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संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक का अंतिम अंक २५ “डोलर-हिंडा” - लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित

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संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक का अंतिम अंक २५ “डोलर-हिंडा”

लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित

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कैलाश बाबू सैन के दफ़्तर न आने के कारण, बेचारा रमेश परेशान हो गया। उस बेचारे को पीने का पानी भी भरना पड़ा, यहां तक तो सही है....मगर इसके साथ, उसे लेखा शाखा और सामान्य शाखा से कचरा भी निकालना पड़ा। बेचारा थक गया, काम करते-करते। काम निपटाकर, वह दफ़्तर के बाहर बड़ी सीढ़ी पर आकर बैठ गया। पानी भरने के लिए, उसने कोई कम कसरत नहीं की...बेचारा हवाई बिल्डिंग की सीढ़ियां उतरकर नीचे आया..फिर पानी चढ़ाने के लिए मशीन चालू की। फिर सीढ़ियां चढ़कर ऊपर आया और दफ़्तर का कचरा निकाला, फिर नीचे सीढ़ियां उतरकर डाक देने गया और वापस आकर एक बार और सीढ़ियां चढ़ी। इस तरह हवाई बिल्डिंग की सीढ़ियां कई बार चढ़ने-उतरने से वह थक गया, इसका दोष वह पूर्व कार्यालय सहायक सोहनलाल दवे को देने लगा। ज़िला-परिषद से शिफ्ट करके इस दफ़्तर को, इस हवाई बिल्डिंग में लाने वाले जनाबे आली सोहन लाल थे। अत: अब वह मन में, इनके नाम गाली की पर्ची निकाल बैठा “सोहन लाल ऐसा कमीना निकला, जिसने हम-सबको बना डाला डोलर-हिंडा...कभी नीचे जाओ सीढ़ियां उतरकर, तो कभी उपर जाओ सीढ़ियां चढ़कर। बस डोलर-हिंडा के माफ़िक डोलते जाओ।” बेचारा बैठा-बैठा, बड़बड़ाता जा रहा था। सोहन लाल के बारे में सोचते-सोचते, उसके मानस में अतीत की सारी घटनाएं ताज़ी होने लगी। इस तरह सोचते-सोचते, वह निंद्रा देवी की गोद में चला गया।

इस तरह, सारी बीती घटनाएं उसके मानस में चित्र-पट की तरह छाने लगी। उसे याद आये, पूर्व ज़िला शिक्षा अधिकारी महेंद्र प्रसाद माथुर। उनको इस बुढ़ापे में हवाई बिल्डिंग की सीढ़ियां चढ़नी और उतरनी पड़ती थी, इधर घुटनों में दर्द उनसे बर्दाश्त नहीं होता। एक दिन वे एलिमेंटरी दफ़्तर की सीढ़ियां चढ़कर, अपनी सीट पर आकर बैठे...और, सोचने लगे “हाय किस जन्म में ऐसा पाप किया, जो इस बुढ़ापे में उन्हें हवाई बिल्डिंग की सीढ़ियां गिननी पड़ी ? अच्छा रहता, स्वेच्छिक रिटायरमेंट लेकर घर पर आराम करता। मगर, यह अफ़सरशाही ऐसी बीमारी है। यह अफ़सर की कुर्सी, हमारे जैसे अफ़सरों को आराम करने नहीं देती। भले सेवानिवृत हो जाने के बाद, हमारा उस कुर्सी पर कोई हक़ नहीं होता..मगर, सेवाकाल की यादे बार-बार हमें झकझोरती रहती है कि कभी हम भी अफ़सर थे..? सभी जानते हैं, थानेदार और हेडमास्टर के सेवानिवृत होने के बाद, उनकी स्थिति बहुत बुरी बन जाती है ? पहले कई मुलाज़िम उनकी ख़िदमत में हाज़िर रहते थे, मगर सेवानिवृत होने के बाद कोई उनको पानी पिलाने वाला नज़र नहीं आता। वही दशा हम जैसे अफ़सरों के रिटायर हो जाने के बाद, हमारी बन जाती है। सच्च यही है, कुर्सी पर बैठे अफ़सर को हर कोई उनको नमस्कार करता है। कुर्सी चली जाने के बाद, कोई हमें पूछता नहीं। बस, फिर क्या ? हमारी ज़िंदगी बन जाती है ‘डोलर-हिंडा’ के माफ़िक। बस, हम बेचारे डोलते ही रहते हैं..एक-दो-तीन। सेवानिवृत होने के बाद हम कहाँ-कहाँ भटकेंगे, वक़्त काटने ? सेवानिवृत के बाद हमारे लिए वक़्त काटना हो जायेगा, मुश्किल।’

“धम्म” की आवाज़ करता रमेश ने उनकी टेबल पर पानी से भरा ग्लास रखा, और फिर रमेश बोला “लीजिये साहब, ठन्डे-ठन्डे पानी से अपने गले को तर कीजिये।”

कुर्सी के हत्थे पर रखे तौलिये से अपने ललाट पर छलक रहे पसीने के एक-एक कतरे को साफ़ करके, ज़िला शिक्षा अधिकारी महेंद्र प्रसाद माथुर ने कुर्सी बेक ली, तभी तेज़ हवा के झोंके ने खोल दी कमरे की सभी खिड़कियाँ। उनकी टेबल पर रखे काग़ज़, हवा के झोंके से उड़ने लगे। फिर क्या ? रमेश झट एक-एक काग़ज़ को बीनने लगा, और साथ में कहता गया “ये सोहन लालजी तो, इस स्टाफ़ के दुश्मन निकले..? क्या ज़रूरत थी उनको, इस हवाई-बिल्डिंग की तीसरी मंजिल पर यह एलिमेंटरी दफ़्तर लाने की ? दफ़्तर आने लिए हम इतनी सारी सीढ़ियां चढ़ते जाएँ, और हाम्पू-हाम्पू करते जाए..फिर भी हमारी छाती में, साँस समाती नहीं। इधर खिड़कियों से आ रहे हवा के झोंकों के करण, एक पेपर टिकता नहीं टेबल पर। टेबल पर पेपर टिकता नहीं, तब दफ़्तर का काम होगा कैसे ? हुज़ूर हम-सबकी ज़िंदगी बन गयी है, डोलर-हिंडे की तरह..बस, डोलते ही जाओ..डोलते ही जाओ।” डोलर-हिंडे का नाम सुनते ही स्वयं ज़िला शिक्षा अधिकारीजी सकपका गए, और झट उन्होंने ग्लास उठाकर अपने हलक को तर किया। तभी उनकी नज़र सामने चाय वाले भंवर के मकान पर गिरी..जहां छत पर रखा हिंडा [झूला] हवा के झोंकों से डोलता जा रहा था। इस डोलते हिंडे ने उनको याद दिला दी, सोहन लाल दवे के शाप की। अब उनका चेहरा, आँखों के आगे छा गया। कानों में, उनके बोल गूंज़ने लगे “साहब, आपने कैलाश भटनागर के साथ साठ-गाँठ करके मेरे जैसे ग़रीब ब्राह्मण को सताया आपने। आपने मेरी दशा डोलते हिंडे के माफ़िक बना डाली..अब मैं आपको शाप देता हूं, आप और आपका स्टाफ़ कभी सुखी न रहेगा। सभी डोलते रहोगे, डोलते रहोगे..डोलर-हिंडा की तरह।” ऐसा क्या कर दिया..जो इतना बड़ा शाप ? ज़िला परिषद में जब यह दफ़्तर था, तब यही सोहन लाल दवे कार्यालय सहायक के रिक्त पद पर पदास्थापित होकर पधारे थे। तब संस्थापन का सारा काम, वरिष्ठ लिपिक कैलाश भटनागर देख रहे थे। एक तो थे जनाब उनकी बिरादरी के, दूसरी बात यह थी..वे मेहनती और जिम्मेदार इंसान थे। उन दिनों चल रहा था, तबादलों और नव-नियुक्तियों का सीजन। तब वे नए अज़नबी आदमी पर, भरोसा कैसे करते ? संस्थापन जैसे गोपनीय कार्य का सुपरविज़न, उनसे करवाना ख़तरे से ख़ाली नहीं...? अगर सुपरविज़न का काम अगर उनको दे दिया गया होता, तो कई गोपनीय बातें ओपन हो जाती...या फिर इस काम में, उनके द्वारा अड़ंगा भी लगाया जा सकता था। अत: उन्होंने सोहन लाल दवे को संस्थापन शाखा के काम का सुपरविज़न काम नहीं दिया, जिससे दवे साहब हो गए नाराज़। फिर क्या ? झट उन्होंने वासुदेव आर्य साहब के पास अपनी अर्जी लगा दी, और उलाहना देते हुए अपनी बुरी स्थिति का का बखान कर डाला। आर्य साहब झट जाकर ज़िला शिक्षा अधिकारीजी को उलाहना दे बैठे, कहने लगे “वाह उस्ताद। क्या कर डाला, आपने ? हमारे मुंतज़िर [शुभचिंतक] को बना दिया आपने..ढ़ोली-घोड़ा ? तबादले और नव-नियुक्ति की डाक जाने के बाद, तबादलों और नियुक्तियों की जानकारी उनको नोटिस बोर्ड पढ़ने पर मिलती है ? बेचारे ये कैसे ऑफिस-अस्सिस्टेंट हैं, जिनको संस्थापन के काम की कोई जानकारी नहीं..किस व्यक्ति का तबादला कहाँ हुआ, और किस व्यक्ति की नियुक्ति कहाँ दी गयी ?

