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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 380 // हेमू काका.... // दर्शना बांठिया

प्रविष्टि क्रमांक -

दर्शना बांठिया

हेमू काका....

"मां आज तो पूरी बहुत स्वादिष्ट है, एक और लूंगा...लो हेमू काका आ गए ,बाजार का काम तो अब हो ही जाएगा ,आपको कहीं जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी" खाना खाते हुए मैंने कहा।

"आइए हेमू काका ...आज बहुत दिन बाद आए ,आज भी वहीं धोती-कुर्ता और मोटा चशमा लगाए घूमते हो...थोड़ा जमाने के अनुसार बदलो...आज भी आप साइकिल से आते -जाते हो, अब उम्र थोड़ी है साइकिल चलाने की" मैंने अनायास ही हंसते हुए कहा।

" सुमि, ऐसे नहीं बोलते बड़ों को , हेमू काका तुम्हारे पापा से भी बड़े है उम्र में,ये तो सालों से काम कर रहे है तुम्हारे दादाजी के लिए,बहुत सम्मान करते है तुम्हारे दादा का,इनके खुद के बच्चे सरकारी विभाग में काम करते है ,कोई कमी नहीं है अब इनको , फिर भी हमारे यहां इसलिए आते है कि हमें अपना परिवार मानते है , आज भी दादा जी की हाजिरी में कोई कमी नहीं रखते" मां ने पूरी बनाते हुए कहा।

"हेमू काका दिखने में साधारण डील-डौल के दिखते, सरल स्वभाव के धनी थे। रोज की तरह आज भी अपनी गद्दी दादाजी की कुर्सी के पास लगाकर बही-खाते साफ करने लगे। मैंने काका से पूछा "जब आपके बच्चों की इतनी अच्छी नौकरी है , फिर यहाँ क्यों काम करते हो, कोई कमी नहीं है आपको फिर भी जबरन अपने शरीर को तकलीफ देते हो , आराम करो घर पर अब, वैसे भी अब बही-खाते पर हिसाब कौन करता है" मैंने अचार के डिब्बे को कसकर घूमाते हुए कहा.

"लाओ, मुझे दो मैं खोलता हूं, ये डिब्बा भी मानव शरीर जैसा है,ज्यादा दिन काम में न लो ,तो जाम हो जाता है," काका ने डिब्बे का ढ़क्कन खोलते हुए कहा।

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