों सोच रही हैं ।"

चन्नी ले लट्ठा रख दिया अब इस पर फेर रख हाथ दे अपना चन्नी ने हाथ बढ़ा दिया दोनों ने नाला पार कर लिया ।

खेतों में होते हुए दोनों घर आ गए ।

" चन्नी देख कुंडा खड़क रहा है ?

सिर पर दुपट्टा संभालती चन्नी ने दरवाजा खोला तो देखा बेबे खेत से लोट आई थी।

चन्नी ले सरसों का साग महीन महीन काट के बना लें ।

"आहो ! जी बेबे ।"

"रोहन की छुट्टी भी खत्म होने को है फिर तो मेस का खाना ही मिलेगा उसे उसमें ये स्वाद कहाँ मिलेगा ।

चन्नी ने साग के साथ मक्का की रोटी बनाई सब ने साथ में बैठे कर खाई ।

रोहन उठ कर चला गया हाथ धोने ।

चन्नी ! आहो जी क्या हुआ ? तोलिया खुटी पर टंगा है ।

तोलिया तो मिल गया तेरा खाना हो गया तो चल जरा बाहर घुम के आते हैैं।

एक डंडा भी ले लेना गली के कुत्ते भगाने के काम आयेगा ।

हाहाहाहाह ......... " रोहन फोजी होके कुत्ते से डर" अरे चन्नी तुझे पता नहीं डंडा बड़े काम आता है ।

" रोहन ! ले आई डंडा और फोन मे बाहर सिग्नल अच्छा मिलता है ।

रात गहरा गई थी सन्नाटा पसरा हुआ था कभी-कभी कुत्ते के भौंकने आवाज आ रही थी । थोड़ी दूर चले ही थे कि झाड़ी के पीछे सर सराहट की आवाज आ रही थी चन्नी चल देखते हैं वहां क्या है? रोहन रहने दें घर चलते हैं।

पास पहुंच कर आँखें फटी रह गई एक काले कपड़े वाले ने एक लड़की की गर्दन पकड़ी हुई थी और घसीट रहा था ।

चन्नी अपना दुपट्टा देना और ये सामने आले घर की दीवार के पीछे जा जल्दी पुलिस बुला ले मैं तब तक मैं इसे पीछे से पकड़ता हूँ। चन्नी दुपट्टा दे कर दीवार से सट गई ।

रोहन ने पीछे से पहुँच कर फंदा बना कर और आदमी के गले में डाल दिया और डंडे से वार हाथ पर वार करने पर पिस्तौल दूर जा गिरी ।रोहन दुपट्टे का फंदा बना कर आदमी को घसीटा लड़की गिरफ्त से छूट गई । चन्नी ने सौ नंबर पर फोन कर दिया पुलिस भी पहुंच गई और उस आदमी को गिरफ्तार कर लिया । लड़की अब तक संभल चुकी थी । वीर आपने मुझे बचा लिया आप तो दिलेर हो बिना हथियार के भिड़ गए ‌मेरी इज्जत की रक्षा की ।

बहन ये तो मेरा फ़र्ज़ था लड़की के कपड़े फटे देख उसे दुपट्टा ओढा़ दिया।

रोहन ने चन्नी को दुपट्टे ओढ़ा दिया ।

चल चन्नी इस बहन को इसके घर छोड़ कर आते हैं ।

घर लोटते हुए चन्नी रोहन का हाथ थाम कर बोली फौजी तुम पर गर्व है।

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प्रविष्टि क्रमांक - 372

अर्विना गहलोत

***तिरंगा****

शाम के समय चूल्हे के पास बैठी रज्जो हांडी चढ़ाकर बार बार बारिश से गीली लकड़ियों को जलाने के प्रयास में फेफड़ों की सारी ताकत झोंक फूंकनी से फूंकने पर भी गीली लकड़ी सुलग कर धुआं कर रही थी।

मेरी जिंदगी भी इन गीली सुलगती लकड़ी की तरह है । हांडी के साग में आई खदबदाहट उसके अंदर ही अंदर होने वाली खदबदाहट से कितना मिलती है।