फिर क्या ? बिना फ़रमाइश किये, जनाब ने पेश कर दिया शेर – “लोग कहते हैं, यह दरिया नहीं आंसू है। सताए मुंतजीर के दिल की आह है।! जनाबे आली उसको इतना ना सताओ, के वह रो पड़े। उसकी हर इल्तज़ा से बददुआ निकल पड़े।! ख़ुदा-ए-रहम जनाबे दिल दरियाव बनाओ। उसकी हर इल्तजा से दुआ-ए-चश्म बहा दो।!”

शेर चाहे कोई हो, मगर उसकी आवाज़ का असर होता है ज़रूर। बियावान ज़ंगल में शेर की एक ही दहाड़ से बन जाते हैं लोग..भीगी बिल्ली। ज़बाने लब से निकले इस शेर से, ज़िला शिक्षा अधिकारी ने अपना सर पीट लिया। मगर आर्य साहब ठहरे बड़ी कुत्ती चीज़, झट उन्होंने अपने बैग से अमृतांजन की शीशी बाहर निकालकर उनकी टेबल पर रख दी। फिर, वे कहने लगे “सर पर मल लीजिये अमृतांजन, कमाल की जन्नती सुंगंध है हुज़ूर। अभी सर-दर्द ठीक कर देगी, आपका।”

“जाइए, जाइए। अपने मुंतजीर सोहन लालजी का सर मल लीजिये, जनाब। कम से कम ऐसे आदमी से, मेरा पीछा छूटेगा।” तब परेशान होकर, महेंद्र प्रसाद बोले।

तभी टेबल पर पत्रावलियों के पेड रखने की आवाज़ सुनायी दी, इस आवाज़ को सुनकर ख़्यालों की दुनिया में खोये महेंद्र प्रसाद चेतन होकर बाहर निकल आये। चेतन होते ही उन्होंने आंखें मसलकर, सामने क्या देखा ? घीसू लाल ने फाइलों का पेड टेबल पर रखा, और वे कहते जा रहे थे “हजूर। आप तो अन्तयामी ठहरे, इधर आपने सोहन लालजी को याद किया और उधर उनका उनका कॉल आया। जनाब ने पूछा कि, उनके सेवाभिलेख का सत्यापन हुआ या नहीं ?”

“और कोई कसर बाकी रह गयी क्या, उनकी ख़िदमत करने में ?” मुंह उठाये बरबस, महेंद्र प्रसाद माथुर बोल पड़े।

“ख़िदमत..? आप काहे तक़लीफ़ उठाते हैं, हुज़ूर ? हम बैठे हैं हुज़ूर, आपके सेवक। अभी तो उनका फ़ोन...” कहते-कहते, घीसू लाल ने फाइलों का पेड खोला।

“फ़ोन पर फ़ोन, फ़ोन पर फ़ोन ? यह क्या है, इनको बीमारी बार-बार फ़ोन लगाने की ? कमबख़्त ने, परेशान कर डाला। यह क्या हमारी ग़लती थी, ग़लती उनकी और भुगते हम ? नौकरी में थे, तब उन्होंने क्यों नहीं करवाई अपनी सर्विस-वेरीफाई ? ऐसे लापरवाह आदमी कैसे बन जाते हैं, ऑफिस-सुपरटिडेंट..जो वक़्त पर अपने सेवाभिलेख में सम्बंधित इन्द्राज़ नहीं करवा पाते...वे कैसे ऑफिस-सुपरटिडेंट बने रहे डी.डी. दफ़्तर के, साले उल्लू की दुम ?” महेंद्र प्रसाद बिफ़रकर, बोल उठे।

“हुज़ूर, बात यह है कि, ‘कुम्हार ग्राहकों को सही हंडिया देता है, मगर ख़ुद फूटी हंडिया में खाना पकाता है।’ यही बात सोहन लालजी पर फिट होती है, वे हेडमास्टरों और प्राचार्यों के सेवाभिलेख बराबर मेन्टेन करते रहे, मगर ख़ुद का काम भूल जाते थे। उन्हें याद नहीं आया कि, उनका सेवाभिलेख का सेवा-सत्यापन बकाया है। अब सेवानिवृति के वक़्त उनको याद आया है, सेवा-सत्यापन।” सोहन लाल दवे का सेवाभिलेख महेंद्र प्रसाद के सामने रखते हुए, घीसू लाल बोले।

“ऐसी बात है तो लाइए उनके कार्यकाल के आहरित किये गए वेतन विपत्र, और पे-पोस्टिंग रजिस्टर। अभी उनकी जांच करके, कर लेता हूं इनका सेवा-सत्यापन।” झल्लाते हुए, महेंद्र प्रसाद बोले।

“हुज़ूर, ज़िला-परिषद से यह दफ़्तर इस हवाई-बिल्डिंग में लाया गया, तब इनके कुछ आहरित वेतन-विपत्र मिस हो गए..” घीसू लाल ने, तपाक से ज़वाब दिया।

“तब साहब बहादुर आप ऐसा कीजिये, पोस्टिंग-रजिस्टर लाइए..उसे देखकर...” महेंद्र प्रसाद बोले।

“पोस्टिंग-रजिस्टर अधूरा है, हुज़ूर। कई विपत्र मिले नहीं, तब उन विपत्रों की पोस्टिंग हुई नहीं। क्या करें, हुज़ूर ? तत्कालीन लेखा शाखा का खाज़िन लोकेश इन विपत्रों की पोस्टिंग करना भूल गया। अरे हुज़ूर, उसका मन यहां पाली में लगता नहीं था..उसका परिवार बाली में था। बस, बार-बार बाली आने-जाने के चक्कर में बेचारा पोस्टिंग करना भूल गया।” घीसू लाल बोल उठे।

“फिर करें, क्या ? लाइए निलंबन आदेश टंकित करके, अभी उसको करते हैं...ससपेंड।” अपना सर थामकर, महेंद्र प्रसाद बोले।

“हुज़ूर यह लोकेश अब हमारे यहां नहीं है, उसका तबादला उदयपुर हो गया..वह चला गया यहां से। हुज़ूर, ज़रा एक बार आप इस फ़ाइल का अवलोकन कीजिये।” कहते हुए घीसू लाल ने, एक फ़ाइल उनके आगे रख दी।

“रहने दीजिये, आप एक भी काम ढ़ंग से करते नहीं..फिर ख़ाक करूं, इस पर हस्ताक्षर ?” नाराज़ होते हुए, महेंद्र प्रसाद बोले “इस मूल सिंह की सर्विस-बुक ढूंढकर ला नहीं सकते, अपनी नाक़ामयाबी को छुपाने के लिए इस मास्टर की डुप्लीकेट सर्विस-बुक बनवाने की सुफ़ारस करते जा रहे हैं आप ? जानते हो, यह मास्टर जल्द रिटायर होने जा रहा है ? इतने-सारे इन्द्राज़ों की प्रविष्टियां, आप कैसे पूरी करेंगे ? जाइए, इस बेचारे मूल सिंह का सेवाभिलेख ढूंढिये।”

“हुज़ूर, क्या कहा आपने ?” घीसू लाल बोले।

“ऊंचे सुनते हैं, क्या ? मैंने कहा सेवाभिलेख ढूंढिये, न तो जाकर सम्बंधित बाबू अरविंद के नाम टंकित करके ले आइये स्पष्टीकरण।” फ़ाइल वापस घीसू लालको थमाकर, महेंद्र प्रसाद बोले।

बेचारे घीसू लाल फ़िक्र में डूब गए, उनके लिए तो यह काम करवाना मुश्किल हो गया..इधर जाए तो खाई और उधर जाए तो कुआ। एक तरफ़ महेंद्र प्रसादजी की नाराज़गी तो दूसरी तरफ़ स्पष्टीकरण लिखकर पूर्व सीनियर डिप्टी मोती लालजी की नाराज़गी मोल लेना..? क्योंकि, यह अरविंद ठहरा उनका दामाद। अब बेचारे घीसू लाल दुविधा में फंस गए, क्या करे या क्या न करे ? आख़िर बेचारे घीसू लाल ने, लाचारगी से उनसे कहा “हुज़ूर, मूल सिंह की सर्विस-बुक बनवाने के आदेश कर दीजिये, बेचारे की सेवा निवृति बहुत नज़दीक है।”

तभी टेलिफ़ोन की घंटी बजी, तब टेबल पर रखी सभी फाइलें उनको थमाकर महेंद्र प्रसाद बोले “बाहर जाइए, और फ़ोन अटेंड कीजिये..किसका फ़ोन आया है ?”

