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अविनाश ब्यौहार के नवगीत और दोहे

नवगीत

उखड़े उखड़े से

मिलते हैं

कालोनी के लोग!

हैं औपचारिक

सी बातें!

हमदर्दी पर

निष्ठुर घातें!!

उनका मिलना

अक्सर लगता

महज एक संयोग!

है पर्वों में

उदासीनता!

महल के मुखड़े

पर दीनता!!

कालोनी में

हर घर मिलता

मिथ्या और दुरोग!

---.

नवगीत

आइने में

बसा हुआ

रूप!

हुई कंचन

देह है!

दिखे शबनम

नेह है!!

संवर रही

निर्जन में

धूप!

मुख ज्यों

चाँद समाया!

यौवन है

सरमाया!!

होना

साज सिंगार

अनूप!

----.

नवगीत

तारीखें तो

हर रोज

निकलती है!

तीजा, हरछट औ

दीवाली, होली!

खग की मौसम में

रस घोले बोली!!

आयु हयन की

पल प्रतिपल

ढलती है!

है बारिश, जाड़ा,

बसंत औ गर्मी!

आहत जनहित हो

ये है बेशर्मी!!

कुदरत स्वभाव

से नित्य

बदलती है!

----.

नवगीत-1

बरखा के

अषाढ़ औ सावन

भावगीत रचे!

फुनगी है हरी

बाँह सी

फैली लता!

माफ करे हरियाली

पतझर की

हर खता!!

किसी नवोढ़ा

के हाथों में

मेंहदी प्रीत रचे!

कोयल की

स्वर लहरी गूंज

रही घाटी में!

चेहरे पर लोनाई

लोच डौल

काठी में!!

पाँखुरी सी पलकों

में सपनों की

भीत रचे!

×××××

नवगीत-2

कमरे में था

घुप्प अंधेरा

खुला एक जंगला!

महुये की गंध

मदमाया है बसंत!

फागुन में हुआ है

जाड़े का अंत!!

स्वाद निराला

पानों का

मगही हो या बंगला!

नींद से

जागी सुबह ने

आँखें खोलीं!

बागों में

सजने लगी

गंधों की डोली!!

प्रकृति रूपसी

हुई जैसे

शिवजी की मंगला!

×××××

नवगीत-3

जीवन लगता है

बुलबुला पानी का!

भाईचारे के

गमले में

नागफनी है!

छाँव की

पेड़ों से होती

तनातनी है!

बाग खंखड़

हो गया

शादमानी का!

कूल प्यासे

घाट प्यासे

नदी प्यासी है!

निश्छल किलकारियाँ

दिखती रुआँसी है!

जिक्र बेमानी है

नदिया की

रवानी का!

×××××

नवगीत-4

पग धरता फाग है

ऋतु में हेरफेर!

बासंती बयार है

सरसों पियराई!

मधुदूत की

संज्ञा से

महकी अमराई!

मेड़ों में पक गये

खटमिट्ठे बेर!

टेसू के जंगल में

मन हुआ मस्त!

बागों में हो रही

अलियों की गश्त!

मधुऋतु की आहट

पा फूलते कनेर!

बौर हुई आयेंगे

आम के टिकोरे!

टपकेगा महुआ

बीनेंगे छोरे!

नेमतें सभी के लिये

चाहे हो ज़ेर!

-----.

नवगीत

लोगों की

प्यास बुझाती

प्यासी रही गिलास!

सूनी आँखों में

उड़ता हुआ सुआ!

मानो कि दर्द को

चैन है छुआ!!

मर्यादा को

सर्प दंश

उन्मुक्त है विलास!

मुंदरी में नगीना

दूब की ओस!

सर्द हवा है भूली

लू भरा रोष!!

है छल फरेबों

के नगर में

गुमशुदा हुलास!

----.

दोहे

काँटे जैसा चुभ रहा, पवन है रंगदार।

पौष माह में धूप पर, जाड़ा हुआ सवार।।

दूबों पर बैठी हुई, मोती जैसी ओस।

मखमल सा कालीन है, फैल गई है कोस।।

कुहरा है छाया घना, मौसम हुआ दलाल।

लुका छिपी है धूप की, जाड़ा बना सवाल।।

जाड़े का अंतिम चरण, मधुऋतु की शुरुआत।

फागुन अगवानी करे, छेड़े मीठी बात।।

पैसों का कानून है, न्याय नहीं औ धर्म।

ठेका लें अपराध का, अधिवक्ता बेशर्म।।

नेताजी कुर्सी नशीं, प्रजा हो गई भेड़।

प्रजातंत्र के खेल में, खेत खा गई मेड़।।

----.

दोहे

रिश्तों की गर्माहटें, नित नित बढ़े लगाव।

अमराई को कोकिला, देती रही सुझाव।।

प्रजातंत्र में प्रजाजन, इतने हुए स्वतंत्र।

गायब है सद्भावना, मनुज हो गया यंत्र।।

शहर हुए अत्याधुनिक, गाँव बोलते आज।

परदा, मर्यादा, शरम, इनको लगते खाज।।

पुलिस चोर से मिल गई, न्याय करेगा कौन।

अपराधों को देखकर, न्यायालय है मौन।।

ईश्वर को भजता रहा, दुख का हुआ न अंत।

जो डूबे थे पाप में, वे ही बने महंत।।

बेबस तो अखबार हैं , चोरी, हत्या आम।

एक समय थीं सुर्खियाँ , आज हुईं गुमनाम।।

---.

नवगीत

सर्द सर्द सुबहें हैं

सर्द सर्द रात है।

गगन से झर रहा

धुन्ध में तुषार है।

धूप बनी छाया

सूरज लाचार है।।

कड़कदार ठंड लगे

देहों पर घात है।

मफलर ने स्वेटर

की काटी चिकोटी।

साँझ की बल खाई

लंबी सी चोटी।।

खजूर लगे कलम से

पोखर दावात है।

----.

नवगीत

प्रवाहिनी पर है

चढ़ आया पूर!

बारिश की

अंगड़ाई!

बादलों को

है भायी!!

छाया ताल के

चेहरे पर नूर!

दामिनी है

अब तड़की!

और नदिया

है भड़की!!

आँखों में अर्णोद

की है सुरूर!

वसुधा ने

कजरी गाई!

हरियाली को

बधाई!!

फुनगी से बोली

चश्मे बद्दूर!

-------.

नवगीत

सबको बहुत

लुभाता है

जाड़े का मौसम।

महल, झोपड़ी,

गाँव शहर हो।

या फिर दिन के

आठ पहर हो।।

कभी कभी

तो लगता है

भाड़े का मौसम।

कंबल, स्वेटर

और रजाई।

ठिठुरन की तो

शामत आई।।

लुटी धूप ने

कहा दिन-

दहाड़े का मौसम।

-----.

अविनाश ब्यौहार

रायल एस्टेट कटंगी रोड

जबलपुर

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