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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 368 व 369 // महेश शर्मा

प्रविष्टि क्रमांक - 368


‘‘ज़ायका’’

महेश शर्मा

आज भी ऑफिस में वह देर तक व्यस्त रही थी।

घर लौटते समय, रास्ते में उसने बच्चों को फोन लगाया -‘‘तो आज डिनर में क्या खाना है?’’

दूसरी ओर से बच्चों की फरमाइश शुरू हो गयी -‘‘मम्मा आज पनीर बटर मसाला - नहीं नहीं - मेरे लिए तो मैथी मलाई मटर और स्टफ्ड परांठा - नो मॉम - मुझे स्टिर फ्राई ब्रोक्ली खाना है - मम्मा मन्डे को जो मिक्स वेज खाई थी न, आज भी वही खाने का मन है - और कल वाला डिज़र्ट भी - ’’

उसकी अंगुलियां अपने फोन पर तेज़ी से चलने लगीं। गाड़ी चला रहे पति ने टोका, ‘‘आज मेरे फोन से फूड ऑर्डर करो। नया ऐप इंस्टाल किया है। पहले ऑर्डर पर फोर्टी पर्सेंट डिसकाउंट है।’’

-‘‘हुंह! नो वे! मेरा वाला ऐप मुझे रोज़ डिस्काउंट दे रहा है। छः ऑर्डर पर दो कॉम्बो मील्स फ्री!’’

-‘‘सुना है, तुम्हारे वाले ऐप के डिलीवरी बॉय, पैकेट में से थोड़ा खाना चुरा कर खा जाते हैं’’, पति मुस्कुराया, ‘‘पता नहीं, हम और हमारे बच्चे रोज़ाना, किस किस की, जूठन खा रहे हैं।’’

वह झल्ला उठी -‘‘व्हाट रबिश यार! यह सब बकवास है। ऐसा कभी नहीं होता।’’

पति हंस पड़ा। वह फिर से डिनर ऑर्डर करने में मशगूल हो गयी।

वे घर पहुंचे तो, डिलीवरी बॉय उनकी बिल्डिंग के बाहर खड़ा मिला। किशोर अवस्था का वह लडका, शायद नया था और उस आलीशान बिल्डिंग में घुसने से झिझक रहा था।

उसने गाड़ी से उतर कर लड़के से खाने के पैकेट लिए और अभी उसे पैसे दे ही रही थी कि एकाएक रूक गयी -

-‘‘यह पैकेट, यहां से थोड़ा खुला हुआ क्यों है?’’ - लड़के को घूरते हुए उसने पूछा।

लड़का हड़बड़ा गया -‘‘हमें तो ऐसे ही पैकबंद दिया गया था मैडम।’’

-‘‘तुमने इसमें से कुछ खाया है न?’’ वह कठोर स्वर में गुर्रायी।

- ‘‘नो मैडम! भगवान की कसम!’’ लड़का घबरा गया, ‘‘हम तो छुए तक नहीं -’’

उसने खाने के पैकेट्स वहीं फैंक दिए और गुस्से में पैर पटकती हुई बिल्डिंग में चली गयी।

पति मुसकुराते हुए, अपने फोन से ख़ाना आर्डर करने लगा।

लड़का कुछ देर तक तो सहमा सा खड़ा रहा, फिर हिम्मत जुटा कर बोला -‘‘साब, हम यह सब खाना नहीं खाते हैं - भगवान की कसम सा’ब! हम तो बस अपनी अम्मा के हाथ का बना ही ---’’

वह एकाएक चुप हो गया।

फोन पर तेज़ी से चल रही, पति की अंगुलियां ठिठक गयीं।

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प्रविष्टि क्रमांक - 369

‘‘नई शराफत’’
महेश शर्मा

पिछले चार दिनों से यह तमाशा चल रहा है।
मेरे बगल वाले फ्लैट में रहते हैं ये दोनों। शायद लिव-इन पार्टनर होंगे। पति-पत्नी तो होने से रहे। दोनों ही जॉब में हैं। किसी मल्टीनेशनल कंपनी में होंगे शायद -
- पर, यह क्या सीन क्रिएट कर रखा है इन्होंने आजकल? रोज़ इसी वक्त, तेज़ आवाज़ में पता नहीं एक-दूसरे को क्या-क्या बकते हैं? हद है!
- इन्हें इतना भी नहीं पता कि यह पॉश सोसायटी है। शरीफ लोग रहते हैं यहां। पता नहीं इन्हें यहां फ्लैट कैसे मिल गया? पैसा होने से क्या होता है? मैनर्स भी तो कोई चीज़ है।
- मॉर्डन सोसायटी में इन सबकी कोई जगह नहीं है। कम से कम इस तरह से तो बिल्कुल नहीं। यह कोई तरीका हुआ भला? कौन करता है ऐसा? झगड़ा हम भी करते हैं कभी-कभी, लेकिन किसी को पता तक नहीं चलने देते। घर की बात घर में ही रहती है। हमारी वजह से किसी की शांति भंग नहीं होनी चाहिए। यह तो सरासर गंवारपन है। हुंह! ज़रूर किसी स्मॉल टाउन से हैं दोनों।
लो - हो गए शुरू! अब पूरे एक घंटे तक चलेगा इनका यह एपिसोड। अपने पड़ोसियों की प्रायवेसी की ज़रा भी रेस्पेक्ट नहीं करते - जंगली कहीं के! ताज्जुब है कि कोई ऑबजेक्शन नहीं करता? क्या किसी को कोई प्रॉब्लम नहीं है इनसे?
- अरे! लगता है आज तो हाथापाई हो रही है। थप्पड़ मारने जैसी आवाज़ आयी तो थी। या शायद कुछ फैंक कर मारा हो? कुछ फूटा है शायद। विंडो ग्लास होगा! या कोई मिरर - या टीवी वगैरह तो नहीं फोड़ दिया?
- वैसे यदि बाल्कनी के इस कोने में खड़े हो जाओ, तो उनका बैडरूम साफ दिखता है - लेकिन ऐसी ताक-झांक तो सिर्फ कोई बैकवर्ड ही करता होगा।
- फिर कुछ टूटने की आवाज़ आयी। उफफ! यह लोग यहां रहने के लायक नहीं हैं। मुझे ही कल सैक्रेटरी से बात करनी होगी -
- व्हाट! क्या यह गालियां बक रहे हैं? ओह माय गॉड! हां, शायद गाली ही थी? किसने बकी थी? उस लड़की ने? आवाज़ तो ऐसी ही लगी थी।
- अरे! फिर वैसी ही आवाज़! हां, लड़की की ही आवाज़ है - लगातार कुछ बक रही है - हां - गाली जैसा ही कुछ --
- ओह शिट!! यह सैकंड फ्लोर वालों का टॉमी भी न! इसी वक्त भौंकना था इस डॉगी को? पता नहीं यह कौन सी ब्रीड का है? कैसे सड़क छाप कुत्ते की तरह भौंके ही जा रहा है - कुछ सुनने ही नहीं दे रहा - ब्लडी बास्टर्ड!!
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महेश शर्मा

77, गुलाब बाग, जवाहर नगर

सवाई माधोपुर - 322 001

राजस्थान

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