“आया होगा, सोहन लालजी का..और क्या ?” इतना कहकर, फाइलें उठाये कमरे से बाहर आ गए, घीसू लाल। इतनी देर से बेचारे घीसू लाल लघु-शंका निवारण कर नहीं पाए, और अब इसका निवारण करना बहुत ज़रूरी हो गया। करण यह था, अब इसे रोकना उनके हाथ में न रहा। फिर क्या ? झट फाइलों को अपनी टेबल पर रखकर, वे झट युरीनल में दाख़िल हो गए। फ़ोन की घंटी बजती रही, होल में बैठा कोई बाबू उठकर नहीं आया फ़ोन का चोगा उठाने। आख़िर तमतमाते हुए महेंद्र प्रसाद ने फ़ोन का चोगा उठाकर, कहने लगे “क्यों करते हो, बकवास..बार-बार फ़ोन लगाकर ? कह दिया जब तक सेलेरी बिल न मिलेंगे तब-तक सेवा-सत्यापन नहीं होगा, आपकी सर्विस-बुक में।”

“दफ़्तर में सेलेरी-बिल खो जाते हैं, किसी की सर्विस-बुक खो जाती है..बिलों की पोस्टिंग होती नहीं ? फिर, आप क्या करते हैं जनाब ?” फ़ोन पर, कोई बोला।

“झख मार रहा हूं, इससे आपको क्या ?” महेंद्र प्रसाद क्रोधित होकर, बोले।

“ज़बान संभालकर बोलिए, क़ायदे से बात कीजिये..हम डिप्टी डायरेक्टर बोल रहे हैं।” फ़ोन से कर्कश आवाज़ सुनायी दी।

“मार दिया रे, सोहने तूने तो..!” महेंद्र प्रसाद बड़बड़ाये, और फिर सावधान की मुद्रा में खड़े हो गए..फिर नम्रता से, फ़ोन पर कहने लगे “नमस्कार, हुज़ूर..नमस्कार। ग़..ग़लती..” घबराकर, महेंद्र प्रसाद फ़ोन पर बोले।

“अब छोड़िये, अभिवादन को। बताइये, सोहन लालजी के काम का क्या हुआ ? क्यों इस पंडित को, चक्करघन्नी की तरह दफ़्तर के चक्कर कटवा रहे हो ? पंडितों की दुआ लिया करो, इनका शाप..” फ़ोन से, आवाज़ सुनायी दी।

“आप निश्चिंत रहें, हुज़ूर। इनका काम हो जाएगा। हम जानते हैं, वे आपके कार्यालय में ओ.एस. के पद से सेवानिवृत हो रहे हैं।” महेंद्र प्रसाद फ़ोन पर बोले।

“झूठी तसल्ली मत दीजिये, माथुर साहब। यहां तो आपके कार्यालय में, एक क्या ? हजारों काम बकाया है। कहीं तो कोई अध्यापक रो रहा है, अपने जी.पी.एफ़. और एस.आई. खातों को देखकर..कहीं किसी अध्यापक को, एरियर बिल का भुगतान नहीं हुआ। अब क्या कहें, माथुर साहब ? ज़िला परिषद काल में, इन मास्टरों के जी.पी.एफ. एवं एस.आई. खातों में एक पैसा जमा नहीं हुआ..कहिये माथुर साहब, कहाँ गए ये पैसे ?” फ़ोन से, आवाज़ आयी।

“साहब, हो जायेंगे सारे काम। बस, आप इतना बता दीजिये ‘हमारे भेजे गए यात्रा-विपत्रों पर आपके प्रतिहस्ताक्षर हुए या नहीं ?” महेंद्र प्रसाद फ़ोन पर बोले। मगर, फ़ोन से वापस आवाज़ सुनायी नहीं दी।

“हल्लो, हल्लो। हुज़ूर कहिये ना..” महेंद्र प्रसाद फ़ोन पर बोले, मगर उनको फ़ोन के चोगे से कोई आवाज़ सुनायी नहीं दी..अगर फ़ोन पर कोई होता तो उन्हें आवाज़ सुनायी देती..ऐसा लग रहा था, सामने वाले ने फ़ोन का चोगा चुपचाप रख दिया था। चोगे को क्रेडिल पर रखते हुए, महेंद्र प्रसाद बोले “सभी अपने काम को रोते हैं, कोई यह नहीं देखता कि मेरे ख़ुद के काम इनके दफ़्तर में कितने बकाये है ?” बड़बड़ाने के बाद, महेंद्र प्रसाद ने घंटी बजायी। घंटी सुनकर, रमेश कमरे में दाख़िल हुआ।

“कहाँ गए, घीसू लालजी ? क्या उनको, फ़ोन उठाने की फुर्सत नहीं ?” महेंद्र प्रसाद ज़रा नाराज़गी से बोले।

“हुज़ूर, ओ.ए. साहब ज़रा पाख़ाने में गए हैं, लघु-शंका निवारण के लिए। बेचारे कैसे उठाते, फ़ोन ?” रमेश ने तपाक से, ज़वाब दिया।

“जाओ, ढूंढो उन सेलेरी बिलों को...आराम हराम कर डाला, इस कमबख़्त सोहन लाल ने। यहां बिल ढूँढने का तो उसे वक़्त मिला नहीं, डिप्टी डायरेक्टर के पास जाकर शिकायत करने का वक़्त उसे मिल गया ? “ उकताकर. महेंद्र प्रसाद बोले।

“साहब, एक बात कहूं काम की ? ये बिल पंडित सोहन लालजी ने, ख़ुद अपने हाथ से रखे हैं। हुज़ूर यह सच्च है, ऑफिस बदलते वक़्त ज़िला-परिषद से लाया सारा सामान उन्होंने अपनी देख-रेख में ही रखवाया था।” रमेश मुस्कराकर, कह बैठा। महेंद्र प्रसाद के लिए तो यह ख़बर संकट-मोचन के बराबर थी। सुनकर, उनके लबों पर मुस्कान छा गयी। फिर वे मुस्कराते हुए, रमेश से बोले “जब घीसू लालजी निपटकर वापस आ जाएँ, तब उनको मेरे कमरे में भेजना।”

नभ में चढ़ी धूल धीरे-धीरे भौम पर बिछने लगी, हवा की गति कम हो गयी..यानि तूफ़ान थम चुका था। सामान किसने रखवाया..? यह रहस्य खुल ने के बाद, घीसू लाल ने शाम को बालाजी के मंदिर जाकर सवा रुपये का गुड़ चढ़ाया....फिर, उन्होंने अपने क़दम घर की तरफ़ बढ़ा दिए। गली के नुक्कड़ पर सोहन लाल को देखा..जो गुमसुम खड़े थे। उनके नज़दीक जाकर, घीसू लाल बोल पड़े “जनाबे आली कैसे हैं, आप ?”

