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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 376 // चश्मा मिल गया // सुधा शर्मा

प्रविष्टि क्रमांक - 376

सुधा शर्मा

चश्मा मिल गया 

रेलगाड़ी ने रेंगते- रेंगते धीरे- धीरे स्टेशन छोड़ दिया था। और अपने स्वभावानुसार छुक- छुक करते हुए स्पीड पकड़ ली थी। लेकिन सुषमा अब भी दूर होते हुए मुम्बई के स्टेशन को देख रही थी। भावुकता में उन्होंने चश्मा हटाया और आँखों में छलक आए मोतियों को रूमाल में समेट लिया। पास ही बैठे पति ने बड़े प्यार से व्यंग्यात्मक शब्दों में कहा-" मन भारी क्यों करती हो, एक- दो महीने बाद फिर आ जाना बहू से सेवा कराने।

पति के शब्द थोड़े तीखे थे लेकिन सत्य थे। बहू तो उन्हें पसन्द ही नहीं करती थी, यदि दस- पन्द्रह दिन के लिए किसी मजबूरीवश बहू उनके पास आ जाती या

वो उनके पास जाती तो सुषमा को अपने हाथों से ही काम करना पड़ता । उसके बाद भी बहू का व्यवहार ठीक नहीं था। कहते है कि प्यार से सबको जीता जा सकता है इसी कहावत को चरितार्थ करने में सुषमा और मि. शर्मा लगे थे। बेटे ने भी सारे उपाय करके देख लिए थे। सुषमा अपना कर्तव्य निभाने में कमी न छोड़ती । दोनों पोतों की बार व अन्य बीमारियों के अवसर पर सुषमा ने माँ की तरह बहू की देखभाल की । विदेश में तो बहू स्वयं काम करती थी लेकिन यहाँ हर काम के लिए मेड लगी हुई थी। सुबह- शाम का खाना बनाने के लिए अलग- अलग मेड आती थी। झाडू-पोंछे के लिए अलग। यदि किसी दिन कोई मेड छुट्टी पर होती तो वह अपनी किसी सहेली की मेड को बुलाकर पैसे देकर काम करा लेती। केवल उसे भोजन परोसने का काम रहता। जिस दिन सुषमा या पति-पत्नी जाते, बस उसी दिन उन्हें भोजन परोसकर देती अगले दिन से उन्हें स्वयं ही नाश्ता करना पड़ता, अन्यथा बारह बजे तक भी कोई नाश्ते के लिए नहीं पूछता था। बहू साढ़े सात बजे पोते को टिफिन देकर भेज देती। और सो जाती। बेटा अपना टिफिन स्वयं पैक करके ले जाता। भोजन तो मेड बनाकर रख जाती लेकिन नाश्ता स्वयं बनाना पड़ता था। नाश्ता बनाने में सुषमा को कोई परेशानी नहीं थी क्योंकि अपने घर तो वह स्वयं ही काम करती थी। लेकिन हर व्यक्ति थोड़ा सा मान- सम्मान तो चाहता ही है और दूसरे की रसोई में व्यक्ति थोड़ा सा आशंकित रहता है। क्या बनाए ? चलो काम की कोई बात नहीं लेकिन उसके व्यवहार में भी उपेक्षा झलकती। लेकिन माँ का लाचार दिल उन्हें बार- बार यहाँ आने के लिए बाध्य कर देता। करें भी तो क्या करें, एक ही बेटा था, बेटी अपने घर की थी। मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक। अब पोता दस वर्ष का हो चुका था,वैसे भी पोते का प्यार ही दो पीढियों के बीच कड़ी का काम कर रहा था। कहते है न; मूल से प्यारा ब्याज होता है।

सुषमा इन्हीं विचारों में उलझी थी,  कि पति अपनी बात का कोई उत्तर ना पाकर फिर बोल उठे -"अरे! इतना भावुक क्यों होती हो,जो अब तक आँख में आँसू लिए बैठी हो, बहू की कोई बात अधिक चुभ गई हे तो भूल जाओ। उसे कोई नहीं बदल सकता।

नहीं मैं बहू के कारण नहीं रो रहीं हूँ। पता है रात देवांश चुपचाप मेरे पास आकर सो गया, कहने लगा-" दादी! आप हमारे साथ क्यों नहीं रह सकती? आप मुझे पढाया करना, दादू मेरे साथ खेला करेंगे। जब आप चली जाती हो मेरा मन नहीं लगता । जब मम्मी डाँटती है तो आप गोद में बैठाकर प्यार कर लेती हो। पीछे तो मुझे कोई प्यार नीं करता। मम्मी डाँटती हैं, तो मैं रोता ही रहता हूँ। अब की बार मैं आपके नहीं जाने दूँगा। मैं आपका चश्मा छुपाकर रख दूँगा और ऐसी जगह छुपाकर रखूँगा कि आपको मिलेगा ही नहीं।"

और पता है जब सुबह उठी तो चश्मा गायब था ।सारे में ढूँढा नहीं मिला। वो तो अचानक मैंने उसका स्कैटिंग बैग देख लिया। गाडी शाम चार बजे की थी तो काम चल गया, नहीं तो गाडी ही छूट जाती। कहकर सुषमा फिर भावुक हो गई।

पति बडे प्यार से बोल उठे -"अब क्यों रोती हो, अब तो असली चश्मा मिल गया। पोते के प्यार की बैसाखी मिल गई है जीवन संध्या काटने के लिए, और क्या चाहिए।

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