आंखों में धुआं लगने कुछ अंदर की घुटन से आँसू बाहर आ गये उसने दुपट्टे से पोंछा तो शादी में पहना चूड़ा खनक गया । मात्र एक महीने पहले ब्याह कर आई थी इस घर में।

शादी के चार दिन बाद ही पति को वापस बार्डर पर जाना पड़ा । कितना व्यथित था जाते हुए गले लगाया तो उसकी आँखे डबडबाआई​ भूले से भी नहीं भूलती ।दिन तो किसी तरह बूढ़े सास ससुर की सेवा में कट जाता है । लेकिन रात आसमान में तैरते रुई से बादलों से बनती बिगड़ती आकृतियों को देखते देखते ही आंखों ही आँखो में कटजाती है। हर एक दिन कट जानें पर कैलेंडर क्रास कर देती हूँ । एक और दिन प्रतीक्षा का कम हो जाता है।

अचानक हांडी की तेज खदबदाहट से ध्यान भंग होने पर और साग के बननें की खुशबू ने स्मृतियों से निकल कर बाहर ला खड़ा कर दिया झट से हांडी उतार कर रोटी बेलने लगी ।बाहर गली में अचानक बच्चों का शोर सुनाई दिया एक बच्चा अचानक दौड़ता हुआ आया उसके हाथ में तिरंगा था ।

"भाभी ! ये लो तिरंगा ।

कल तो भईया भी आ रहे हैं ।

भईया को बहादुरी मेडल जो मिलने वाला है।

कल की सोच कर ही रोमांचित हो आया मन । बच्चों ने तिरंगा मेरे हाथ में पकड़ा कर बच्चे फिर से गली में जाकर खेलने लगे।

तिरंगा हाथ में आते ही तिरंगे​को सेल्यूट करते हुए गर्व की अनुभूति हुई ।देश हित में मेरी भी बराबर की सहभागिता हैं । इस बार आंखों में गर्व मिश्रित खुशी के आँसू थे।

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प्रविष्टि क्रमांक - 373

अर्विना गहलोत

दहलीज

पैरों में महावर छम छम करती पायल रुनझुन करते बिछुए लाल ओढ़नी में सिमटी सिकुड़ी ओढ़नी का एक सिरा पति के कंधे पर था । रीमा कार से उतर कर पति के पीछे चल कर घर की दहलीज पर आ खड़ी हुई । सास ने जल से भरे लोटे से दरवाजे के दोनों तरफ जल चढ़वाया अन्न को हथेलियों में भर कर दहलीज पर अर्पित कर दहलीज पार करने के लिए कहां जैसे ही रीमा ने बायाँ पैर बढ़ाया अरे ...अरे दायाँ पैर परात में घुले हुए कुमकुम में रखो बहू शुभ होता है ,  सामने बिछी चादर पर होकर अंदर आ जाओ ।

रीमा चादर पर पैर रखते हुए आगे बढ़ी तो कुमकुम से पैरों की पीछे छाप बन गई थी ।

रीमा ने दहलीज पार कर घर के आंगन में प्रवेश किया ।

घर मेहमानों से भरा हुआ था । नई बहू को दाहिने हाथ वाले कमरे में ले जाया गया वहीं बैठा दिया गया । उसे छोड़कर पति भी बाहर मेहमानों में चले गए ।

रीमा को अकेले बैठे -बैठे घर की याद सताने लगी समय काटने के लिए कमरे का मुआयना किया देखा एक खिड़की थी जो बाहर को खुलती थी रीमा खिड़की पर खड़ी हो गई। हवा उसके गालों पर लटक आई बालों की लट के साथ खेलने लगी ।

दरवाजे पर दस्तक हुई रीमा ने धीरे से दरवाजा खोला देखा सासू माँ खड़ी थी ।

रीमा बहू चलो देवी पूजा के लिए मैं उनके पीछे-पीछे चल दी ।

रस्मो रिवाज में ही कई दिन बीत गए आज सुबह सवेरे एक लेटर डाकिये ने जब‌ हाथ में ‌   धरा तो एक ही सांस में पढ़ गई सेना के अस्पताल में नर्स के लिए जो आवेदन किया था उसी में भर्ती हो गई थी ।

खुशी के मारे उछल पड़ी , लेकिन अगले पल खुशी गायब भी गई पता नहीं सासू माँ जाने देंगी या नहीं पहले पति से बात करती हूँ ।

सुनो ! सागर मेरा एपांटमेंट आ गया है ।

वाह ! बढ़िया

सागर माँ को कोई ऐतराज तो नहीं होगा?