“शुभचिंतक बनकर ऐसे पूछा जाता है, क्या ?” चिढ़ते हुए, सोहन लाल दवे बोले।

“फिर आप ही बता दीजिये, जनाब ‘कैसे पूछा जाता है ?’ कहिये, पंडित साहब ? वैसे हम पुलसिया अंदाज़ के वाकिफ़ ज़रूर हैं, क्योंकि हमारा पड़ोसी थानेदार जो ठहरा। आपका हुक्म हो तो, उसके अंदाज़ से पूछ लिया जाय ? ” घीसू लाल मुस्कराते हुए, कहने लगे।

“क्या, हम मुज़रिम है ? एक तरफ़ आप कोबरा बनकर अपना फन फैलाए बैठ गए हमारी सर्विस-बुक पर, और दूसरी तरफ़ हमें..” सोहन लाल नाराज़गी के साथ बोले।

“शुक्रिया, जनाब। आपने हमें ‘कोबरा-नाग’ के ओहदे से नवाज़ा। आपका हुक्म हो तो, हम अपने विष-दन्त काम में ले लें ? आप तो जानते ही हैं, कोबरा नाग आदमी को काट जाय तो वह पानी नहीं मांगता..सीधा जाता है, भगवान के पास।” उनकी बात काटकर बोले घीसू लाल, और फिर ठहाके लगाकर हंसने लगे।

“काम की बात कीजिये, छोड़िये फ़िज़ूल की बातें। बताइये, सेवाभिलेख का सत्यापन कब-तक हो जाएगा ? है भगवान। इस सरकार ने कहाँ से लाकर ऐसे आदमी भर डाले इस दफ़्तर में, जो बेचारे सेवानिवृत होने कार्मिक को ऐसे परेशान करते हैं ?” नाराज़गी से, सोहन लाल बोले।

“हुज़ूर, फ़िज़ूल की बात आप कर रहे हैं..हम नहीं। आप को मालुम होना चाहिए कि, कार्मिक तबादला, पदोन्नति या सेवानिवृत हो जाने के बाद भी अपने बकाया कार्यों और प्रभार के लिए जिम्मेदार बना रहता है।” इतना कहने के बाद, घीसूलाल ने अपने बैग से एक डायरी बाहर निकाली। फिर, उसमें नोट की गयी टिप्पणी को पढ़ते हुए बोले “सुनिए जनाब। अभी भी आप, अपने बकाया कार्य और प्रभार के प्रति जिम्मेदार हैं। उसे पूरा कीजिये, और फिर आप कीजिये सेवा-सत्यापन की बात।”

“मैं क्यों ओढूं, जिम्मेदारी ? अब इसके बारे में आप जाने, बकाया कार्य और प्रभार से मझे क्या लेना-देना ? अब यह बकाया कार्य और प्रभार आपके नाम है, आपको ही पूरा करना है..मुझे नहीं। सुन लीजिए एक बार, अगर आप सेवा-सत्यापन नहीं करवाते हैं तो मैं उच्च अधिकारियों के पास चला जाऊंगा आपकी शिकयत करने।” इस तरह, सोहन लाल उन पर बरस पड़े।

“जनाब। जुओं के काटने से जुआरा फेंका नहीं जाता, जिम्मेदारी तो आपको ओढ़नी ही पड़ेगी। अब मैं आपसे पूछता हूं, आपको जब पदोन्नति मिली, तब आप इस दफ़्तर से रिलीव होकर डी.डी. ऑफिस गए थे..तब आपने इस दफ़्तर से, अदेय-प्रमाण-पत्र हासिल किया या नहीं ?” घीसू लाल ने, सियासती शतरंज का मोहरा चलाते हुए कहा।

“मुझे, इसकी क्या ज़रूरत ? अपना चार्ज सुपर्द करके ही, हमने इस दफ़्तर को छोड़ा है। जिनके पास यह चार्ज है, उनसे ही पूछिए..मुझसे क्यों सवाल करते हैं, आप ? हमें क्यों, नाहक इस मामले में घसीटते हैं ?” तमतमाए हुए, सोहन लाल बोले।

“जनाब, चार्ज देने से आपकी जिम्मेदारी ख़त्म नहीं होती। दफ़्तर के हर कार्मिक से लेना पड़ता है, अदेय-प्रमाण-पत्र। आप तो जानते ही हैं, आपके हिस्से में शिफ्ट किये गए कई रेकर्ड बकाया बोलते हैं। आपको याद होगा कि, कार्यालय के सामान शिफ्ट करने का आदेश आपके नाम निकला था ? सभी प्रभारियों ने अपने-अपने प्रभार के सामान की फ़ेहरिस्त बनाकर, आपको प्रभार का सामान सौंपा था। जनाबे आली सामान सुपर्दगी के काग़ज़ में आपके हस्ताक्षर बोल रहे हैं कि, सारा सामान आपको दे दिया गया था। इस दफ़्तर में सामान रखने के बाद, क्या आपने इन प्रभारियों को सामान सुपर्द करके उनसे प्राप्ति-रसीद प्राप्त की या नहीं ? प्राप्ति-रसीद आपके पास नहीं है, तो यही समझिये कि अभी-तक सारा प्रभार आपके पास ही है। सामान न मिलने पर, उसके ढूँढने की जिम्मेदारी आपके कन्धों पर आना स्वाभाविक है। समझे, जनाब ?” लबों पर मुस्कान फैलाकर, घीसू लाल बोले।

इनकी बात सुनकर सोहन लाल रह गए, हक्के-बक्के। अवाक होकर खड़े रह गए, अब क्या बोले ? उनके पास, अब कहने का कोई अकाट्य बिंदु रहा नहीं। तब वे मक्खन से लबरेज़ शब्दों को इस्तेमाल करते हुए, बोले “घीसूलालाजी। आप तो हमारे परम-मित्र है, ना ? आपको तो सहयोग करना चाहिए..कुछ करो मेरे यार।”

“हम कहाँ रहे, आपके मित्र ? हुज़ूर, हम तो आपके दोस्त नहीं दोष हैं..इसलिए, आप हमारी शिकायत करने चले थे ना, उच्च अधिकारियों के पास ?” नाराज़गी के साथ बोले, घीसू लाल।

“अरे यार घीसू लालजी, आप तो इतनी छोटी सी बात पर नाराज़ हो गए यार ? हमने तो आपसे मज़हाक़ में कहा था, हममें इतनी कहां हिम्मत..जो आपकी शिकायत करते ?” सोहन लाल नम्रता से बोले।

“आपके लिए यह छोटी सी बात होगी मगर हमारे लिए शूल समान, इज़्ज़त को धूल में मिलाने के बराबर थी..अब आप आ जाइए कार्यालय, हवाई बिल्डिंग की सीढ़ियां चढ़कर। माथुर साहब के पास रखी है, आपके बकाया कार्यालय रेकर्ड की फ़ाइल।” डायरी को बैग में रखते हुए, घीसूलाल बोले। फिर, रूख़्सत लेते घीसू लाल आगे कहते गए “जनाब, आप वही महानुभव हैं...जिन्होंने हम लोगों को बना डाला, ‘डोलर-हिंडा’...! दफ़्तर के लिए, हवाई बिल्डिंग का यह होल किराए पर क्या लिया..पूरे स्टाफ़ को डोलते रहने के लिए, मज़बूर कर डाला आपने ? ज़रा अब आप भी चहलक़दमी कर लीजिएगा, ये सीढ़ियां चढ़कर। आपके कार्य में ज़रूर प्रगति होगी, आख़िर आपके पीछे है, ना...डी.डी. साहब की सुफ़ारस..?”

इतना कहकर, घीसू लाल हो गए रूख़्सत। घर में दाख़िल होकर उन्होंने जैसे ही अपना बैग स्टूलपर रखा, तभी मकान मालिक का छोरा कमरे के अन्दर आया और बोला “नानाजी। आपके दफ़्तर से अभी-अभी फ़ोन आया है, आप चलकर, उनसे बात कर लीजिएगा।” फिर क्या ? बेचारे घीसू लाल थके-मांदे, उस छोरे के साथ चले।

फ़ोन का चोगा उठाकर, घीसू लाल बोले “हल्लो, कौन..?”

चोगे से आवाज़ आयी “ज्ञान यानि गरज़न सिंह बोल रहा हूं, हुज़ूर। बस, अब आप फ़ौरन दफ़्तर आ जाएँ, ज़रूरी काम है आपसे।”

“ठीक है, मगर मेरी क्या ज़रूरत..? आप संभाल लेंगे, सारा मामला।” आनाकानी करते हुए, घीसू लाल फ़ोन पर बोले।

“डी.ई.ओ. साहब का हुक्म है, आपको आना ही है। फिर कहना मत, मैंने कहा नहीं आपको।” चोगे से, बाबू गरज़न सिंह की आवाज़ सुनायी दी।

“ठीक है, भाई। आना तो होगा ही..बस, जस्ट आ रहा हूं।” फ़ोन पर, घीसू लाल ने ज़वाब दिया। फिर चोगा क्रेडिल पर रखकर बोले “आज़ दिन-भर काम करते रहें दफ़्तर में, सर ऊपर उठाने का वक़्त मिला नहीं हमें। और घर पर आने के बाद भी, दो मिनट आराम नहीं..और आ गया, यह फ़ोन ?”

