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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 379 // ठंड // सविता मिश्रा 'अक्षजा'

प्रविष्टि क्रमांक - 379


सविता मिश्रा 'अक्षजा'

ठंड

“उहूहु बहुत ठंड है ।” स्वेटर, टोपी,मोजा पहनकर पूरी तरह से अपने शरीर को पैक किए, बिस्तर में पड़ी ठिठुर रही थी नैना।

पति ने चाय पकड़ाई तो कम्बल को साल की तरह ओढ़कर चाय की गिलास पकड़ ली।

“ठंड बहुत ज्यादा है न.! मुझे आज बाल धुलना था, ओहो हो नहीं धुलूँगी बाबा! जिस दिन तेज धूप होगी उस दिन धुलूँगी।” दोनों हाथों से चाय के गिलास की गर्माहट लेते हुए बोली |

“लेकिन मुझे तो ड्यूटी पर जाना ही है । तुम्हारी तरह कम्बल में थोड़ी बैठा रह सकता हूँ।”

“कितने बजे जाना..?”

“आज लेट जाऊँगा , तकरीबन ढाई/तीन बजे।”

सुनकर नैना “हु हु! बाबा रे ठंड!” ठंड ने उसके शरीर को सिकोड़ा तो उसकी संवेदना फैलकर उसके दिमाग के बंद दरवाजे को ठकठका आयी । बिस्तर में बैठी मनन करती हुई वह मर्माहत हो उठी ।

कामवालियां बेचारी इतनी ठंड में अपने घरों का काम निपटाकर दूसरों के घरों में भी कैसे काम कर लेती हैं। अनिता बताती है कि सब सात बजे घर से निकल जाती हैं काम पर। बहुत ठंड हुई तो एक स्वेटर पहनती हैं, वरना वह भी नहीं। बस शॉल लपेटी और एक स्लीपर पहनकर चल दी मेहनत करने। काम करते वक्त तो शॉल भी उतारकर रख देती हैं । बेचारी! उनकी झींनि-सी साड़ी तो ठंड की परछाई को भी नहीं रोक सकती ! ठंड को क्या खाक रोकेगीं । कैसे वो वहीं पहने पूरा दिन काम में बिता देती हैं।

हमसे तो एक काम न हो रहा ठंड में और ये अपना ही नहीं तीन चार घरों का काम निपटा आती हैं इस ठिठुरती ठंड में भी। यहां तो बिस्तर छूटता ही नहीं है ठंड के कारण।

“सुनो कितने बजे गए ..!” सोच से जागी तो पति को सामने खड़ा पाकर पूछ बैठी।

“दस..!”

“अरे दस बजे गए! नौ बजे तक तो अनिता को आ ही जाना चाहिए था। मरी ! लगता है आज भी नहीं आएगी। जब देखो, तब बहाना मारकर बैठ जाती है। अब सारा काम मुझी को करना पड़ेगा।” बड़बड़ाते हुए कम्बल हटाया तो सिहर उठी ।

'उहूहु सर्दी ! काम निपटाने है नैना ! हूहू करना छोड़, और उठ बिस्तर से ..' अपने आप से ही बोलती हुई वह उठी।

कम्बल-रजाई झाड़कर तह किए। बच्चों के कमरों के भी बिस्तर को ठीक करते-करते अपनी टोपी उतार दी। बालों को पीछे करके कसकर जुड़ा बांधा फिर क्लच लगा दिया जुड़े को सही से गाँठकर। सारे पलँग के चादर झटककर फिर उसे बिछाया। तकिया झाड़कर व्यवस्थित रखा। फिर कमरों में बिखरा सामान जल्दी -जल्दी समेटने लगी। कुर्सी पर बैठकर अपने मोजे भी उतार दिए।

अब हाथ में झाड़ू उठाई और कमरे के कोनों और पलँग के नीचे झुक-बैठकर इत्मीनान से झाड़ू मारने लगी। दो कमरों में झाड़ू मारते मारते उसने फुल आस्तीन के स्वेटर के ऊपर पहना जैकेट उतार दिया।

तीनों कमरों और डायनिंग हॉल में झाड़ू मारने के बाद झाड़ू रखा। राहत की सांस लेते हुए स्वयं से ही बोली - “चलो झाड़ू तो हो गयी। थोड़ी गर्मी-सी हो गयी जैस शरीर में।" कहकर नैना ने फुल आस्तीन का स्वेटर भी उतार दिया। फिर रसोई में घुसी। सारे बर्तन धुले और उनको पोंछकर यथास्थान पर रखकर एक लंबी सांस छोड़ी।

“झाड़ू बर्तन करते-करते साढ़े ग्यारह बजे गए। अभी खाना भी बनाना है।” खुद से ही कहती हुई खुद से ही सवाल किया, “क्या बनाऊँ ?” फिर खुद को ही जवाब देती हुई जल्दी से दाल-चावल धोकर गैस पर चढ़ा दिया।

फटाफट फ़्रिज से सब्जी निकालकर छिलने-काटने लगी । सब्जी छौंककर वह बिखरी रसोई समेटने लगी। सारा सामान अपने-अपने स्थान पर रखकर प्लेटफॉर्म साफ कर लिया। दाल को पलटकर फुर्ती से उसमें छोंक लगाई । कढ़ाई का ढक्कन खोलकर सब्जी चलाते हुए बुदबुदाई, “पकी की नहीं,अभी थोड़ी-सी कसर है।" कहते हुए कढ़ाई का ढक्कन लगा दिया।

