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लघुकथा - सेवा - भूपसिंह भारती

"सेवा"

सरला, कमला और बिमला इकट्ठी होकर सुशीला के घर जाकर ऊंची आवाज में बोली, 'अरी बहन सुशीला, सुनती हो, कल शहर में स्वामीजी के प्रवचन है, इसलिये आज से सेवा शिविर लगा हुआ है, चलो शिविर में सेवा करके पूण्य कमाएंगे।' सुशीला बालों में कंघी करती हुई बाहर आकर बोली, 'थोड़ी देर रुको बहनों, मैं अभी आई।' सुशीला अंदर जाकर जब अपनी अलमारी से अपना पर्स निकालने लगी तो उसकी सास ने खांसते हुए कहा, 'बहू, एक कप चाय बनादो, सिर फटा जा रहा है।' 'मैं जब भी कोई पूण्य का काम करने को जाती हूं तो तुम अवश्य टोंक देती हो। मेरे पास समय नहीं है। मेरी सहेलियां मेरी वेट में खड़ी हैं। मैं सेवा-शिविर में जा रही हूं। आले में सिर दर्द की गोलियां रखी हैं, लेकर सो जा।' ये कहती हुई सुशीला वहां से हवा के झोंके की भांति निकल गयी। अब वहां केवल कलावती देवी की खांसी की खों खों ही गूंज रही थी।

भूपसिंह भारती, शिक्षक,

रा व मा विद्यालय, पटीकरा,

जिला - महेन्द्र गढ़ - 123001

लघुकथा 8084956677247659506

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