“बाबूजी। सर ऊंचा न रखना ही अच्छा है, न तो आप ठोकर खाकर नीचे गिर पड़ेंगे।” तणखल [दहलीज़] पर बैठे मकान मालिक हंसते हुए, बोल उठे।

“क्या कहा, आपने ?” बस इतना ही बोल पाए, घीसू लाल। उतावली में कमरे में दाख़िल होते वक़्त उन्होंने नीचे तणखल को देखा नहीं, और ठोकर खाकर चारों खाना चित्त होकर गिर पड़े।

“अरे मेरी मांsss..! मर गया रे..।” दर्द बर्दाश्त न कर पाने से, घीसू लाल चीत्कार उठे।

“मैंने आपको पहले ही चेताया था, बाबूजी। मगर आप सर ऊपर करके ही चलेंगे, जनाब। आपको, हमारी सलाह की क्या ज़रूरत ? हुज़ूर, एक बात कह देता हूं। मर्दों के लिए, झुकना ही उनके हित में है। दफ़्तर में अफ़सर, और घर पर गृह-मंत्री के सामने झुककर चलना पड़ता है। चलिए, कमरे में। मैं आपके लिए चाय बनाकर लाता हूं, आप सेरीडोन की गोली चाय के साथ ले लीजिये, सारा दर्द छू-मन्त्र।” कहते-कहते मकान-मालिक ने, सहारा देकर उन्हें उठाया।

संध्याकाल हो गया, पड़ोस में आये संतोषी माता के मंदिर में मोहल्ले की औरतें इकट्ठी होकर आरती गाने लगी, और साथ में टंकोर बजाती जा रही थी।

चाय पीकर घीसू लाल ने बैग उठाया, और बोले “इन मोहल्ले की औरतों का काम ही, आरती उतारना है। अब अगर मैं दफ़्तर वक़्त पर नहीं पहुंचा, तो यह बाबू गरज़न मेरी आरती उतार लेगा कमबख़्त..? दिन-भर इसको वक़्त मिला नहीं, विचार-विमर्श के लिए..अब रात को..?”

दफ़्तर के होल में सभी ट्यूब लाइटें लगी थी, रमेश ने बाबू गरज़न सिंह की टेबल पर मिठाई और नमकीन करीने से अख़बार के टुकड़ों पर रख दी। रखने के बाद, उनकी अलमारी से टिफ़िन बाहर निकालने लगा। फिर, टिफ़िन को टेबल पर रखकर, वह बाबू गरज़न सिंह से बोला “हुज़ूर। दस्तरख़्वान सजा दिया है, अब आप आ जाइए और बिस्मिल्लाह...”

“बिस्मिल्लाह..? उर्दू की टांग तोडूं, कहाँ से सीखकर आ गया...उर्दू के अल्फ़ाज़ ? साले अब जा, लेकर आ आबे हयात ग्लास में भरकर।” दोनों हाथ ऊपर ले जाते हुए उन्होंने अंगड़ाई ली, फिर वे बोले। अचानक वे सीट से उठे, और वाश-बेसीन के पास जाकर अपने हाथ-मुंह धोये..फिर, वापस आकर कुर्सी पर रखे तौलिये से अपने हाथ-मुंह पोंछ डाले। इतने में घसीटा राम होल में दाख़िल होते, कहने लगे “बाबू साहब। हाथ-मुह पोंछते रहोगे, जनाब कुछ लोगों को भी पोंछ लिया करो....उनका मुंह बंद करने के लिए।”

“क्या किसी की मौत आयी है, जो शेर की मांद में हाथ डाल रहा है ?” तौलिये को वापस कुर्सी के हत्थे पर रखते हुए, बाबू गरज़न सिंह बोले।

“उस्ताद। दाई से क्या छुपा रहता है, गर्भवती का पेट...? आपको मालुम होना चाहिए, आपके ख़िलाफ़ कौन कर रहा है...बेहूदी हरक़त ? चलिए, मैं बता देता हूं..आपके ख़िलाफ़ सोहन लाल दवे शिकायत कर चुके हैं, डी.डी. ऑफिस में।” इतना कहकर घसीटा राम आकर बैठ गए, बाबू गरज़न सिंह के बगल में रखी कुर्सी पर। फिर जनाब, आगे कहते गए “क्या कहूं, गरज़न बाबू साहब ? वह तो कुछ और कह रहा था कि, आपने ही उसके ख़िलाफ़ सेलेरी बिल खोने और पोस्टिंग रजिस्टर में पोस्टिंग न करने का लफ़ड़ा पैदा किया है। जिसके करण ही, उसकी सर्विस-बुक में सेवा-सत्यापन नहीं हो रहा है..?”

“उस्ताद। आइये थोड़ा नज़दीक, और अरोगिये मिठाई-नमकीन।” इतना कहकर बाबू गरज़न सिंह बैठ गए, अपनी कुर्सी पर।

घसीटा राम अपनी कुर्सी उनकी टेबल के नज़दीक खिसकाकर बैठे ही थे, तभी घीसू लाल होल में अवतरित हो गए। टेबल पर रखे मिठाई-नमकीन पर निग़ाह गिरते ही, घीसू लाल बोल उठे “पार्टी हो रही है, गरज़न बाबू साहब ? क्या बात है, आज़ दुश्मन भी दोस्त बन गए हैं ? इधर हम दोस्तों को भी भूल गए, जनाब ?”

“आप भी शरकत कर लीजिये, दावत। अभी-तक हमने बिस्मिल्लाह किया नहीं..पधार जाइए। देरी की तो कहीं से भी चटोरी मक्खियाँ भिनभिनाती हुई आ जायेगी यहां..फिर तो भय्या...इधर तो ये नमकीन ठन्डे तो होंगे जो होंगे ही, मगर आपके हाथ कुछ आएगा नहीं..क्योंकि, आने वाली मक्खियां सफ़ा-चट कर जायेगी। समझे, ओ.ए. साहब ?” इतना कहकर, बाबू गरज़न सिंह ने एक मिर्ची-बड़ा उठाकर अपने दांतों के नीचे दबाया। फिर मिर्ची बड़े को चबाते हुए, आगे बोले “ओ.ए. साहब। एक ही दफ़्तर में काम करने वाले हैं, हम। फिर, काहे की दुश्मनी ? कभी-कभी तकरार हो जाती है, अपने-अपने सिद्धांतों के ख़ातिर।” बगल में रखी कुर्सी पर आसीन होकर, घीसू लाल बोले “अच्छा है, दोस्त बनकर रहने में। बाहर का दुश्मन, हम-सबका दुश्मन। अभी हम-सब पर एक ही मुसीबत आयी है। वह मुसीबत है, सोहन लाल दवे। इन्होंने हम-सबके ख़िलाफ़, डिप्टी डायरेक्टर साहब से शिकायत की है। क्या आपको मालुम है, गरज़न बाबू ? आज़ सुबह ठीक ११ बजे बड़े साहब के पास डिप्टी डायरेक्टर साहब का फ़ोन आया था, वे बहुत नाराज़ हो रहे थे।”

“जनाब, आपने क्या फ़रमाया..सुबह ११ बजे ?” इतना कहकर, उछल पड़े बाबू गरज़न सिंह। और ज़ोश में आकर, घीसू लाल से कह बैठे “मार लिया मैदान, ओ.ए. साहब। अब तो सोहन लालजी को छठी का दूध न पिला दिया, तो मेरा नाम गरज़न सिंह नहीं।”

“ऐसी क्या बात है, बाबू साहब ?” इतना कहकर, घीसू लाल ने चबाये गए मिर्ची बड़े के बचे डंठल को कचरे की टोकरी में फेंका।

“हेड साहब, कमाल हो गया। ठीक ११ बजे डी.डी. साहब थे मिडल स्कूल बोरड़ी में, उस स्कूल में फ़ोन का होना तो दूर..वहां से बीस किलोमीटर दूर तक कोई फ़ोन नहीं, तब जनाब उनका फ़ोन करने का कोई सवाल नहीं। समझे, हेड साहब ?” टेबल थपथपाते हुए, बाबू गरज़न सिंह बोल उठे।

“बाबू साहब। क्या आज़कल आप, किसी पहुंचे हुए साधु-संतों से प्रशिक्षण तो नहीं ले रहे हैं..? अन्तर्यामी बन गए, जनाब ? यहां बैठे आप, डी.डी. साहब का आंखों देखे हाल बता रहे हैं ?” अचरच करते हुए, घीसू लाल बोल पड़े।

“अजी, हम प्रशिक्षण लेते नहीं प्रशिक्षण देते हैं। जानते हैं, आप ? मुख़्बिरों का ज़ाल फैला रखा है हमने, जगह-जगह। डी.डी.साहब की हर ख़बर आ जाती है, हमारे पास।” बाबू गरज़न सिंह बोले। इनकी बात सुनकर, अवाक रह गए घसीटा राम। इस कार्यालय में बिछाए गए मुख़्बिरों के ज़ाल का कमाल वे देख चुके थे। दूध का जला, छाछ को फूंक-फूंककर पीता है। फिर, वे बेचारे क्या बोल पाते ? मगर घीसू लाल कैसे रह पाते, चुप ? वे तपाक से, पूछ बैठे “भय्या गरज़न बाबू। यह जानकारी आपने, आख़िर हासिल की कैसे ?” तब हंसकर बोले, बाबू गरज़न सिंह “बताने वाले का नाम हम नहीं बताएँगे, हमारे मुख़्बिर ने डी.डी.ऑफिस में फ़ोन लगाया था। उन्हें ज़वाब मिला ‘करीब सुबह ८ बजे डी.डी. साहब अपनी टीम को लेकर, मिडल स्कूल बोरड़ी के निरिक्षण हेतु निकले हैं। आप जानते हैं..उनका और कहीं जाने का प्रोग्राम नहीं था।’ अब आप यह बताएं हेड साहब, जोधपुर से बोरड़ी तक के सफ़र में कितना वक़्त लगेगा ? चलिए, कन्फर्म कर लेते हैं..आपको भरोसा नहीं है तो, टेलीफ़ोन इधर दीजिये।” फिर क्या ? बाबू गरज़न सिंह ने चोगा उठाया, और मिलाया नंबर..फिर आवाज़ आने पर जनाब फ़ोन पर कहने लगे “बोड़ा साहब। पायालागू। कैसे हैं, आप ?”