“तब तक आटा गूँथ लूँ !" माथे पर लटक आए लटों को पीछे धकेला । जल्दी से आटा निकाला और उसमें पानी डालकर बिजली-की -सी फुर्ती से आटा गूँथने लगी। आटा गूँथते समय शरीर को गर्माहट महसूस हो रही थी लेकिन हाथ तो आटे में सने थे। गूँथने के बाद सब्जी को देखा तो पक चुकी थी। गैस बंद कर दिया। गैस से उतारकर खुद से ही बोली - “रोटी नहाने के बाद सेंकूँगी।”

बाथरूम में जाते हुए ठिठकी - “ओह ! अभी तो पोंछा रह ही गया।” पोंछा लेकर रसोई से ही लगाने की शुरुआत की। एक कमरा लगाने के बाद उसका हॉफ स्वेटर भी उतर चुका था। दूसरा कमरा करते हुए अब सिर्फ सलवार-कुरते में भी उसे ठंडक बिल्कुल भी नहीं महसूस हो रही थी। उसने कमरों का पंखा ऑन करके पोंछा खत्म किया। आधे घण्टे के बाद सारे कमरों में पावदान डाल दिया। पंखा बन्द करके नैना नहाने के लिए जाने लगी।

“क्या हुआ! बाल धुलना है क्या?”

“हाँ, बाल धूल ही लेती हूँ। ठंड नहीं लग रही। कल का क्या भरोसा! ठंड बढ़ जाए तो!!”

नहाकर बाथरूम से निकली। बालों को झटका, कंघी फिरायी। कपड़े पहने | एक स्वेटर डाला और रसोई में रोटी बनाने के लिए तैनात हो गयी।

“ठंड लग जायेगी। नहाकर निकली हो। फुल आस्तीन का भी स्वेटर पहन लेती।”

“अरे, कहाँ है ठंड! खाना बना-खिला लूँ फिर शाम होने तक पहन लूँगी।”

दोनों ने खाना खाया। बच्चों के लिए भी रोटी बनाकर रख दिया। रसोई समेटी और आकर बिस्तर पर जम गई।

थोड़ी ही देर हुई थी कि उहूहु ठंड है भईईई..! सुनिए गोमा वाला लॉन्ग जैकेट पहनकर निकलिए। इस जैकेट में तो बाहर ठंड लगेगी कहते हुए नैना ने अपना फुल आस्तीन का स्वेटर, उसके ऊपर हॉफ जैकेट, मोजा-टोपी सब कुछ पहन लिया। फिर हूहू करते हुए कम्बल खोला और चारों तरफ से लपेटकर बैठ गयी।

“मैं जा रहा हूँ, रात देर से लौटूँगा। खाना मत बनाना मेरा।”

“सुनो जी! जाते जाते वो ब्लोअर इधर पलँग के पास करके, स्विच ऑन करते जाइए | ठंड बहुत है। हूहू हूहू।”

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संक्षिप्त परिचय
सम्पूर्ण नाम - सविता मिश्रा 'अक्षजा'
जन्मतिथि एवं जन्मस्थान... १/६/७३ / इलाहाबाद
शिक्षा -ग्रेजुएट
व्यवसाय..गृहणी (स्वतन्त्र लेखन )
लेखन की विधाएँ - लेखन विधा ...लेख, लघुकथा, व्यंग्य, संस्मरण, कहानी तथा
मुक्तक, हायकु -चोका और छंद मुक्त रचनाएँ।
प्रकाशित पुस्तकें - .पच्चीस के लगभग सांझा-संग्रहों में हायकु, लघुकथा और कविता तथा कहानी प्रकाशित।
प्रकाशन विवरण .. 170 के लगभग रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं तथा बेब पत्रिकाओं में छपी हुई हैं रचनाएँ।दैनिक जागरण- भाष्कर इत्यादि कई अखबारों में भी रचनाएँ प्रकाशित।
पुरस्कार/सम्मान -  "महक साहित्यिक सभा" पानीपत में २०१४ को चीफगेस्ट के रूप में भागीदारी।
"कलमकार मंच" की ओर से "कलमकार सांत्वना-पुरस्कार" जयपुर (३/२०१८)
"हिन्दुस्तानी भाषा साहित्य समीक्षा सम्मान" हिंदुस्तान भाषा अकादमी (१/२०१८)
‘शब्द निष्ठा लघुकथा सम्मान’ २०१७ अजमेर,  ‘शब्द निष्ठा व्यंग्य सम्मान’ २०१८ अजमेर में।
जय-विजय वेबसाइट द्वारा लघुकथा विधा में 'जय विजय रचनाकार सम्मान'  लखनऊ (२०१६)
बोल हरयाणा पर प्रस्तुत ‘परिवेश’ नामक कथा,
"आगमन समूह" की आगरा जनपद की उपाध्यक्ष,
गहमर गाजीपुर में 'पंडित कपिल देव द्विवेदी स्मृति' २०१८ में सम्मान से सम्मानित।

सविता मिश्रा 'अक्षजा'
आगरा

2012.savita.mishra@gmail.com

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