रीमा ये तो माँ से पूछ कर ही पता चलेगा ।

सागर चलो ना माँ से पूछते हैं ।

माँ पूजा पर से उठी तो बहू बेटे को देख कर बोली क्या बात है दोनों एक साथ ?  कुछ काम आ पड़ा हमसे ।

माँ रीमा का सेना के अस्पताल में नर्स के लिए एपांइंटमेंट लेटर आया है ।

आपकी बहू आज्ञा लेने आई है।

ये तो बहुत खुशी की बात है जवानों की सेवा करने का सौभाग्य मिल रहा है ।

सागर मिठाई बटवाओ हम सब के लिए गर्व की बात है।

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प्रविष्टि क्रमांक - 374

अर्विना गहलोत


पुराना कैनवास

भारती अब तो शादी कर ले एक एक कर सभी बहनें विदा हो गई । भारती अपना बैग उठा कर अनमनीसी बोली स्नेहा चल देर हो रही है बस निकल जायेगी ।

भारती सुनो ! तुम मेरी बात को आज कल अनसुना कर देती हो ।

भारती सुना नहीं क्या ?

तुम ने मेरी बात का जवाब नहीं दिया।

स्नेहा तुम तो सब कुछ जानती हो फिर भी पूछ रही हो मेरे लिए अब इस उम्र में शादी करना असंभव है ।

भाई की शादी करनी है ।

साथ ही माँ की देखभाल का जिम्मा भी है।

निभाती रहो जिम्मेदारी तुम, मैं कब मना कर रही हूँ ,मैं तो बस याद दिला रही थी ।

तुम्हारी सब बहने तो जिम्मेदारी से बच कर निकल गई और अपनी अपनी गृहस्थी बसा ली तुम्हारे लिए किसी ने नहीं सोचा ।

स्नेहा शायद भगवान की यही मर्जी है ।

भारती तुम्हारी भी तो कुछ मर्जी है जिसे तुम शायद इग्नोर कर रही हो ।

अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है चाहो तो सब संभव हो जायेगा ।

मेरी बात मानो वरना पछताओगी जीवन संध्या में किसी के पास वक्त नहीं होगा जो तुम्हारा ख्याल रखे ।

पति पत्नी ही एक दूसरे के पूरक होते हैं ।

मेरी मान संजीव जी को हाँ कर दे भाई की शादी कर ले उसके बाद अपनी ।

संजीव जी भी परिस्थिति वश अभी तक कुआंरे हैं , तुम कहो तो मैं मिटिंग फिक्स करु ।

स्नेहा जीवन से सारे रंग उड़ गए तुम पुराने कैनवास पर नया रंग भरना चाहती हो । जी हां ! शुभस्य शीघ्रम ।

स्नेहा जैसी तुम्हारी मर्जी भारती तो तुम्हारी बात अब और टाल नहीं सकती ।

स्नेहा तुम ना .............. पीछे ही पड़ जाती हो स्नेहा ने कंधों को उचकाया आखिर सहेली किसकी हूं। भारती अभी तक तुमने जमीन को बंजर बना लिया था । अब इसमें कोंपले फूटेंगी ।

भारती के दिल में एक नई आशा के अंकुर ने जन्म ले लिया । बस का हार्न बजा तो दोनों मुस्कुराते हुए बस में सवार हो गई

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अर्विना गहलोत

एन टी पी सी मेजा

जिला प्रयागराज (इलाहाबाद)

शिक्षा एम एस सी वनस्पति विज्ञान


ashisharpit01@gmail.com

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