“तू अपनी बात कर, बिना काम तू मुझे कभी फ़ोन करता नहीं..अब बोल, क्या काम है ?” फ़ोन पर, डी.डी. ऑफिस के संस्थापन प्रभारी देवेन्द्र बोड़ा की आवाज़ सुनायी दी।

‘क्या कहूं, बोड़ा साहब ? सुबह करीब ११ बजे आपको फ़ोन लगाया था, मगर कहाँ थे हमारे अहोभाग्य...जो हमें आपकी मधुर वाणी सुनायी देती ?” बाबू गरज़न सिंह ने, मक्खन से लबरेज़ शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा।

“गदेड़ा, निक्कमा है क्या तू ? काम नहीं करता, ऑफिस में ? फिर आयेगी तेरी शिकायत, और फिर आकर रोयेगा तू....मेरे पास आकर। चल, तू ठहरा मेरा चेला...इसलिए बता देता हूं, मैं सुबह ११ बजे डी.डी. साहब के साथ में बोरड़ी स्कूल में था।” फ़ोन से देवेन्द्र बोड़ा की आवाज़ सुनायी दी।

“हुज़ूर ज़रा बताइये, डी.डी. साहब ने पहले या बाद में हमारे दफ़्तर में फ़ोन लगाया था क्या ?” बाबू गरज़न सिंह ने, आख़िर फ़ोन पर उनसे पूछ ही लिया।

“फ़ोन, और डी.डी. साहब करे..? तेरी अक्ल घास चराने गयी, क्या ? उनके पास इतने पेंडिंग काम पड़े हैं, उन्हें कहाँ फुर्सत तुम्हारे डोलर-हिंडा दफ़्तर वालों से सर ख़फ़ाये..? चल अब फ़ोन का चोगा रख दे, क्रेडिल पर। मेरा सर मत खा, मैं सोने जा रहा हूं।” फ़ोन पर बोले देवेन्द्र बोड़ा, और उनके चोगा रखने की आवाज़ सुनायी दी।

चोगा क्रेडिल पर रखकर, बाबू गरज़न सिंह बोले “साले इस कुतिया के ताऊ ने किसी मिमिक्री करने वाले कलाकर से फ़ोन करवाकर, हमें डराने की कोशिश की। अब तो हो गयी तसल्ली, ओ.ए. साहब ? अब क्या करना है, बस हो जाइए तैयार..चक्रव्यू रचने।”

“हमें क्यों पूछते हो, ज़रा घसीटा रामजी की राय ले लो। फिर अपने दफ़्तर के फौज़ियों से भी कर लीजिये, विचार-विमर्श। महेश, घनश्याम, प्रदीप, अनिल, जसा राम, ओम प्रकाश, पदम सिंह वगैरा सभी बाबूओं से राय ले लीजिये।” घीसू लाल ने कहा।

तभी नारायण सिंह, महेश, प्रदीप, जसा राम, पदम सिंह वगैरा सभी बाबू एक-दूसरे को मज़हाक़-मज़हाक़ में धक्के देते हुए, होल में दाख़िल हुए। कोई किसी पर कोमेंट कस रहा था, तो कोई दूसरे को धक्के देता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था। तभी घीसू लाल का कथन उनके कानों में गिरा, सुनते ही प्रदीप बोल पड़ा “वाह, हेड साहब वाह। हम लोगो से काम कैसे लिया जाय, इस तरह की प्लानिंग करते आप बैठक ले रहे हैं ? और हम लोगों को मिठाई-नमकीन की पार्टी से मरहूम रखकर, ख़ुद मिठाई-नमकीन पर हाथ साफ़ करते जा रहे हैं..?”

“खाने के लिए, मर मत....! मिठाई पड़ी है, अभी..खा लेना। पहले तुम-लोग सांस तो ले लो, आख़िर हवाई बिल्डिंग की सीढ़ियां चढ़कर ऊपर आये हो तुम-सब।” घीसू लाल बोले।

न मालुम इस बार, घसीटा राम कैसे बाबू गरज़न सिंह के फौज़ियों पर हो गए मेहरबान ? जनाब ने झट रमेश को बुलाकर, इन लोगों के लिए समोसे और कचोरियां लाने का हुक्म देते हुए कह डाला “सुना रे, रमेश ? इन सबके लिए गरमा-गरम समोसे और कचोरियां, सूरज पोल से लेता आ।”

“और मेरे लिए, क्या ? रेड एंड वाइट का पैकेट तो मंगवा दीजिये, साहबे आलम।” खिसयानी हंसी हंसता हुआ, रमेश बोल उठा।

“अरे जानता हूं रे, तेरे लखन। साला तू ठहरा ऐसा लिच्चड़, सिगरेट का पैकेट मारे बिना तू नमकीन लाएगा नहीं। जा....ला देना, पैकेट रेड एंड वाइट सिगरेट का..ये ले रुपये, और जा फटा-फट।” इतना कहकर, घसीटा राम ने एक सौ का नोट रमेश थमा दिया। नोट लेकर रमेश, बन्दर की तरह खी खी करता वहां से चला गया। उसके जाने के बाद, घसीटा राम बाबू गरज़न  सिंह से बोले “चलिए बाबू साहब, आप ही बन जाइए योजना आयोग के अधिकारी और बनाइये योजना..क्या करना हैं ?”

“अजी, हमको तो पसंद है, उनके गले में पड़ी रुद्राक्ष माला। बस, हमें वह मिल जाए तो हम गंगा नहाए....सारे पाप धुल जायेंगे।” बाबू गरज़न सिंह ने, हंसते हुए कहा।

“है राम। अब तो हमारा पंडित होना, हुआ बेकार....पंडित हम, और रुद्राक्ष माला जायेगी बाबू गरज़न सिंह के गले में ? भय्या गरज़न बाबू अब अपना प्रवचन शुरू कर दीजिये, हमारी उत्कंठा शांत कीजिएगा फर्ज़ी पंडित साहब।” हंसते हुए, घीसू लाल बोल पड़े।

तब सुनिए, कल दफ़्तर में तशरीफ़ ला रहे हैं सोहन लालजी दवे। हमारी बस यही मंशा रहेगी, उनको मज़बूर करना है..वे कई दफ़े हवाई बिल्डिंग की सीढ़ियां उतरे और वापस सीढ़ियां चढ़े। बस, उनके लिए यह सीढ़ियां चढ़ने-उतरने का काम तब-तक ही चालू रखना है..जब तक उनके चेहरे पर झुंझलाहट के भाव पैदा न हो जाय ? मगर एक बात सबको याद रखनी है, कोई कार्मिक उनको भाव नहीं देगा। ऐसा ही दर्शाना है, मानो वे कोई ख़ास आदमी नहीं बल्कि साधारण अध्यापक है। न कोई उनको ज़र्दा चखायेगा, और न उनको चाय पिलाएगा। विशेष तौर पर हेड साहब को कहे देता हूं, वे इस बात का विशेष ध्यान रखेंगे...क्योंकि ये आली जनाब ठहरे, उनके पुराने दोस्त। बस आप साब समझ गए, सबको उनके साथ एक अज़नबी की तरह पेश आना है..यह तो है, आप सबके लिए हिदायत।” इतना कहकर, बाबू गरज़न सिंह ने लम्बी साँस ली।

“आगे फ़रमाइए, गुरु।” प्रदीप बोला।

“बस, तुम-सबको महाभारत-युद्ध के महारथियों की तरह काम को अंजाम देना है। जैसे भीष्म पितामह, आचार्य द्रोणाचार्य, दानवीर कर्ण, राजा शल्य, कृपाचार्य वगैरा ने कितने दिन सेनापति की बागडोर संभाली, उसी तरह आप सबको उनसे लगभग १७ दिन तक इस कार्यालय के बकाया काम करवाकर उन्हें पज़ल करना है। मैं जानता हूं, इसमें आप सभी महारथी माहिर हैं।”

“कैसे, कैसे..?” घसीटा राम ने सवाल किया।

“देखिये जब वे आयेंगे, तब डी.ई.ओ. साहब उनको बताएँगे बकाया काम। पहला काम आपका होगा घसीटा रामजी, आप बनेंगे प्रथम सेनापति। आप उनसे ढूंढवायेंगे ज़िला-परिषद काल के सेलेरी बिल के पुलिंदे..उन सब पुलिंदों को आप क्रमवार फ़ाइल कराएँगे, और फिर करवाएंगे उन बिलों की पोस्टिंग। इस काम में लग जायेंगे, सात दिन।” बाबू गरज़न सिंह बोले।

“फिर, अगला काम ?” घीसू लाल ने, आगे पूछ ही लिया।

“इस काम में हमारा सिपाही रमेश साथ रहेगा, इनके। आख़िर, जनाब को कई बोरे खंखालने होंगे। बेचारे डस्ट से स्नान करेंगे तब उनको मालुम होगा कि, दफ़्तर का सामान किस तरह शिफ्ट किया जाता है ?” बाबू गरज़न सिंह बोले। तभी रमेश ने अख़बार के कई टुकडे किये, फिर उन पर घसीटा रामजी द्वारा मंगवाए गए नमकीन पीस रखकर टेबल पर दस्तरख्वान सज़ा दिया। फिर उन सबको, अख़बार में रखे नमकीन थमाता हुआ बोला “उस्ताद। आली जनाब सोहन लालजी ने शिफ्टिंग के वक़्त, हम चपरासियों को बना दिया ‘चवालिया’..उस्ताद क्या कहूं, आपसे ? हमने उस वक़्त, इन चवालियों की तरह बड़ी-बड़ी लोहे की अलमारियां ढोयी थी। फिर हमने, मज़हाक़ में उनसे यही कहा ‘साहब, हर चपरासी को मज़दूरी के सौ-सौ रुपये तो दिला दीजिये..चाय-नमकीन में खर्च हो जायेंगे।’ अरे हुज़ूर, क्या बताऊं आपको ? उन्होंने झट टके सा ज़वाब दे दिया, हमें ‘किस बात के पैसे ? सरकारी नौकर हो, दफ़्तर के काम करने में किस बात के पैसे ? वेतन नहीं मिलता, तुम लोगों को सरकार से..फिर काहे के पैसे माँगते हो तुम..सरकारी पैसे क्या हराम के है ?’ और क्या बताऊं, गरज़न बाबू साहब ?”

“इन अलमारियों को तो छोड़िये, इस खाज़िन की लोहे की भारी तिजोरी को इन लोगों ने अपने कन्धों पर रखकर ढोयी थी। ढोते वक़्त हवाई-बिल्डिंग की सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते एक बार तो इनके पांव कांप गए, तब इनको सहारा देकर मैंने बचाया...इनको। ना तो तिजोरी सहित ये सभी चपरासी लुढ़क जाते, इन सीढियों पर। यह तो अच्छा हुआ, मैंने बचा दिया इनको।” इतना कहकर, नारायण सिंह अपनी झाडू-कट मूंछों पर ताव देने लगे। उनकी बात सुनकर रमेश हंस पड़ा, और कहने लगा “नारायण बा। क्यों मार रहे हो, बण्डल ? अगर बीड़ी का बण्डल ख़त्म हो गया है तो, मैं आपको रेड एंड वाइट सिगरेट पिला दूंगा। समझे, आप ? मगर बण्डल मारकर, हमारी तोहिन मत करो नारायण बा।”

“मैं क्यों झूठ बोलूंगा रे, अभी कमीज़ उतारकर दिखला देता हूं मेरे कंधे पर आये चोट के निशान। उस दिन तुम लोगों के करण ही, मैं चोटिल हुआ।” नारायण सिंह बोले।

“असल बात यह हुई थी, हम तिजोरी लिए ऊपर वाली सीढ़ियां चढ़ रहे थे..और आप नीचे से आ रहे थे ऊपर, तभी कोने में बैठा आपका दोस्त भंडारी पूंछ दबाये उठा। आप उसे देखते ही घबरा गए, घबराहट में आपका पांव संभल न पाया और आप फ़िसलकर सीढ़ियों के नीचे गिर पड़े। यह तो अच्छा हुआ, आपको चाय वाले भंवर ने थाम लिया..न तो आप इस बुढ़ापे में हड्डियां तुड़ा बैठते। बस, नुक्सान हुआ तो उस भंवर का...बेचारे के हाथ में थामी चाय की केतली नीचे गिर पड़ी और बरबाद हो गयी उसकी चाय।” इतना कहकर, रमेश खिसियानी हंसी हंसने लगा। उसको हंसते देख, नारायण सिंह का नाराज़ होना स्वाभाविक था..मगर बाबू गरज़न सिंह ने, उनको समझा-बुझाकर शांत कर डाला।

“सभी महापुरुष समझ गए ना, आप सबको क्या करना है ? इस तरह कभी वे स्टोर कभी सामान्य कभी शैक्षिक वगैरा-वगैरा शाखाओं में हो जायेंगे व्यस्त। फिर आख़िर, आयेंगे मेरे पास। तब मैं खिलाऊंगा इनको, भोले बाबा की प्रसादी। इधर बैठा दूंगा राजेंद्रजी गुप्ता और श्योपत सिंह को, खाली फ़ाइल थमाकर। और तब, इनसे मैं कहूंगा ‘ये लोग प्रोढ़-शिक्षा में हुए दरीपट्टी घोटाले के सन्दर्भ में, डी.ई.ओ. साहब से मिलने आये हैं।” बाबू गरज़न सिंह ने, मुस्कराकर कहा।

“जनाब, फिर क्या ? एक बार रौशनिये ने करवाया इनको तिगनी का डांस, और अब आप करवा दोगे इनसे तिगनी का डांस..तब आली जनाब पंडित साहब की अक्ल ठिकाने आ जायेगी। और फिर, कभी किसी कार्मिक को डोलर-हिंडा बनने का शाप नहीं देंगे।” घीसू लाल तपाक से, बोल उठे।

डोलर हिंडा तो क्या ? रही-सही कसर निकलवा दूंगा, इनके दुश्मन नंबर एक कैलाश भटनागर को भी यहां बुलाकर..! वे भी इनके साथी रहे ना, ज़िला-परिषद में ?” बोले बाबू गरज़न सिंह, और उन्होंने पानी मंगवाकर अपने हलक को तर किया।

“कसर तो बाबू साहब, मिठाई व नमकीन पर निकालिए..ना तो कोई और यहां आ जाएगा। भगवान न करे, आपको फिर माल मंगवाना न पड़े ?” घसीटा राम बोले, और लगाने लगे हंसी के ठहाके।

दफ़्तर के सभी महापुरुष जूंझ पड़े, मिठाई-नमकीन पर। इस तरह इन महारथियों ने सोच ही लिया, युद्ध की बागडोर उनके हाथ में आ गयी है..जिस महानुभव ने इन लोगों को हवाई बिल्डिंग की सीढ़ियां चढ़ने-उतरने का अभ्यास करवाकर उनकी स्थिति बना दी थी डोलर-हिंडा के माफ़िक..अब उससे, प्रतिशोध लेने का वक़्त आ गया है।

बाबू गरज़न सिंह और उनके उनके साथ रेलगाड़ी में रोज़ आना-जाना करने वाले साथियों ने, आज़ की रात किराए पर लिए कमरे में बिताई। यह कमरा बापू नगर एक्सटेंट कोलोनी में, इन लोगों ने किराए पर ले रखा था, जहां गाड़ी चूकने या आवश्यक काम हो जाने पर ये लोग यहां रुका करते थे।

इस तरह सोहन लाल दवे को दफ़्तर में काम करते-करते, १७ दिन बीत गए। इनको रोज़ सीढ़ियां चढ़ते-उतरते, चाय की दुकान वाला भंवर देखा करता था। ये बेचारे सोहन लाल न मालुम कितनी बार सीढ़ियां चढ़े और उतरे होगे..यह गिनना भंवर के लिए हो गया मुश्किल। आख़िरी दिन, सांझ ढले सोहन लाल अपनी सर्विस बुक का पेड लिए हवाई बिल्डिंग की सीढ़ियां उतरकर चाय की दुकान पर आये...हाम्पते-हाम्पते, और आकर बेंच पर धम्म करते बैठ गए। तब बेचारे सोहन लाल की साँसें, धौकनी की तरह चल रही थी..तब वे हाम्पते-हाम्पते इतना ही बोल पाए “भ..भंवर ए..एक फुल ग्लास स्पेसल चाय बनाना भाई।”

“हो गया, काम ?” चाय की जूठी ग्लासें धोता हुआ, भंवर बोल उठा।

“हां..हां..! अब तू चाय बना, बेकार की बकवास मत कर।” थके-मांदे सुर में, सोहन लाल बोले।

“हाय राम। न जाने आप इन सत्रह दिन तक, कितनी बार हवाई बिल्डिंग की सीढ़ियां चढ़े और उतरे होंगे ? मेरे लिए तो, गिनती करना हो गया मुश्किल। भगवान जाने, इन नासपीटों ने आपको डोलर-हिंडा के माफ़िक ऊपर-नीचे, नीचे-ऊपर..न जाने कितनी बार..” पानी से भरा ग्लास, सोहन लाल को थमाकर कहा।

“अपना काम कर, यार। फटा-फट चाय बना।” बेरुख़ी से, सोहन लाल बोले। फिर अपने सूखे गले को पानी से तर करके, एक नज़र से ऊपर से नीचे तक...हवाई बिल्डिंग को देखने लगे।

“हुज़ूर। मत निहारिये इस बिल्डिंग को, अब आपको मास्टर अल्लानूर के दीदार होंगे नहीं...वह बेचारा हज़ करने गया है। इसलिए उसके खाते में चाय के पैसे इन्द्राज़ होने का कोई सवाल नहीं, पैसे आपको अपनी अंटी से ही देने होंगे। आप कहो तो, चाय बनाऊं ?” भंवर बोला।

तभी बाबू गरज़न सिंह और उनके शागिर्द, आ पहुंचे उस दुकान पर। सोहन लाल को वहां बैठे देखकर, बाबू गरज़न सिंह चहक उठे “आज़ तो हम पंडितजी से चाय पीकर ही, गाड़ी पकड़ेंगे।” फिर प्रदीप के कंधे पर धोल मारकर, उन्होंने उससे कहा “क्यों रे प्रदीप, बात सही है ?”

“क्यों नहीं, आज लम्बे अरसे के बाद इनकी सर्विस-बुक का सेवा-सत्यापन हुआ है..इस ख़ुशी से आली जनाब हम बच्चों को कुछ भी खिला-पिला सकते हैं। इनके लिए चाय तो बड़ी छोटी बात है, हुजूरे आला मिठाई-नमकीन खिलाये बिना हमें रुख़्सत देंगे नहीं। आप जानते नहीं, इन्हें ? ये मुअज्ज़म आली ज़र्फ़ है, हुज़ूर।” चहकता हुआ, प्रदीप बोला।

“प्रेम से चाय पिलायेंगे तो बैठेंगे ज़रूर, आख़िर हम सभी मोहब्बत के भूखे हैं। अगर आली जनाब ख़ुश न हो, तो हमारा क्या ? कोई पिला देगा चाय, हम राजेंद्रजी गुप्ता और श्योपत सिंह के साथ बैठकर चाय पी लेंगे और क्या ?” बाबू गरज़न सिंह बोले।

बाबू गरज़न सिंह के गले में पड़ी रुद्राक्ष माला को देखकर, उनके दिल में टीस उठी “लुट लिया, हमें बेगाना समझकर।” फिर मज़बूर होकर, बेमन से उनको कहना पड़ा “तशरीफ़ रखिये, बेंच पर बैठकर लीजिये चाय का लुत्फ़..चाय पिलाने में क्या जाता है, मेरा ? आप ख़ुशी से, पीजिये।”

“शुक्रिया।” कहकर, बाबू गरज़न सिंह बैठ गए उनके पहलू में।

फिर क्या ? भंवर ने झट भगोले में पड़ी चाय को उबालकर, उसे ग्लासों में डाली। फिर सबको, चाय से भरी ग्लासें थमा दी। चाय पीकर, गरज़न सिंह और उनके साथी रुख़्सत हो गए। चाय पीकर सोहन लाल ने ख़ाली ग्लास पानी की टंकी के नीचे रख दी, फिर वे भंवर से कहने लगे “भंवर, तेरे मकान की मुंडेर पर क्या रखा है ?”

“हुज़ूर, हिंडा..हवा में झूल रहा डोलर-हिंडा।” तपाक से बोला, भंवर। फिर जूठी ग्लासें इकट्ठी करके, टंकी के पास उन्हें धोने बैठ गया।

“बस, बेटे तेरी हालत भी इसी डोलर-हिंडा की तरह होने वाली है। मैं कितनी बार सीढ़ियां चढ़ा और उतरा...तूने गिनने की बहुत कोशिश की है बेटे। मैंने अपना शाप उठा लिया है, इस शाप से इन लोगों का क्या हाल हुआ..मुझे नहीं मालुम। मगर इन हरामखोरों ने शाप देने वाले की ज़रूर दुर्गति बना डाली। जानता है तू, यह दफ़्तर शीघ्र ही यहां से शिफ्ट होने वाला है। बस, फिर क्या ? तू भी रोज़ मंडिया रोड के चक्कर काटेगा, जहां यह दफ़्तर जा रहा है..आख़िर तूझे भी इन बाबूओं और मास्टरों से, उधारी वसूल करनी है। फिर तू भी डोलते रहना प्यारे, कभी मंडिया रोड तो कभी रेलवे प्लेटफोर्म पर...डोलर-हिंडा की तरह।”

इतना कहकर, सोहन लाल रुख़्सत हो गए। भंवर को अब लगने लगा, पंडित सोहन लाल ने एलिमेंटरी दफ़्तर से शाप उठाकर उस पर थोप दिया है, अब वह भी मुंडेर पर डोलते “डोलर-हिंडा” की तरह डोलता जा रहा है।

तभी रमेश को अपने कंधे पर दर्द महसूस हुआ, जो नाक़ाबिले-बर्दाश्त था। इस दर्द के करण वह नींद से जग गया, आंखें मसलकर उसने सामने देखा...उसके सामने नेमा राम खड़ा था। वह एक धोल उसके कंधे पर जमा चुका था, और दूसरा धोल ज़माने जा रहा था। झट उसका हाथ पकड़कर, रमेश बोल उठा “क्या करता है रे, मूर्ख ?”

“कब से पूछ रहा हूं, राजेंद्र सिंह पाडे ने चाय लाने का आर्डर मारा है..अब तू कहता है तो, तेरे लिए रेड एंड वाइट सिगरेट का पैकेट भी लेता आऊंगा ?” मुस्कराता हुआ, नेमा राम बोला।

“हां, हां..क्यों नहीं।” ख़ुश होकर, रमेश बोला।

“ठीक है, अब तू सीढ़ियां उतरकर चला जा भंवर की दुकान पर। और वहां से लेता आ, पांच चाय और तेरे लिए रेड एंड वाइट सिगरेट का पैकेट।”

अब बेचारा रमेश झट-पट उतरने लगा हवाई बिल्डिंग की सीढ़ियां, क्योंकि उसे वापस भी सीढ़ियां भी चढ़नी थी...डोलर-हिंडा के माफ़िक। 

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पाठकों।

मेरी लिखी गयी संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक “डोलर-हिंडा” आपको कैसी लगी ? मेरा आपसे निवेदन है, आप समीक्षाकार की तरह इस पुस्तक पर समीक्षा लिखकर, मुझे अपने विचारों से अवगत करें। मेरा ई मेल है – dineshchandrapurohit2@gmail.com और dineshchandrapurohit2018@gmail.com

आप फ़िक्र न करें, मैं शीघ्र ही अगली हास्य पुस्तक लिए आपको हंसाने के लिए आ रहा हूं, कृपया आप मेरी प्रतीक्षा ज़रूर करें।

आपका शुभचिंतक

दिनेश चन्द्र पुरोहित अंधेरी-गली, आसोप की पोल, जोधपुर [राजस्थान].

[लेखक – पुस्तक ‘डोलर-हिंडा’] मंगलवार, 26 फरवरी 2019

होली रा, राम-रामसा .......... जय श्याम री सा।

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रचनाकार: संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक का अंतिम अंक २५ “डोलर-हिंडा” - लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित
संस्मरणात्मक शैली पर लिखी गयी पुस्तक का अंतिम अंक २५ “डोलर-हिंडा” - लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित
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